बीत गया है पतझड़ ,
आ गया है बसंत ,
ये प्रकृति की प्रकृति है,
किन्तु ह्रदय के बसंत अस्थायी हैं ,
ये मानव की प्रकृति है ,
वृक्ष छोड़ देते हैं पुराने पत्रम् ,
नव स्वागत के लिए ,
उपवन मे छा गए हैं फूलों के रंग ,
सुरभि के स्वागत के लिए ,
क्या मानव छोड़ेगा अहं का तम ?
मधुमास के स्वागत के लिए ,
कब आएंगे ह्रदय में प्रेम के कलश ?
प्रेम के अमृत से प्यास बुझाने के लिए ,
जब जाग जाएंगे वो ढाई आखर ,
तो होगा नव प्रभात ,ह्रदय मे होंगे बसंत ,
बसंत तो है एक उत्सव ज्ञान का ,प्रेम का ,
प्रेम के राग छेड़ते हैं वीणा के तार,
बसंत है माँ सरस्वती का अनुपम उपहार |
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