दोस्ती का चलन रहा ही नहीं
अब ज़माने की वो हवा ही नहीं
सच तो ये है सनम-कदे वालो
दिल ख़ुदा ने तुम्हें दिया ही नहीं
पलट आने से हो गया साबित
नामा-बर तू वहाँ गया ही नहीं
हाल ये है कि हम ग़रीबों का
हाल तुम ने कभी सुना ही नहीं
क्या चले ज़ोर दश्त-ए-वहशत का
हम ने दामन कभी सिया ही नहीं
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