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निर्झर

                
                                                         
                            कल कल करता निर्झर यूँ ही झरता रहता है,
                                                                 
                            
उन्नयन से अवनमन तक धरा को नमन करता है,
वो यूँ ही झुकता रहता है सदा परोपकार के लिए,
वो निडर यूँ ही तीव्र गति से आगे बढ़ता जाता है,
वो अभिमान मुक्त चलता है स्वभिमान सहित
पत्थरों को तोड़ तोड़ क़र सरिता में मिल जाता है,
जीवनदायिनी सरिता को नवजीवन दे जाता है,
उसका अंतिम लक्ष्य केवल सागर नहीं है,
धरा को प्रतीक्षा रहती है उसके पुनर्मिलन की,
वो उमड़ उमड़ कर आएगा सावन का मेघ बनकर,
आकाश से गिरती बूंदो से भर जायेगा धरा का आँचल,
ये पुनर्मिलन ही सदा के लिए अनन्त मिलन होगा |
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एक दिन पहले

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