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गल्ले की बोरी

                
                                                         
                            जी लूँ मैं फुर्सत के दो–चार पल,
                                                                 
                            
होने दे सब आज ही, न जाने क्या हो कल,
मैं खेतों का अल्हड़ किनारा,
वो मेरे गल्ले की बोरी,
मैं दहकाओं संग मेहनतकश इंशा,
वो फूल सी नाजुक छोरी,
पर बनिए के ब्याज तले,
आज इश्क़ क़ानूनी बेची जाएगी,
दो दिल के टुकड़े ले जाती,
इंशा की टोली देखी जाएगी,
बेखौफ पनपकर पार हुई,
मेरी ही मोहब्बत दुश्वार हुई,
फुर्सत की लोरी सुनने को,
कान भी तरसे जाते हैं,
महबूब बदन की आँच मिले,
लगता है अरसे जाते है,
होंठों की सुआयें प्यास भरी,
जीने से डरी, मरने से डरी,
क्या ऊपर क़िस्मत लिखने वालों की,
बैठक भी न्याई होती है?
दिल टूटकर चिथड़े उड़ते हैं?
जां सांसों को खोती है?
जिस्म में मेरे खून नहीं,
दरिया का शोला भड़का जैसे,
हम दो दिल हैं एक नहीं,
समझाऊं इस दिल को कैसे?
हार गया, मैं हार गया,
मुझको ही हराकर हार मेरा,
मुझसे ही जैसे जीत गया,
मैं दूर कहीं वीराने में,
महबूब तुझे पर गाऊंगा,
आँखों की ललक को मार वहीं,
नींदों में गहरी सो जाऊंगा।

– ऋषभ भट्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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