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काफ़िला

                
                                                         
                            हवाओं में पंख लगें या आसमां ही उड़ने लगा,
                                                                 
                            
क्यूं ये इश्क़ का काफ़िला तेरी ओर मुड़ने लगा,
तुम झुमके आई हो किसी बारिश में,
या मेरे आंगन में बूंद बरसने लगा,

क्यूं ये इश्क़ का काफ़िला तेरी ओर मुड़ने लगा…

ये गीत छिपी सन्नाटों की कानों में बजने दो,
पायल की छन छन में बादल भी आज गरजने दो,
जोड़ी तेरी और मेरी लिखी जिस कलम ने,
उसे तोड़ मैं लाया हूं,
अफ़वाह है तारों में तुम चोर नहीं,
दिल मैं ही गवाया हूं,
हां! इस दिल की सुनो, कि फूलों में महक उठने लगा,
हर ख़्वाब तो तुमसे मिलना है कि शाम भी ढलने लगा,
क्यूं ये इश्क़ का काफ़िला तेरी ओर मुड़ने लगा।
गुनगुनाती लबें हैं जिन्हें गानों के दशक वो नब्बे हैं,
नायाब तुम्हीं पे नज़्म हर, चांद पे फिर भी धब्बे हैं,
नीद की बचकानी हरकत से,
तारीफ नवाजिश को रात जगा,
हवाओं में पंख लगें या
आसमां ही उड़ने लगा,
क्यूं ये इश्क़ का काफ़िला तेरी ओर मुड़ने लगा।

– ऋषभ भट्ट
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एक घंटा पहले

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