सत्ता ने सच को कुर्सी से बाँध रखा है,
मीडिया उसकी रखवाली में खड़ा है।
जो सवाल पूछे, वही ग़द्दार ठहराया जाए,
भीड़ को नारा दे दो—हिन्दू खतरे में है।
स्क्रीन पर बहस बिकती है मिनटों में,
सच ब्रेकिंग में दम तोड़ देता है।
एंकर की आवाज़ में इतना ज़हर है,
कि झूठ भी राष्ट्रगीत हो जाता है।
सत्ता बोले—तालियाँ चाहिए,
मीडिया बोले—डर फैलाओ।
भीड़ बोले—सोचना मना है,
बस उँगली जिस ओर उठे, उधर चिल्लाओ।
यह गठजोड़ है साहब—तीन सिर वाला सच,
जिसका हर मुँह जनता को निगल जाता है।
जो भूखा है, उसे देशभक्ति सिखाई जाती है,
जो लुट रहा है, उसे आँकड़ों में छुपाया जाता है।
मज़हब, जाति, झंडे—सब इस्तेमाल में हैं,
रोटी का सवाल हर बार टल जाता है।
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