कितना परेशान करता है तुम्हारा जबाव।
धुँधलाई आँखों में ख्वाब बनाता दबाव।।
एक खुशी के लिए कैद करवाया खुद को।
भविष्य की सोचकर रोक न पाया बहाव।।
अब बिन बात की बात पर सवाल होता।
ऊटपटांग मज़ाक मोहब्बत का अभाव।।
मजबूर नही है हम दोनों की नजदीकियाँ।
किस वज़ह से टूटे 'उपदेश' नही हिसाब।।
एक वक्त वह रहा जब हम मुस्कराते थे।
वक्त फुर्र हुआ क्या मिला उसका सबाब।।
फुर्सत के लम्हों में बचपन याद करते हम।
हँसते खेलते ख्वाब बुनते नही था दबाव।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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