कल मैं खड़ा था… खुद से घंटों तक लड़ा था
लड़ाई जीत-हार की नहीं… लड़ाई अधिकार की नहीं
लड़ाई किसी विश्वास की थी… लड़ाई फिर किसी आस की थी।
आईने में एक शख्स नजर आया… चेहरे पर उसके डर नजर आया।
अब ये डर किसी भी वजह से हो सकता था… मानो ये शख्स कभी भी रो सकता था।
मैं मुस्कुराया तो ये मुस्कुराने लगा… घूर के देखा तो बुलाने लगा
नाक-नक्श में बेशक मुझ सा ही था… लबों से वो भी चुप सा ही था
मगर एक बात जो उसकी मुझसे जुदा लगी… मुश्किल छिपाकर मुस्कराने की अलग अदा लगी
बस कुछ ऐसे ही जिंदगी अब आईना दिखा रही है… जो नहीं है हमें वो बना रही है
कोई रोना चाहता है तो कोई उदास है… भला रोएं भी तो कहां, यहां तो सन्नाटा पास है…
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