आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शाम तक

                
                                                         
                            मुझे तेरा इंतजार रहा , देर शाम तक।
                                                                 
                            
मेरा दिल बेकरार रहा, देर शाम तक।।

मुझसे ये तन्हाई,मिज़ाज पूछती रही।
अपना गमख्वार रहा , देर शाम तक।।

तेरी आहटों की राह , मै देखता रहा।
मुझे तेरा एतबार रहा, देर शाम तक।।

जुगनुओं का झुरमुट,साथ देता रहा।
घर-आंगन गुलजार रहा , शाम तक।।

जाम-ए-आब-ए-चश्म का जादू है ये।
सुरूर-ओ-खुमार रहा,देर शाम तक।।

मुख्तसर गुफ़्तगू ने भड़काये हैं शौले।
तेरा ही तलबगार रहा,देर शाम तक।।

हर शै चश्मदीद हैं जो हालात थे मेरे।
मगर मै दरकिनार रहा,देर शाम तक।।

मगर ये अपने लब खुलने नही दिये।
ख़ामोश इज़हार रहा,देर शाम तक।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर