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शायरी: वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो 

शायरी: वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो
                
                                                         
                            सदा ऐश दौराँ दिखाता नहीं 
                                                                 
                            
गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं 
- मीर हसन

सुब्ह होती है शाम होती है 
उम्र यूँही तमाम होती है 
- मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम

वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो 
हौसले मुश्किलों में पलते हैं 
- महफूजुर्रहमान आदिल

और क्या चाहती है गर्दिश-ए-अय्याम कि हम 
अपना घर भूल गए उन की गली भूल गए 
- जौन एलिया

वक़्त अच्छा भी आएगा 'नासिर' 
ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी 
- नासिर काज़मी

गुज़रने ही न दी वो रात मैं ने 
घड़ी पर रख दिया था हाथ मैं ने 
- शहज़ाद अहमद
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20 घंटे पहले

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