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एक्सप्लेनर: टाटा के तीन नामों में क्या अंतर, भारत में कंपनियों के कितने प्रकार और कैसे होती है उनकी पहचान?

Fri, 02 Oct 2026 06:08 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Fri, 02 Oct 2026 06:08 AM IST
सार

टाटा से जुड़े तीन नाम अक्सर सुनाई देते हैं, लेकिन तीनों की भूमिका अलग है। इस एक्सप्लेनर में समझिए टाटा ट्रस्ट्स, टाटा संस और टाटा ग्रुप के बीच क्या फर्क है। साथ ही जानिए भारत में कंपनियों की पहचान सिर्फ उनके नाम से नहीं, बल्कि उनके स्वामित्व, कानूनी ढांचे और दूसरी कंपनियों के साथ रिश्तों के आधार पर कैसे होती है।

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Explainer: What’s the Difference Between Tata’s Three Names? Types of Companies in India and How to Identify
कंपनियों में फर्क - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

टाटा समूह में चल रह विवाद के बीच जो तीन शब्द सबसे ज्यादा सुनने को मिल रहे हैं, वो हैं टाटा ट्रस्ट्स, टाटा संस और टाटा ग्रुप। ये तीनों ही नाम एक ही कारोबारी विरासत से जुड़े हैं, लेकिन इनकी भूमिका और पहचान अलग-अलग है। आखिर टाटा ट्रस्ट्स क्या है, टाटा संस की इसमें क्या भूमिका है और टाटा समूह किस तरह काम करता है? ऐसे में ये भी सवाल उठता है कि भारत का कॉरपोरेट ढांचा किस तरह बंटा है? ये सभी एक-दूसरे से कैसे अलग हैं और उनकी परिभाषा क्या है? आइये समझते हैं...

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टाटा ट्रस्ट्स, टाटा संस और टाटा ग्रुप में क्या अंतर है?

टाटा ट्रस्ट्स

  • टाटा ट्रस्ट्स कई ट्रस्टों का समूह है। इसके दो प्रमुख ट्रस्ट सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट हैं। 
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  • टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है। इसका काम मुख्य रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े कामों के लिए सहयोग और फंडिंग देना है।
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Explainer: What’s the Difference Between Tata’s Three Names? Types of Companies in India and How to Identify
टाटा के जुड़े नाम - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

टाटा संस
टाटा संस टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है। यानी यह टाटा समूह की अलग-अलग कंपनियों में हिस्सेदारी रखती है और निवेश करती है।

टाटा संस की टाटा ग्रुप की अलग-अलग कंपनियों में हिस्सेदारी करीब 25 फीसदी से 73 फीसदी तक है। टाटा संस की टाइटन में करीब 25 फीसदी, टाटा इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन में करीब 73 फीसदी और टीसीएस में करीब 71.9 फीसदी हिस्सेदारी है।

टाटा समूह
टाटा ग्रुप किसी एक कंपनी का नाम नहीं है। यह 100 से ज्यादा कंपनियों का समूह है। इनमें 26 कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं।

वित्त वर्ष 2024-25 में टाटा ग्रुप का राजस्व करीब 180 अरब डॉलर रहा। 31 मार्च 2025 तक इसकी सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 328 अरब डॉलर था। ग्रुप में 10 लाख से ज्यादा लोग काम करते हैं। टाटा ग्रुप की अलग-अलग कंपनियों के अपने बोर्ड और सीईओ होते हैं।

भारत में कॉरपोरेट को कैसे अलग-अलग समझा जाता है?

अलग-अलग कॉरपोरेट समूहों को सिर्फ उनके नाम या काम के आधार पर नहीं, बल्कि कई अलग-अलग आधारों पर समझा जाता है। कोई समूह कैसे बना है, उसके सदस्यों की जिम्मेदारी कितनी है, उसमें कितने सदस्य हैं, उसका मालिक कौन है, वह किसी दूसरी कंपनी को नियंत्रित करती है या किसी दूसरी कंपनी के नियंत्रण में है और उसका उद्देश्य क्या है, इन आधारों पर अलग-अलग स्वरूप सामने आते हैं।

बनने के तरीके के आधार पर कॉरपोरेट कैसे अलग?

चार्टर्ड कंपनी
चार्टर्ड कंपनी एक ऐतिहासिक प्रकार की कंपनी थी, जिसे किसी शासक की ओर से दिए गए चार्टर या विशेष अधिकार के आधार पर बनाया जाता था।

इसके उदाहरण ईस्ट इंडिया कंपनी और बैंक ऑफ इंग्लैंड हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1600 में हुई थी, जबकि बैंक ऑफ इंग्लैंड की स्थापना 1694 में हुई।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि चार्टर्ड कंपनी आज कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत बनने वाली सामान्य कंपनी की श्रेणी नहीं है। यह मुख्य रूप से ऐतिहासिक वर्गीकरण है।

Explainer: What’s the Difference Between Tata’s Three Names? Types of Companies in India and How to Identify
कंपनियों में फर्क - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

वैधानिक कंपनी या वैधानिक निगम

वैधानिक कंपनी या वैधानिक निगम किसी विशेष कानून के जरिए बनाया जाता है। संसद या राज्य विधानमंडल कानून बनाकर ऐसी संस्था के अधिकार, शक्तियां, काम और जिम्मेदारियां तय करता है।

इसके उदाहरण एलआईसी, एफसीआई और आरबीआई हैं। ऐसी संस्थाओं का कानूनी आधार कंपनी अधिनियम के बजाय वह विशेष कानून होता है जिसके तहत उन्हें बनाया गया है।

रजिस्टर्ड कंपनी

रजिस्टर्ड कंपनी वह कंपनी होती है, जो कंपनी अधिनियम, 2013 या इससे पहले के किसी कंपनी कानून के तहत निगमित हुई हो।

रजिस्ट्रेशन के बाद कंपनी की अपनी अलग कानूनी पहचान होती है। यानी कंपनी अपने सदस्यों और मालिकों से अलग कानूनी इकाई होती है।

टीसीएस, इंफोसिस और रिलायंस जैसी कंपनियां कंपनी अधिनियम के तहत निगमित कंपनियों के उदाहरण हैं।

सदस्यों की जिम्मेदारी के आधार पर कंपनियां कैसे अलग?

कंपनी के सदस्यों की जिम्मेदारी कितनी होगी, इसके आधार पर भी कंपनियों को अलग किया जाता है।

शेयरों द्वारा लिमिटेड कंपनी

  • इसमें सदस्यों की जिम्मेदारी उनके शेयरों पर बकाया रकम तक सीमित रहती है।
  • यानी अगर किसी व्यक्ति ने कंपनी के शेयर लिए हैं और उन शेयरों पर कुछ रकम अभी बाकी है, तो कंपनी के प्रति उसकी जिम्मेदारी उस बकाया रकम तक सीमित रहती है।
  • इंफोसिस जैसी कंपनी शेयरों द्वारा लिमिटेड कंपनी का उदाहरण है।

गारंटी द्वारा लिमिटेड कंपनी
इस तरह की कंपनी में सदस्य पहले से तय रकम देने की गारंटी देते हैं। अगर कंपनी बंद होती है, तो कंपनी के सदस्यों को अपनी तय की गई गारंटी की रकम तक योगदान देना पड़ सकता है। ऐसी कंपनियों का इस्तेमाल खास तौर पर गैर-लाभकारी या अन्य विशेष उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

अनलिमिटेड कंपनी

  • अनलिमिटेड कंपनी में सदस्यों की जिम्मेदारी सीमित नहीं होती।
  • कंपनी की देनदारी पूरी करने के लिए जरूरत पड़ने पर सदस्यों की व्यक्तिगत संपत्ति भी जिम्मेदारी के दायरे में आ सकती है।
  • कंपनी अधिनियम के तहत कंपनी शेयरों द्वारा लिमिटेड, गारंटी द्वारा लिमिटेड या अनलिमिटेड हो सकती है।

प्राइवेट कंपनी और पब्लिक कंपनी में क्या अंतर है?

प्राइवेट कंपनी
प्राइवेट कंपनी में शेयरों के ट्रांसफर पर प्रतिबंध होता है। यह आम लोगों को अपनी प्रतिभूतियां खरीदने के लिए सार्वजनिक रूप से आमंत्रित नहीं कर सकती।

सामान्य प्राइवेट कंपनी में कम से कम दो सदस्य जरूरी होते हैं और सदस्यों की संख्या सामान्य तौर पर 200 से अधिक नहीं हो सकती। एक ही शेयर को संयुक्त रूप से रखने वाले लोग इस सीमा के लिए एक सदस्य माने जाते हैं। प्राइवेट कंपनी के नाम के अंत में प्राइवेट लिमिटेड लिखा जाता है।

पब्लिक कंपनी
पब्लिक कंपनी वह कंपनी है जो प्राइवेट कंपनी नहीं है।

इसे बनाने के लिए कम से कम सात सदस्यों की जरूरत होती है। पब्लिक कंपनी अपनी प्रतिभूतियां जनता को जारी कर सकती है, लेकिन हर पब्लिक कंपनी का शेयर बाजार में लिस्टेड होना जरूरी नहीं है। पब्लिक कंपनी के नाम के अंत में लिमिटेड लिखा जाता है।

यहां पब्लिक कंपनी और सरकारी कंपनी को एक नहीं समझना चाहिए। पब्लिक कंपनी का मतलब यह नहीं है कि उसमें सरकार की हिस्सेदारी है। पब्लिक कंपनी उसकी कानूनी संरचना को बताता है, जबकि सरकारी कंपनी की पहचान उसमें सरकार की हिस्सेदारी के आधार पर होती है।

वन पर्सन कंपनी
वन पर्सन कंपनी यानी ओपीसी में सिर्फ एक व्यक्ति सदस्य होता है। कंपनी अधिनियम के तहत एक व्यक्ति अकेले भी कंपनी बना सकता है। ओपीसी को प्राइवेट कंपनी के रूप में माना जाता है।

ओपीसी बनाते समय सदस्य को एक ऐसे व्यक्ति का नाम देना होता है जो सदस्य की मृत्यु की स्थिति में कंपनी का सदस्य बन सके। इस तरह जहां सामान्य प्राइवेट कंपनी के लिए कम से कम दो सदस्य जरूरी होते हैं, वहीं ओपीसी में एक ही सदस्य होता है।

सरकारी कंपनी
सरकारी कंपनी वह कंपनी है जिसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार या केंद्र और राज्य सरकारों की मिलाकर कम से कम 51 फीसदी चुकता शेयर पूंजी होती है। सरकारी कंपनी की सब्सिडियरी भी इस परिभाषा में शामिल होती है।

सेल और बीएचईएल इसके उदाहरण हैं। यहां सरकारी कंपनी और पब्लिक कंपनी के बीच अंतर समझना जरूरी है। सरकारी कंपनी की पहचान सरकार की हिस्सेदारी से होती है, जबकि पब्लिक कंपनी उसकी कानूनी संरचना से।

होल्डिंग कंपनी, सब्सिडियरी कंपनी और एसोसिएट कंपनी में क्या अंतर?

कंपनियों को उनके आपसी संबंध के आधार पर भी अलग किया जाता है।

होल्डिंग कंपनी

  • होल्डिंग कंपनी वह कंपनी होती है जिसकी एक या अधिक कंपनियां उसकी सब्सिडियरी होती हैं।
  • सरल भाषा में इसे मूल कंपनी की तरह समझ सकते हैं।
  • टाटा संस को टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी के रूप में समझा जा सकता है। कंपनी अधिनियम में भी होल्डिंग कंपनी की पहचान उसकी सब्सिडियरी कंपनियों के आधार पर की गई है।

सब्सिडियरी कंपनी
जिस कंपनी पर किसी दूसरी कंपनी का नियंत्रण होता है, वह उसकी सब्सिडियरी यानी सहायक कंपनी होती है।

कंपनी अधिनियम के तहत किसी कंपनी को सब्सिडियरी माना जा सकता है अगर दूसरी कंपनी उसके बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के गठन को नियंत्रित करती है या उसके कुल वोटिंग पावर के आधे से ज्यादा हिस्से को नियंत्रित करती है।

इसे आसान भाषा में मूल कंपनी और उसकी सहायक कंपनी के रिश्ते की तरह समझ सकते हैं।

एसोसिएट कंपनी
एसोसिएट कंपनी में दूसरी कंपनी का महत्वपूर्ण प्रभाव होता है, लेकिन वह उसकी सब्सिडियरी नहीं होती।

कंपनी अधिनियम के अनुसार महत्वपूर्ण प्रभाव का मतलब कम से कम 20 फीसदी कुल वोटिंग पावर पर नियंत्रण या किसी समझौते के तहत कारोबारी फैसलों पर नियंत्रण या उनमें भागीदारी है। एसोसिएट कंपनी में ज्वाइंट वेंचर भी शामिल हो सकता है।

यानी दूसरी कंपनी का प्रभाव होता है, लेकिन सब्सिडियरी कंपनी जैसा नियंत्रण नहीं होता।

भारतीय कंपनी और विदेशी कंपनी में क्या अंतर है?

भारत में निगमित कंपनी
भारत में निगमित कंपनी वह कंपनी है जो भारत में कंपनी कानून के तहत निगमित हुई हो।

भारतीय कंपनी आम कारोबारी इस्तेमाल का शब्द है। इसे कंपनी अधिनियम में सरकारी कंपनी या प्राइवेट कंपनी की तरह अलग कानूनी श्रेणी नहीं माना जाता।

टाटा मोटर्स और इंफोसिस भारत में निगमित कंपनियों के उदाहरण हैं।

विदेशी कंपनी
कंपनी अधिनियम के अनुसार विदेशी कंपनी वह कंपनी या बॉडी कॉरपोरेट है जो भारत के बाहर निगमित हुई हो और भारत में उसका कारोबार का स्थान हो या वह भारत में किसी अन्य तरीके से कारोबारी गतिविधि करती हो। भारत में यह गतिविधि सीधे या एजेंट के जरिए, भौतिक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हो सकती है। गूगल और सैमसंग जैसी विदेश में निगमित कंपनियां, भारत में कारोबार करने की स्थिति में, विदेशी कंपनी से जुड़े कंपनी अधिनियम के प्रावधानों के दायरे में आ सकती हैं।

स्मॉल कंपनी

  • स्मॉल कंपनी यानी छोटी कंपनी की पहचान उसके आकार से जुड़े कानूनी मानकों के आधार पर होती है।
  • कंपनी अधिनियम के तहत स्मॉल कंपनी ऐसी कंपनी है जो पब्लिक कंपनी नहीं है और जिसकी चुकता शेयर पूंजी या टर्नओवर कानून में तय सीमा के भीतर है।
  • वर्तमान प्रावधानों के तहत निर्धारित सीमा चुकता शेयर पूंजी के लिए 10 करोड़ रुपये तक और टर्नओवर के लिए 100 करोड़ रुपये तक है।
  • हालांकि हर छोटी कंपनी स्मॉल कंपनी नहीं होती। होल्डिंग कंपनी, सब्सिडियरी कंपनी, सेक्शन 8 कंपनी और किसी विशेष कानून के तहत बनी कंपनी को इस श्रेणी में नहीं रखा जाता।

लिस्टेड कंपनी
जिस कंपनी की कोई प्रतिभूति किसी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध होती है, उसे लिस्टेड कंपनी कहा जाता है। यानी कंपनी की प्रतिभूतियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध होती हैं।

लिस्टेड होना कंपनी के शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने से जुड़ा है। इसका मतलब यह नहीं है कि कंपनी सरकारी है। कंपनी अधिनियम में लिस्टेड कंपनी की पहचान उसकी प्रतिभूतियों के मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध होने के आधार पर की गई है।

कंपनी अधिनियम, 2013 क्या है?

भारत में कंपनियों से जुड़े कानून को समेकित और संशोधित करने वाला प्रमुख कानून कंपनी अधिनियम, 2013 है। इसमें कंपनी की परिभाषा, गठन, नाम, सदस्यों, निदेशकों, पूंजी, जिम्मेदारी और अलग-अलग तरह की कंपनियों से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं।

कंपनी के नाम के अंत में लिमिटेड और प्राइवेट लिमिटेड क्यों लिखा जाता है?

कंपनी अधिनियम के अनुसार पब्लिक कंपनी के नाम के अंत में लिमिटेड और प्राइवेट कंपनी के नाम के अंत में प्राइवेट लिमिटेड लिखा जाता है। सेक्शन 8 के तहत बनी कंपनी के मामले में इस नामकरण की अनिवार्यता लागू नहीं होती।

सेक्शन 8 के अंदर आने वाली कंपनी क्या है?

कंपनी अधिनियम की सेक्शन 8 के तहत ऐसी कंपनी बनाई जा सकती है जिसका उद्देश्य वाणिज्य, कला, विज्ञान, खेल, शिक्षा, शोध, सामाजिक कल्याण, धर्म, चैरिटी या पर्यावरण संरक्षण जैसे कामों को बढ़ावा देना हो।

ऐसी कंपनी अपनी कमाई और आय का इस्तेमाल अपने तय उद्देश्यों को पूरा करने में करती है। इसका उद्देश्य सदस्यों के बीच मुनाफा बांटना नहीं होता, इसलिए ऐसी कंपनी अपने सदस्यों को लाभांश नहीं देती। सेक्शन 8 कंपनी को अपने नाम के साथ लिमिटेड या प्राइवेट लिमिटेड लगाना जरूरी नहीं होता।

कंपनी और कॉरपोरेशन में क्या अंतर है?

कंपनी अधिनियम में बॉडी कॉरपोरेट या कॉरपोरेशन की भी परिभाषा दी गई है। इसमें भारत के बाहर निगमित कंपनी शामिल है, लेकिन सहकारी संस्था को इससे अलग रखा गया है। इसलिए कंपनी और कॉरपोरेशन को हर स्थिति में एक ही चीज नहीं माना जा सकता।

Explainer: What’s the Difference Between Tata’s Three Names? Types of Companies in India and How to Identify
सहकारी संस्था - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

सहकारी संस्था क्या है?

सहकारी संस्था को सामान्य कंपनी की तरह नहीं समझना चाहिए। इसका आधार सदस्यों का सामूहिक हित और भागीदारी होता है।

कंपनी अधिनियम में भी सहकारी संस्था को बॉडी कॉरपोरेट की परिभाषा से अलग रखा गया है। इसलिए सहकारी संस्था और कंपनी का कानूनी ढांचा अलग होता है।

सेमी-गवर्नमेंट संस्था

सेमी-गवर्नमेंट संस्था या कंपनी कोई अलग कानूनी कंपनी श्रेणी नहीं है। यह शब्द आम तौर पर ऐसी संस्थाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो सरकार से किसी रूप में जुड़ी होती हैं, लेकिन पूरी तरह सरकारी विभाग नहीं होतीं।

इसलिए किसी संस्था को सिर्फ “सेमी-गवर्नमेंट” कहने से उसका कानूनी स्वरूप तय नहीं होता। उसका वास्तविक स्वरूप यह देखकर समझना होता है कि वह किस कानून के तहत बनी है, उसका स्वामित्व किसके पास है और उस पर नियंत्रण किसका है।

पीएसयू

  • पीएसयू यानी सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम भी कंपनी अधिनियम में कंपनी का कोई अलग कानूनी स्वरूप नहीं है।
  • यह शब्द सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े उपक्रमों के लिए इस्तेमाल होता है। किसी पीएसयू का कानूनी ढांचा कंपनी, वैधानिक निगम या किसी दूसरे कानूनी स्वरूप का हो सकता है।

एमएनसी

  • एमएनसी यानी बहुराष्ट्रीय कंपनी भी कंपनी अधिनियम में दी गई कोई अलग कानूनी कंपनी श्रेणी नहीं है।
  • यह शब्द ऐसी कंपनी के लिए इस्तेमाल होता है जिसका कारोबार एक से ज्यादा देशों में होता है।
  • यानी एमएनसी शब्द कंपनी के कारोबार के भौगोलिक विस्तार को बताता है, उसके कानूनी स्वरूप को नहीं।
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