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IEA on Iran Crisis: दुनिया पर 1973 और 2022 से भी बड़ा ऊर्जा संकट, महंगे तेल से आम आदमी का क्या होगा हाल?

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Kumar Vivek Updated Tue, 07 Apr 2026 08:29 PM IST
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सार

दुनिया पर 1973 से भी बड़ा ऊर्जा संकट गहरा संकता है। ट्रंप की ओर से ईरान को खुली धमकी के बाद क्रूड ऑयल 115 डॉलर के पार पहुंचा। दुनिया के लिए यह कितना खतरनाक? जानें महंगाई और आम आदमी की जेब पर इसके असर की पूरी कवरेज अभी पढ़ें।

IEA Statement on Energy Crisis amid America Iran War Strait of Hormuz Global Energy Crisis Crude Oil Prices
ईरान जंग पर आईईए की चेतावनी। - फोटो : amarujala.com
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विस्तार

होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी ईरान की नाकेबंदी ने पूरी दुनिया को एक ऐसे भीषण ऊर्जा संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है, जिसे इतिहास के सबसे बड़े झटकों से भी ज्यादा खतरनाक माना जा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान को जलमार्ग खोलने के लिए दी गई मंगलवार की 'डेडलाइन' और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों ने वैश्विक बाजारों में हड़कंप मचा दिया है। आइए, विस्तार से समझते हैं कि यह भू-राजनीतिक टकराव आम आदमी की जिंदगी और दुनिया भर की अर्थव्यवस्था को कैसे गहरे संकट में डाल रहा है।

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इतिहास का सबसे बड़ा और विनाशकारी ऊर्जा संकट: आईईए

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के कार्यकारी निदेशक फतिह बिरोल ने वर्तमान स्थिति को 1970 के दशक के दोनों तेल संकटों (1973 और 1979) और रूस-यूक्रेन युद्ध (2022) के संयुक्त प्रभाव से भी अधिक गंभीर करार दिया है। इस महासंकट की सबसे भारी कीमत विकासशील देशों को चुकानी होगी। महंगे तेल और गैस के कारण न केवल परिवहन महंगा होगा, बल्कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी उछाल और मुद्रास्फीति में तेजी आएगी, जिसका सीधा असर आम आदमी की रसोई और घरेलू बजट पर पड़ेगा। इसके अलावा यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं रहेंगे।

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ट्रंप की चेतावनी और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल

राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को मंगलवार रात (अमेरिकी समयानुसार रात आठ बजे) तक होर्मुज का रास्ता खोलने का अल्टीमेटम दिया है, और चेतावनी दी है कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो पावर प्लांट्स समेत नागरिक बुनियादी ढांचे पर नए हमले किए जाएंगे। ट्रम्प ने अपने एक पोस्ट में यहां तक कहा कि अगर समझौता नहीं हुआ तो "आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी"।  इस तनाव के बीच वैश्विक तेल मानक 'ब्रेंट क्रूड' 0.7 प्रतिशत बढ़कर 110.60 डॉलर प्रति बैरल और न्यूयॉर्क लाइट क्रूड 2.5 प्रतिशत उछलकर 115.17 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। ईरान के प्रमुख तेल निर्यात टर्मिनल 'खार्ग द्वीप' पर अमेरिकी सैन्य हमलों की भी खबरें आ रही हैं।

शेयर बाजार के चाल और वैश्विक मंदी की आहट

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इस युद्ध के कारण दुनिया भर में महंगाई बढ़ेगी और वैश्विक विकास दर धीमी हो जाएगी। जॉर्जीवा के मुताबिक, "अब सभी रास्ते ऊंची कीमतों और धीमी वृद्धि की ओर जाते हैं"। 


इस अनिश्चितता ने दुनियाभर के शेयर बाजारों को बुरी तरह झकझोर दिया है:

  • अमेरिकी बाजार: वॉल स्ट्रीट भारी दबाव में खुला, जहां डाउ जोंस इंडस्ट्रियल एवरेज 296 अंक (0.64%) गिरकर 46,373 पर आ गया। 
  • एशिया और यूरोप: एशियाई बाजारों में मिला-जुला रुख रहा; जापान का निक्केई सपाट रहा, दक्षिण कोरिया का कोस्पी 1.1% चढ़ा, जबकि हांगकांग का हैंग सेंग 0.7% गिरा। वहीं, यूरोप में जर्मनी का डैक्स 30 दोपहर तक 0.5% गिर गया। मंगलवार को भारतीय बाजार शुरुआती बिकवाली के बाद मामूली बढ़त के साथ बंद हुए।

आम आदमी पर असर: ब्रिटेन में स्टैगफ्लेशन का खतरा

इस संकट का जमीनी असर आम उपभोक्ताओं पर दिखना शुरू हो गया है। ब्रिटेन में पेट्रोल की कीमतों में 2.6 पेंस की वृद्धि के साथ यह 157.02 पेंस प्रति लीटर और डीजल 4.2 पेंस बढ़कर 189.42 पेंस प्रति लीटर हो गया है। आरसीएम यूके के मुख्य अर्थशास्त्री थॉमस पुघ का मानना है कि ब्रिटेन एक बार फिर 'स्टैगफ्लेशन' (महंगाई और आर्थिक मंदी का एक साथ आना) की ओर बढ़ रहा है, और अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो मंदी आना तय है। 

कैपिटल डॉट कॉम की वरिष्ठ बाजार विश्लेषक डेनिएला हैथोर्न के अनुसार, बाजार अब एक निर्णायक स्थिति में है; या तो ईरान के बुनियादी ढांचे पर सीधे हमलों से तनाव और भड़केगा, या फिर अंतिम समय में कोई समझौता होगा। जब तक आगे का रास्ता स्पष्ट नहीं होता, तब तक बाजार में अस्थिरता बनी रहेगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आम उपभोक्ता पर महंगाई की यह भारी मार जारी रहने की पूरी आशंका है।

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