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तंबाकू कारोबार में विदेशी निवेश पर सख्ती की तैयारी: ब्रांड लाइसेंसिंग पर लग सकती है रोक, सरकार की योजना क्या?
Wed, 14 Oct 2026 04:51 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Wed, 14 Oct 2026 04:51 PM IST
सार
केंद्र सरकार तंबाकू सेक्टर में विदेशी निवेश के नियम सख्त करने पर विचार कर रही है। प्रस्ताव के तहत फ्रेंचाइजी, ट्रेडमार्क, ब्रांड नाम और प्रबंधन समझौतों में विदेशी निवेश पर रोक लग सकती है। भारत में करीब 25 करोड़ लोग तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं और सरकार खपत कम करने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसे में क्या नए नियम लागू होंगे? क्या इससे तंबाकू कारोबार और विदेशी कंपनियों पर असर पड़ेगा? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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तंबाकू सेक्टर में नए प्रतिबंधों पर विचार
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
केंद्र सरकार तंबाकू सेक्टर में विदेशी निवेश के नियम और सख्त करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। इसके तहत तंबाकू कारोबार में फ्रेंचाइजी, ट्रेडमार्क, ब्रांड नाम और मैनेजमेंट कॉन्ट्रैक्ट के लिए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) पर रोक लगाई जा सकती है। हालांकि, यह प्रस्ताव अभी शुरुआती स्तर पर है और इस पर चर्चा चल रही है। सरकार का यह कदम तंबाकू कारोबार में विदेशी कंपनियों की गतिविधियों को नियंत्रित करने, प्रचार पर रोक लगाने और तस्करी पर अंकुश लगाने की कोशिश का हिस्सा हो सकता है। इस मामले में पहले भी नियम सख्त करने की पहल हुई थी, लेकिन कुछ संगठनों की चिंताओं के कारण फैसला नहीं हो सका।
तंबाकू कारोबार में विदेशी निवेश पर क्या बदल सकता है?
सरकार पहले भी नियम सख्त करने पर क्यों कर चुकी है विचार?
तंबाकू सेक्टर में विदेशी निवेश के नियम सख्त करने का विचार नया नहीं है। वर्ष 2024 में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने भी इस दिशा में प्रस्ताव पर काम किया था। उस समय उद्देश्य तंबाकू उत्पादों के प्रचार से जुड़ी गतिविधियों पर रोक लगाना और इस क्षेत्र में तस्करी पर अंकुश लगाना था। आशंका जताई गई थी कि कुछ कंपनियां मौजूदा नियमों का रास्ता निकालकर उनका उद्देश्य पूरा होने से रोक सकती हैं। हालांकि, उस समय सरकार कोई अंतिम निर्णय नहीं ले सकी। तंबाकू किसानों के संगठनों समेत कुछ पक्षों ने प्रस्ताव को लेकर चिंता जताई थी। अब एक बार फिर इस मुद्दे पर विचार होने से तंबाकू कारोबार और उससे जुड़े लोगों पर संभावित असर को लेकर चर्चा महत्वपूर्ण हो गई है।
भारत में तंबाकू के इस्तेमाल को लेकर चिंता क्यों है?
भारत में तंबाकू का इस्तेमाल सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी चुनौती है। उपलब्ध अनुमानों के अनुसार, देश में तंबाकू के इस्तेमाल करने वालों की संख्या करीब 25 करोड़ है। इस मामले में भारत दुनिया में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। तंबाकू की खपत में सिगरेट की हिस्सेदारी केवल करीब 10 प्रतिशत बताई गई है। स्वास्थ्य पर इसका बड़ा बोझ खैनी, गुटखा जैसे मुंह से इस्तेमाल किए जाने वाले तंबाकू उत्पादों और बीड़ी से जुड़ा है। भारत में मुंह से इस्तेमाल होने वाले तंबाकू के उपभोक्ताओं की संख्या भी बहुत अधिक है। ऐसे में सरकार के सामने तंबाकू की खपत कम करने और इससे जुड़े कारोबार को नियंत्रित करने की चुनौती है। विदेशी निवेश के नियमों में संभावित बदलाव को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।
तंबाकू पर नियंत्रण के लिए भारत की क्या जिम्मेदारी है?
भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन के तंबाकू नियंत्रण संबंधी फ्रेमवर्क कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता है। इसके तहत देश की जिम्मेदारी तंबाकू उत्पादों की खपत कम करने के लिए कदम उठाने की है। सरकार ने तंबाकू उत्पादन को नियंत्रित करने, विदेशी बाजारों में विपणन को बढ़ावा देने और मांग तथा आपूर्ति के बीच बार-बार पैदा होने वाले असंतुलन से जुड़ी समस्याओं को संभालने के लिए भी व्यवस्था बनाई है। तंबाकू बोर्ड अधिनियम, 1975 के तहत सरकार ने तंबाकू बोर्ड की स्थापना की थी। यह बोर्ड वर्ष 1976 में स्थापित हुआ। इसका उद्देश्य तंबाकू क्षेत्र को व्यवस्थित करना और उत्पादन तथा विपणन से जुड़ी गतिविधियों को नियंत्रित करना है। विदेशी निवेश के नियमों में बदलाव का प्रस्ताव इसी नियामक व्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय है।
भारत में विदेशी निवेश की ताजा स्थिति क्या है?
तंबाकू सेक्टर में विदेशी निवेश को लेकर विचार ऐसे समय हो रहा है, जब देश में कुल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की अप्रैल से जून तिमाही में भारत में एफडीआई छह प्रतिशत बढ़कर 19.81 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। यह आंकड़ा देश में कुल विदेशी निवेश से संबंधित है, न कि केवल तंबाकू कारोबार से। तंबाकू सेक्टर में प्रस्तावित बदलाव अभी चर्चा के स्तर पर है। सरकार को इस पर अंतिम निर्णय लेना बाकी है। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो फ्रेंचाइजी, ट्रेडमार्क, ब्रांड नाम और प्रबंधन समझौतों के जरिए विदेशी कंपनियों के सहयोग की मौजूदा व्यवस्था बदल सकती है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार इस पर कब तक निर्णय लेगी।
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तंबाकू कारोबार में विदेशी निवेश पर क्या बदल सकता है?
- सरकारी सूत्रों के अनुसार, सरकार ऐसे प्रस्ताव का मूल्यांकन कर रही है, जिसके तहत तंबाकू सेक्टर में फ्रेंचाइजी, ट्रेडमार्क, ब्रांड नाम और प्रबंधन समझौतों के लिए विदेशी निवेश की अनुमति खत्म की जा सकती है। फिलहाल इस प्रस्ताव पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
- अभी तंबाकू से बने सिगार, चुरूट, सिगारिलो और सिगरेट के निर्माण में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश प्रतिबंधित है। लेकिन तकनीकी सहयोग के विभिन्न तरीकों में विदेशी निवेश की अनुमति है। इसमें फ्रेंचाइजी, ट्रेडमार्क, ब्रांड नाम और प्रबंधन समझौते के तहत होने वाला सहयोग भी शामिल है।
- नए प्रस्ताव का उद्देश्य इसी व्यवस्था को और सीमित करना है। यदि इस पर फैसला होता है, तो तंबाकू कारोबार में विदेशी कंपनियों के सहयोग के तरीकों पर असर पड़ सकता है।
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सरकार पहले भी नियम सख्त करने पर क्यों कर चुकी है विचार?
तंबाकू सेक्टर में विदेशी निवेश के नियम सख्त करने का विचार नया नहीं है। वर्ष 2024 में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने भी इस दिशा में प्रस्ताव पर काम किया था। उस समय उद्देश्य तंबाकू उत्पादों के प्रचार से जुड़ी गतिविधियों पर रोक लगाना और इस क्षेत्र में तस्करी पर अंकुश लगाना था। आशंका जताई गई थी कि कुछ कंपनियां मौजूदा नियमों का रास्ता निकालकर उनका उद्देश्य पूरा होने से रोक सकती हैं। हालांकि, उस समय सरकार कोई अंतिम निर्णय नहीं ले सकी। तंबाकू किसानों के संगठनों समेत कुछ पक्षों ने प्रस्ताव को लेकर चिंता जताई थी। अब एक बार फिर इस मुद्दे पर विचार होने से तंबाकू कारोबार और उससे जुड़े लोगों पर संभावित असर को लेकर चर्चा महत्वपूर्ण हो गई है।
भारत में तंबाकू के इस्तेमाल को लेकर चिंता क्यों है?
भारत में तंबाकू का इस्तेमाल सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी चुनौती है। उपलब्ध अनुमानों के अनुसार, देश में तंबाकू के इस्तेमाल करने वालों की संख्या करीब 25 करोड़ है। इस मामले में भारत दुनिया में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। तंबाकू की खपत में सिगरेट की हिस्सेदारी केवल करीब 10 प्रतिशत बताई गई है। स्वास्थ्य पर इसका बड़ा बोझ खैनी, गुटखा जैसे मुंह से इस्तेमाल किए जाने वाले तंबाकू उत्पादों और बीड़ी से जुड़ा है। भारत में मुंह से इस्तेमाल होने वाले तंबाकू के उपभोक्ताओं की संख्या भी बहुत अधिक है। ऐसे में सरकार के सामने तंबाकू की खपत कम करने और इससे जुड़े कारोबार को नियंत्रित करने की चुनौती है। विदेशी निवेश के नियमों में संभावित बदलाव को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।
तंबाकू पर नियंत्रण के लिए भारत की क्या जिम्मेदारी है?
भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन के तंबाकू नियंत्रण संबंधी फ्रेमवर्क कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता है। इसके तहत देश की जिम्मेदारी तंबाकू उत्पादों की खपत कम करने के लिए कदम उठाने की है। सरकार ने तंबाकू उत्पादन को नियंत्रित करने, विदेशी बाजारों में विपणन को बढ़ावा देने और मांग तथा आपूर्ति के बीच बार-बार पैदा होने वाले असंतुलन से जुड़ी समस्याओं को संभालने के लिए भी व्यवस्था बनाई है। तंबाकू बोर्ड अधिनियम, 1975 के तहत सरकार ने तंबाकू बोर्ड की स्थापना की थी। यह बोर्ड वर्ष 1976 में स्थापित हुआ। इसका उद्देश्य तंबाकू क्षेत्र को व्यवस्थित करना और उत्पादन तथा विपणन से जुड़ी गतिविधियों को नियंत्रित करना है। विदेशी निवेश के नियमों में बदलाव का प्रस्ताव इसी नियामक व्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय है।
भारत में विदेशी निवेश की ताजा स्थिति क्या है?
तंबाकू सेक्टर में विदेशी निवेश को लेकर विचार ऐसे समय हो रहा है, जब देश में कुल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की अप्रैल से जून तिमाही में भारत में एफडीआई छह प्रतिशत बढ़कर 19.81 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। यह आंकड़ा देश में कुल विदेशी निवेश से संबंधित है, न कि केवल तंबाकू कारोबार से। तंबाकू सेक्टर में प्रस्तावित बदलाव अभी चर्चा के स्तर पर है। सरकार को इस पर अंतिम निर्णय लेना बाकी है। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो फ्रेंचाइजी, ट्रेडमार्क, ब्रांड नाम और प्रबंधन समझौतों के जरिए विदेशी कंपनियों के सहयोग की मौजूदा व्यवस्था बदल सकती है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार इस पर कब तक निर्णय लेगी।