आरबीआई: 'मामूली एमडीआर शुल्क से यूपीआई वॉल्यूम पर असर नहीं', एमपीसी के बाद और क्या बोले गवर्नर संजय मल्होत्रा
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि 0.4% एमडीआर शुल्क से यूपीआई वॉल्यूम प्रभावित नहीं होगा। वहीं आरबीआई ने रेपो रेट 25 BPS बढ़ाकर 5.5% कर दिया है। जानिए महंगाई, जीडीपी ग्रोथ और एमएसएमई पर इसके प्रभाव का पूरा विश्लेषण।
विस्तार
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने अपनी द्विमासिक समीक्षा में बड़ा फैसला लेते हुए रेपो रेट में 25 आधार अंकों (0.25%) की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया है। इसके साथ ही नीतिगत रुख को बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' (सोच-समझकर सख्ती) कर दिया गया है।
पॉलिसी के एलान के बाद संवाददाताओं से बातचीत में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने यूपीआई पर लगने वाले मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) पर स्थिति साफ करते हुए कहा, "एमडीआर पर फैसला पहले ही लिया जा चुका है। अभी तक हमें यूपीआई वॉल्यूम में कोई गिरावट नहीं दिखी है। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि एक छोटे से शुल्क से यूपीआई वॉल्यूम पर कोई असर नहीं पड़ेगा।" दरों में इस बढ़ोतरी और सख्त रुख के साथ रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें बढ़ाने का नया चक्र शुरू कर दिया है, जिससे निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना पूरी तरह खत्म हो गई है।
एमडीआर शुल्क पर आरबीआई गवर्नर ने क्या कहा?
15 अक्तूबर से लागू होने जा रहे नए यूपीआई फ्रेमवर्क के तहत 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत का एमडीआर लागू होगा। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट किया कि इस नाममात्र शुल्क से डिजिटल भुगतानों की रफ्तार धीमी नहीं होगी।
सरकार और आरबीआई के स्पष्टीकरण के अनुसार सभी पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांजैक्शन और 2,000 रुपये तक के मर्चेंट पेमेंट्स पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। इस वजह से लगभग 96% P2M ट्रांजैक्शन अप्रभावित रहेंगे। 75,000 रुपये या उससे अधिक के ट्रांजैक्शन पर अधिकतम एमडीआर 300 रुपये तय किया गया है। वहीं रेलवे, टेलीकॉम, इंश्योरेंस, फ्यूल और कृषि इनपुट जैसे आवश्यक सेक्टरों में 2,000 रुपये से ऊपर के ट्रांजैक्शन पर महज 5 रुपये का फ्लैट एमडीआर लगेगा।
आरबीआई ने रेपो रेट क्यों बढ़ाया?
अगस्त में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.82 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 5.9 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो आरबीआई के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर है। कमजोर मॉनसून, वैश्विक कमोडिटी (मेटल, फूड, एनर्जी) की ऊंची कीमतों और सप्लाई चेन की रुकावटों के कारण महंगाई का दबाव बढ़ा है। इसे नियंत्रित करने के लिए एमपीसी ने रेपो रेट को 5.25% से बढ़ाकर 5.50% कर दिया है। 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' का रुख अपनाकर आरबीआई ने रेट कट के दरवाजे बंद कर दिए हैं और दरें बढ़ाने का चक्र शुरू कर दिया है। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया है।
वैश्विक अनिश्चितताओं पर अर्थशास्त्रियों की क्या राय है?
ब्याज दरों में बढ़ोतरी के बावजूद घरेलू आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 40 आधार अंक बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है।केयरएज रेटिंग्स की मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा के अनुसार, ग्रोथ 7.3 प्रतिशत तक जा सकती है, लेकिन वैश्विक कमोडिटी और महंगाई के अप्रत्यक्ष असर से सतर्क रहना होगा। जेएम फाइनेंशियल के अर्थशास्त्री हितेश सुवर्णा का कहना है कि भारत-अमेरिका ब्याज दर अंतर घटने से कैपिटल अकाउंट पर दबाव पड़ा और सितंबर 2026 में विदेशी मुद्रा भंडार में 38 अरब डॉलर की कमी आई, जिससे आरबीआई को दरें पहले बढ़ानी पड़ीं।
बीवाईएसटी की लक्ष्मी वेंकटरमन वेंकटेशन का मानना है कि एफसीएनआर फंड से बढ़ी लिक्विडिटी को देखते हुए आरबीआई भविष्य में सीआरआर (वर्तमान 3%) और एसएलआर (वर्तमान 18%) में 25-50 बीपीएस की बढ़ोतरी पर विचार कर सकता है।
ब्याज दरें बढ़ने से एमएसएमई और अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
रेपो रेट बढ़ने से बैंकों की उधारी महंगी होगी, जिसका सीधा असर एमएसएमई सेक्टर के कार्यशील पूंजी लोन और लोन की किस्तों पर पड़ेगा। कैप्रि लोन्स के एमडी राजेश शर्मा और एलआईसी म्यूचुअल फंड के सीआईओ राहुल सिंह के अनुसार, ऊंची दरों से खपत, निवेश और क्रेडिट मांग में कुछ कमी आ सकती है, लेकिन मैक्रो इकोनॉमिक स्थिरता बनाए रखने के लिए यह कदम जरूरी था।
आरबीआई का यह फैसला संदेश देता है कि एक तरफ डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को टिकाऊ बनाने के लिए नाममात्र एमडीआर का समर्थन किया गया है, वहीं दूसरी तरफ महंगाई को काबू में करने के लिए कड़े मौद्रिक कदम उठाए गए हैं। मजबूत घरेलू मांग के दम पर भारत 7.1% की विकास दर हासिल करने की राह पर है, भले ही फिलहाल सस्ते कर्ज का दौर समाप्त हो चुका है।