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सीजी हाईकोर्ट का निर्देश: अदालतों में अब महिला के चरित्र पर टिप्पणी नहीं, यौन अपराधों में संवेदनशील भाषा अपनाए

Mon, 31 Aug 2026 04:29 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायपुर Published by: शबाहत हुसैन Updated Mon, 31 Aug 2026 04:29 PM IST
सार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने यौन अपराधों और महिलाओं से जुड़े मामलों में लैंगिक रूप से संवेदनशील भाषा अपनाने के निर्देश दिए हैं। अदालतों और पुलिस दस्तावेजों में अपमानजनक शब्दों पर रोक रहेगी। महिला के चरित्र, पहनावे और निजी जीवन को फैसले का आधार नहीं बनाया जाएगा।

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Chhattisgarh High Court directive: No more comments on a woman's character in courts.
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय - फोटो : C.G. High Court

विस्तार

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य की पुलिस, निचली अदालतों और संबंधित सरकारी विभागों को लैंगिक रूप से संवेदनशील भाषा अपनाने के निर्देश दिए हैं। यौन अपराधों और महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मामलों में पीड़िता की गरिमा और निजता की रक्षा के लिए यह व्यवस्था लागू की जा रही है। उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप जारी आदेश का उद्देश्य प्राथमिकी दर्ज होने से लेकर अंतिम फैसले तक ऐसी शब्दावली के इस्तेमाल पर रोक लगाना है, जिससे महिला के सम्मान को ठेस पहुंचती हो।

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‘यौन हमला’ और ‘शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल
उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि यौन अपराधों के मामलों में संदर्भ के अनुसार सर्वाइवर, विक्टिम या शिकायतकर्ता जैसे सम्मानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जाए। पुलिस और न्यायिक दस्तावेजों से पुराने और रूढ़िवादी संबोधनों को हटाया जाएगा। अदालत ने ‘अस्मत’ और ‘शील भंग’ जैसे पारंपरिक शब्दों के बजाय ‘यौन हमला’ अथवा ‘शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन’ जैसे स्पष्ट और तटस्थ शब्दों के इस्तेमाल का निर्देश दिया है।

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‘चरित्रहीन’, ‘लाचार महिला’ और ‘वेश्या’ जैसे शब्दों पर रोक
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि महिला के पहनावे, चरित्र या निजी जीवन को न्यायिक फैसले का आधार नहीं बनाया जाएगा। अदालतें केवल उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित कानून के आधार पर ही निर्णय लेंगी। ‘चरित्रहीन’, ‘लाचार महिला’ और ‘वेश्या’ जैसे अपमानजनक संबोधनों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। जरूरत होने पर केवल मामले से जुड़े तथ्यात्मक विवरण दर्ज किए जाएंगे।

संवेदनशील मामलों में बंद कमरे में सुनवाई
पीड़ितों और गवाहों को सामाजिक दबाव और सार्वजनिक चर्चा से बचाने के लिए संवेदनशील मामलों में बंद कमरे में सुनवाई की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीड़िता की निजता और गरिमा की रक्षा करना है।

24 जिला एवं सत्र न्यायालयों को भेजी आदेश की प्रति
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश की प्रति राज्य के सभी 24 जिला एवं सत्र न्यायालयों को भेजी है। इसके अलावा गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और महिला एवं बाल विकास विभाग को भी निर्देशों का तत्काल पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है। उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यीय समिति की सिफारिशों के बाद राज्य स्तर पर इन निर्देशों को लागू किया जा रहा है।

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