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कौन थीं रानी दुर्गावती?: मुगलों के सामने नहीं झुकाया सिर, आखिरी सांस तक लड़ीं; जानें इतिहास में कैसे हुईं अमर
Mon, 05 Oct 2026 10:11 AM IST
शिवम तिवारी
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवम तिवारी
Updated Mon, 05 Oct 2026 10:11 AM IST
सार
Rani Durgavati: रानी दुर्गावती गोंडवाना की वीर और लोकप्रिय शासक थीं। पति की मृत्यु के बाद उन्होंने कम उम्र में राज्य की जिम्मेदारी संभाली और प्रजा के हित में काम किया। मुगल सेना के खिलाफ उन्होंने बहादुरी से युद्ध किया। अंतिम लड़ाई में गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद आत्मसमर्पण नहीं किया और दुश्मन के हाथों बंदी बनने के बजाय अपनी कटार से प्राण त्याग दिए।
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रानी दुर्गावती
- फोटो : AI Generated
विस्तार
वह बहादुर थीं। स्वाभिमान से भरी हुई थीं। प्रजा प्रिय थीं। लोक कल्याण उनके खून में था। शानदार लीडर थीं। प्रजा का प्यार उनके हिस्से खूब आता था। मुगलों को एक नहीं, कई बार कड़ी चुनौती दी। लेकिन अपनों की धोखेबाजी ने उन्हें युद्ध के मैदान में घेर लिया। कई तीर लगे। शरीर छलनी हो गया। उन्हें लगा कि अब जान बचना मुश्किल है। दुश्मन उन्हें गिरफ्तार कर सकता है, बंदी बना सकता है। लेकिन वह दुश्मन के हाथों पड़ना नहीं चाहती थीं। आखिरकार अपनी ही कटार से सर्वोच्च बलिदान देने से भी नहीं चूकीं।
भारतीय इतिहास में उन्हें वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम से जाना जाता है। हालांकि, आज यानी 5 अक्तूबर को उनकी बर्थ एनिवर्सिरी भी है। वह गोंडवाना की ऐसी शासक थीं, जिन्होंने पति की असमय मृत्यु के बाद कम उम्र में राज्य की जिम्मेदारी संभाली और अपनी सूझबूझ से शासन को मजबूत किया। उन्होंने प्रजा के हितों को प्राथमिकता दी और बाहरी हमलों के सामने मजबूती से डटी रहीं। उनकी कहानी सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि साहस, स्वाभिमान, नेतृत्व और मातृभूमि के लिए दिए गए बलिदान की ऐसी गाथा है, जिसे आज भी याद किया जाता है।
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किससे हुआ था रानी दुर्गावती का विवाह?
बड़े होने पर रानी दुर्गावती का विवाह गोंडवाना राज्य के राजकुमार दलपत शाह से हुआ। विवाह के बाद वह गोंडवाना की राजनीति और शासन व्यवस्था से जुड़ीं। दलपत शाह के साथ उनका वैवाहिक जीवन ज्यादा लंबा नहीं रहा। विवाह के करीब चार साल बाद ही उनके पति का निधन हो गया। उस समय उनका पुत्र वीर नारायण बहुत छोटा था। पति की मृत्यु के बाद राज्य की जिम्मेदारी रानी दुर्गावती के कंधों पर आ गई। एक महिला शासक के सामने उस दौर में कई चुनौतियां थीं, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों से हार मानने के बजाय खुद शासन संभालने का फैसला किया।
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भारतीय इतिहास में उन्हें वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम से जाना जाता है। हालांकि, आज यानी 5 अक्तूबर को उनकी बर्थ एनिवर्सिरी भी है। वह गोंडवाना की ऐसी शासक थीं, जिन्होंने पति की असमय मृत्यु के बाद कम उम्र में राज्य की जिम्मेदारी संभाली और अपनी सूझबूझ से शासन को मजबूत किया। उन्होंने प्रजा के हितों को प्राथमिकता दी और बाहरी हमलों के सामने मजबूती से डटी रहीं। उनकी कहानी सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि साहस, स्वाभिमान, नेतृत्व और मातृभूमि के लिए दिए गए बलिदान की ऐसी गाथा है, जिसे आज भी याद किया जाता है।
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कहां हुआ था रानी दुर्गावती का जन्म?
रानी दुर्गावती का जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित कालिंजर किले में हुआ था। वह चंदेल राजवंश के राजा कीर्तिसिंह की इकलौती संतान थीं। उनका जन्म दुर्गाष्टमी के दिन हुआ था, इसलिए उनका नाम दुर्गावती रखा गया। बचपन से ही उनमें साहस और नेतृत्व के गुण दिखाई देने लगे थे। वह घुड़सवारी, तीरंदाजी और हथियार चलाने में भी कुशल थीं। राजपरिवार में जन्म लेने के बावजूद उनका जीवन केवल महल तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कम उम्र से ही युद्धकला सीखी और आगे चलकर यही प्रशिक्षवह बहादुर थीं. स्वाभिमान से भरी हुई थीं. प्रजा प्रिय थीं. लोक कल्याण उनके खून में था. शानदार लीडर थीं. प्रजा का प्यार उनके हिस्से खूब आता था. मुगलों को एक नहीं, अनेक बार धूल चटाया. पर, अपनों की धोखेबाजी से युद्ध के मैदान में घिर गईं. कई तीर लगे. उन्हें लगा कि जान नहीं बचेगी. दुश्मन गिरफ्तार कर सकता है या उन्हें छू सकता है तो अपनी ही कटार से सर्वोच्च बलिदान देने से भी नहीं चूकीं. ण उनके जीवन की सबसे बड़ी ताकत बना।
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किससे हुआ था रानी दुर्गावती का विवाह?
बड़े होने पर रानी दुर्गावती का विवाह गोंडवाना राज्य के राजकुमार दलपत शाह से हुआ। विवाह के बाद वह गोंडवाना की राजनीति और शासन व्यवस्था से जुड़ीं। दलपत शाह के साथ उनका वैवाहिक जीवन ज्यादा लंबा नहीं रहा। विवाह के करीब चार साल बाद ही उनके पति का निधन हो गया। उस समय उनका पुत्र वीर नारायण बहुत छोटा था। पति की मृत्यु के बाद राज्य की जिम्मेदारी रानी दुर्गावती के कंधों पर आ गई। एक महिला शासक के सामने उस दौर में कई चुनौतियां थीं, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों से हार मानने के बजाय खुद शासन संभालने का फैसला किया।
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