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विचार: आस्था और अनुशासन का अद्भुत संगम है कांवड़ यात्रा

Mon, 27 Jul 2026 02:28 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र आचार्य डॉ. विक्रमादित्य
आचार्य डॉ. विक्रमादित्य Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 27 Jul 2026 02:28 PM IST
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Kanwar Yatra in Sawan Month Lord Shiv UP Govt CM Yogi Adityanath
कांवड़ यात्रा - फोटो : संवाद
हमारी पौराणिक मान्यता है कि शिव की भक्ति ही सबसे बड़ा तीर्थ है और सबसे बड़ा तप भी। श्रावण मास में प्रवाहित होने वाली कांवड़ यात्रा भी ऐसा ही तप है जो भक्तों के संकल्प को मूर्त रूप देता है। कांधे पर गंगाजल, नंगे पांव, सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करके शिवालयों तक पहुंचना। वस्तुतः यह यात्रा केवल जलाभिषेक की परंपरा नहीं, बल्कि तप, संयम और समर्पण की उस त्रिवेणी का प्रवाह है, जो सनातन परंपरा में सदियों से अनवरत बह रहा है। इतनी विराट, इतनी संवेदनशील और इतनी विशाल आस्था की धारा को सुव्यवस्थित रूप देना, उसे अनुशासन की मर्यादा में बांधकर उसकी गरिमा को अक्षुण्ण रखना, यह ऐसी प्रशासनिक दृढ़ता से संभव होता है जो श्रद्धा के महत्व को समझती है।
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कांवड़ यात्रा के दृष्टिगत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं अधिकारियों को जिस गंभीरता से आगाह किया है, वह इस बात का प्रमाण है कि सरकार के लिए यह यात्रा प्रशासनिक चुनौती ही नहीं, करोड़ों हृदयों की आस्था का प्रश्न है। कांवड़ यात्रा के दौरान रुहेलखंड, ब्रज, बुंदेलखंड, अवध, पूर्वांचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश अर्थात प्रदेश के लगभग हर जिले में आस्था की हिलोरें उठती हैं। ऐसे विराट फलक पर मुख्यमंत्री का यह निर्देश कि हर जिले में व्यवस्था का स्तर समान होना चाहिए, दर्शाता है कि सरकार की दृष्टि समावेशी है और उसके लिए हर श्रद्धालु के मायने हैं।
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मुख्यमंत्री ने हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली व उत्तराखंड के अधिकारियों से समन्वय स्थापित करने और वहां के कांवड़ संघों से नियमित संवाद बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। यह पहल दर्शाती है कि आस्था की मर्यादा केवल एक राज्य की सीमा में नहीं बंधी, अपितु उसे अंतरराज्यीय समन्वय के माध्यम से एक समरूप, सुसंगत स्वरूप देने का प्रयत्न किया जा रहा है।

मार्गों पर पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था, स्वच्छता, पेयजल, शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं के साथ ही चिकित्सा शिविरों को प्रभावी ढंग से संचालित करने, तथा एंटी वेनम और एंटी रैबीज इंजेक्शन सहित आवश्यक औषधियों की पर्याप्त उपलब्धता भी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। अनुशासन की यह व्यवस्था बहुआयामी है और इसका एक अत्यंत संवेदनशील पक्ष खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है। कांवड़ यात्रा मार्ग पर मांस-मदिरा की दुकानें बंद रखी जाएंगी, ताकि श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को कोई ठेस न पहुंचे। प्रत्येक दुकान पर संचालक का नाम स्पष्ट रूप से प्रदर्शित रहने की व्यवस्था पारदर्शिता और उत्तरदायित्व, दोनों को सुनिश्चित करती है। साथ ही डीजे की ध्वनि निर्धारित मानकों के अनुरूप रखने और कानफोड़ू आवाज को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार न करने का निर्देश यह दर्शाता है कि भक्ति के इस उत्सव में उल्लास तो हो, किंतु वह मर्यादा की सीमा को न लांघे।
 

इस संपूर्ण व्यवस्था का एक और गंभीर पक्ष यह है कि इसमें राज्य की सांस्कृतिक प्रतिबद्धता भी परिलक्षित होती है। जब कोई सरकार वर्षों तक निरंतर, बिना किसी व्यवधान के, इतने विशाल जनसमूह की आस्था को सम्मान और सुरक्षा प्रदान करती है, तो सभ्यतागत विरासत की रक्षा भी करती है।  कांवड़ यात्रा में आस्था और अनुशासन का यह संगम इस सत्य को प्रतिपादित करता है कि श्रद्धा जब समुचित व्यवस्था के साथ संयुक्त होती है, तो वह अधिक प्रभावशाली, अधिक सुरक्षित और अधिक समावेशी बन जाती है।

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक आचार्य डॉ. विक्रमादित्य विवेकानंद प्रतिष्ठान के पीतांबरा पीठाधीश एवं अध्यक्ष हैं।)
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