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China-Gakao vs NEET: अपनी परीक्षा के बहाने भारत को घेरने की ताक में चीन, संसदीय समिति की नसीहत को बनाया ढाल

सीमा शर्मा, अमर उजाला Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Fri, 12 Jun 2026 01:32 PM IST
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सार

नीट पेपर लीक विवाद और परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों के बीच भारत में चीन की दूतावास अधिकारी के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने नई बहस छेड़ दी। लेख में दावा किया गया है कि चीन ने अपनी गाओकाओ परीक्षा की सफलता का उदाहरण देकर भारत की कमियों को वैश्विक स्तर पर उजागर करने की कोशिश की। साथ ही यह तर्क दिया गया है कि भारत का लोकतंत्र अपनी खामियों पर खुली बहस की अनुमति देता है, जबकि चीन की व्यवस्था में कमियों और घोटालों पर सार्वजनिक चर्चा की गुंजाइश सीमित है। आइए, विस्तार से इस मामले को समझते हैं...
 

China-Gaokao vs NEET attempts corner India over its exams using parliamentary committees advice as shield
भारत को घेरने की ताक में चीन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

नीट पेपर लीक की शर्म अभी ताजी थी। लाखों छात्रों का भविष्य अधर में लटका था और संसद से लेकर सड़क तक हंगामा बरपा था। ठीक इसी नाजुक मोड़ पर भारत में चीन की दूतावास अधिकारी यू जिंग ने एक्स पर एक पोस्ट किया... और उनका यह तीर सीधे हमारी राजनीतिक दरारों पर जाकर लगा। यू जिंग ने लिखा कि चीन की गाओकाओ परीक्षा का उल्लेख किया। यह भारत की जेईई और नीट का मिला-जुला रूप है। गाओकाओ में मात्र दो दिनों में 1.3 करोड़ छात्रों के लिए बिना किसी व्यवधान के संपन्न हो गई। इसके लिए चीन के कारखाने रुके, सड़कें सूनी रहीं और पूरा देश अपने छात्रों के लिए एकजुट हो गया। चीनी राजनयिक ने अपने ट्वीट में किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन हैशटैग में नीट, जेईई और इंडिया लिखकर निशाना बिल्कुल साफ कर दिया।

जख्म पर नमक छिड़कने की चीनी टाइमिंग

यह पोस्ट महज एक संयोग नहीं, बल्कि बीजिंग की सोची-समझी कूटनीतिक खुराफात का हिस्सा है। ये पोस्ट ठीक उसी समय दागा गया जब भारत की संसदीय स्वास्थ्य समिति ने एनटीए और संबंधित मंत्रालयों के अधिकारियों को तलब कर नसीहत दी थी कि इतनी बड़ी परीक्षाओं के पारदर्शी संचालन के लिए हमें चीन की व्यवस्था से सीखना चाहिए। हमारी अपनी संसदीय समिति ने आत्ममंथन के लिए जिस मॉडल का जिक्र किया, चीन ने अगले ही दिन भारत को वैश्विक स्तर पर नीचा दिखाने के लिए उसे एक मनोवैज्ञानिक हथियार की तरह भुना लिया। जब देश अपने बच्चों के भविष्य को लेकर संवेदनशील और फिक्रमंद हो, तब एक विदेशी दूतावास द्वारा इस तरह जख्मों पर नमक छिड़कना उसकी शातिर फितरत को ही बयां करता है।
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बच्चे अनिश्चितता के भंवर में, नेता जुबानी जंग में

पेपर लीक के आरोप लगे, सीबीआई जांच शुरू हुई और एनटीए के शीर्ष अधिकारियों पर गाज गिरी। व्यवस्था को दोबारा परीक्षा कराने के दौर से गुजरना पड़ रहा है। उधर सीबीएसई के 17.50 लाख बारहवीं के छात्र डिजिटल मूल्यांकन की गड़बड़ियों से अलग परेशान हैं। साढ़े चार लाख छात्रों ने आंसर शीट की पीडीएफ मांगी, तो 11.50 लाख से अधिक ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया। विडंबना देखिए कि देश के इन नौनिहालों के लिए न तो सत्ता पक्ष की ओर से कोई संवेदनशीलता दिखी और न ही विपक्ष की ओर से कोई रचनात्मक समाधान आया।
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राहुल गांधी से लेकर तमाम विपक्षी नेता शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगते रहे। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार भी है और काम भी। लेकिन जो काम नहीं हुआ, वह यह कि किसी एक भी विपक्षी दल ने यह आगे बढ़कर नहीं कहा कि संकट की इस घड़ी में हम दलगत राजनीति से ऊपर उठकर परीक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए सरकार के साथ बैठने को तैयार हैं। इस्तीफे की मांग करना महज सियासत है, जबकि बच्चों का भविष्य बचाना राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। दोनों का फर्क हमारे नेताओं को समझना होगा। चीनी अधिकारी ने जब लिखा कि 'पूरा देश एकजुट हो गया', तो यह तीखा व्यंग्य सिर्फ सरकार की नाकामी पर नहीं, बल्कि भारत के बंटे हुए राजनीतिक नेतृत्व पर भी था।

लोहे के पर्दे के पीछे छुपा गाओकाओ का सच

  • चीन खुद को परीक्षा शुचिता का मसीहा साबित करने की कोशिश तो कर रहा है, लेकिन उसकी अपनी व्यवस्था का सच लोहे के पर्दे के पीछे कैद है। गाओकाओ परीक्षा में भी प्रॉक्सी परीक्षार्थियों का संगठित सिंडिकेट, हाई-टेक ब्लूटूथ डिवाइस से सामूहिक नकल और अधिकारियों की मिलीभगत से पेपर लीक होने का एक लंबा और काला इतिहास रहा है।
  • फर्क सिर्फ इतना है कि चीन एक अधिनायकवादी कम्युनिस्ट देश है, जहाँ सच बोलने वाली जुबानों को खामोश कर दिया जाता है और राज्य के पास खबरों को दफन करने की असीमित ताकत है। वहाँ की कमियों पर इंटरनेशनल मीडिया या सोशल मीडिया में चर्चा तक करने की आजादी किसी नागरिक को नहीं है। ऐसे में अपनी दमनकारी गोपनीयता को अनुशासन का नाम देकर भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र को ज्ञान देना चीन का दोहरा मापदंड है।

लोकतंत्र कमजोरी नहीं, पर आत्ममंथन जरूरी

भारत में गड़बड़ी होने पर खबरें छपती हैं, विपक्ष संसद सिर पर उठाता है और अदालतें सरकार को कटघरे में खड़ा करती हैं। यह हमारी व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की वो ताकत है जो चीन के पास कभी नहीं हो सकती। लेकिन इस ताकत की सार्थकता तभी है जब हम इस खुलेपन का इस्तेमाल व्यवस्थागत सुधार के लिए करें, न कि केवल एक-दूसरे को राजनीतिक रूप से नीचा दिखाने और दुश्मनों को हंसने का मौका देने के लिए।
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