CISF: सीआईएसएफ DG ने 'अटकी पदोन्नति' का निकाला तोड़, 176 इंस्पेक्टरों को लोकल रैंक के साथ बनाया सहायक कमांडेंट
सीएपीएफ में पदोन्नति ठहराव से इंस्पेक्टर 15 साल से बिना प्रमोशन हैं। 4800 ग्रेड पे वालों को 5400 देने के अदालती आदेश के बावजूद लाभ नहीं मिला। सीआईएसएफ डीजी ने 176 इंस्पेक्टरों को ‘लोकल रैंक’ एसी बनाया, पर वेतन-वरिष्ठता लाभ नहीं दिए गए।
विस्तार
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कई रैंकों में पदोन्नति को लेकर ठहराव दिखाई पड़ रहा है। यूपीएससी से सीधी भर्ती के जरिए सीएपीएफ में बतौर सहायक कमांडेंट नियुक्ति पाने वाले अफसरों को 15 साल में भी पहली पदोन्नति नहीं मिल रही। इन बलों में इंस्पेक्टरों की भी यही स्थिति है, लगभग डेढ़ दशक में इन्हें सहायक कमांडेंट का पद नहीं मिल सका। जिन इंस्पेक्टरों का 4800 रुपये का 'ग्रेड पे' है और वे उसमें चार साल की सेवा पूरी कर चुके हैं, उन्हें 5400 रुपये का 'ग्रेड पे' मिलेगा। इस नियम का पालन नहीं हो रहा। ये मामले शीर्ष अदालत में पहुंचे हैं। इस बीच सीआईएसएफ डीजी ने 'पदोन्नति में ठहराव' का तोड़ निकाला है। डीजी प्रवीर रंजन ने अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 176 इंस्पेक्टरों (एग्जीक्यूटिव) को 'लोकल रैंक' देकर 'सहायक कमांडेंट' (एग्जीक्यूटिव) बना दिया है।
क्या है लोकल रैंक का मतलब
सूत्रों के मुताबिक, 'नियम-5' ऑफ सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स रूल्स, 2001, के तहत सीआईएसएफ डीजी को यह पावर दी गई है कि वे फोर्स की बेहतरी के लिए कमांडेंट स्तर तक 'लोकल रैंक' प्रदान कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए डीजी को केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होती है। अगर सरकार से लोकल रैंक वाली फाइल को मंजूरी नहीं मिलती तो फिर पदोन्नति का मामला आगे नहीं बढ़ता। खास बात है कि सीआईएसएफ डीजी प्रवीर रंजन ने जिन 176 इंस्पेक्टरों (एग्जीक्यूटिव) को 'लोकल रैंक' देकर 'सहायक कमांडेंट' (एग्जीक्यूटिव) बनाया है, उनके पास रैंक के हिसाब से पूरे अधिकार रहेंगे। वे एसी पद की सभी शक्तियां इस्तेमाल करेंगे। बता दें कि यह रैंक उसी वक्त तक है, जब तक डीजी चाहेंगे। वे चाहें तो कभी भी उक्त रैंक को वापस भी ले सकते हैं।
वेतन भत्ते और वरिष्ठता का फायदा नहीं मिलेगा
'लोकल रैंक' के जरिए 'सहायक कमांडेंट' (एग्जीक्यूटिव) बनाए गए सभी अधिकारियों को 'एसी' की वर्दी मिलेगी। कामकाज भी एसी वाला ही करेंगे। मुख्य बात है कि इन्हें 'एसी' रैंक में अतिरिक्त वेतन भत्ते नहीं मिलेंगे। इतना ही नहीं, 'लोकल रैंक' से 'सहायक कमांडेंट' बने अफसरों को वरिष्ठता का फायदा नहीं मिलेगा। सूत्रों का कहना है कि सीएपीएफ के इंस्पेक्टरों को 5400 का 'ग्रेड पे' दिए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में है। वे जीत भी चुके हैं। हालांकि अभी तक सभी इंस्पेक्टरों को यह फायदा नहीं मिल सका है। सीआईएसएफ डीजी ने पदोन्नति में आए ठहराव के मद्देनजर ही 'लोकल रैंक' देने का निर्णय लिया है।
'सीआरपीएफ' के सैंकड़ों इंस्पेक्टरों को मिली जीत
पिछले दिनों, लंबे समय से अदालत में अपने हितों की लड़ाई सीआरपीएफ इंस्पेक्टरों को दोहरी जीत मिली है। इंस्पेक्टर गजेंद्र सिंह, सुरेश कुमार यादव व अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीएफ/सरकार की एसएलपी खारिज कर दी है। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जिन इंस्पेक्टरों का 4800 रुपये का 'ग्रेड पे' है और वे उसमें चार साल की सेवा पूरी कर चुके हैं, उन्हें 5400 रुपये का 'ग्रेड पे' मिलेगा। बता दें कि यह ग्रेड 'पे' सहायक कमांडेंट का होता है। इसके खिलाफ सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी। दूसरा, सीआरपीएफ इंस्पेक्टर सुरेश यादव व अन्य 71 इंस्पेक्टरों ने दिल्ली हाईकोर्ट में अवमानना याचिका लगाई थी। इसमें कहा गया था कि सीआरपीएफ, हाईकोर्ट के फैसले को लागू नहीं कर रही है। इस केस में हाईकोर्ट ने सीआरपीएफ/सरकार को नोटिस जारी कर दिया है। केस की अगली सुनवाई 18 मई को होगी है।
सबसे पहले आईटीबीपी इंस्पेक्टर को मिला फायदा
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में वित्त मंत्रालय का 2008 में जारी हुआ एक कार्यालय ज्ञापन (ओएम) लागू नहीं किया जा रहा। ये 'ओएम', केंद्र सरकार के बाकी सभी विभागों में तो लागू होता है, लेकिन केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के इंस्पेक्टरों को इससे बाहर रखा जा रहा है। इस ओएम में कहा गया है कि जिन कर्मियों का 4800 रुपये का 'ग्रेड पे' है और वे उसमें चार साल की सेवा कर चुके हैं तो उनका 'ग्रेड पे' 5400 रुपये हो जाएगा। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में इस नियम को लागू कराने के लिए निरीक्षकों को अदालत की शरण लेनी पड़ रही है। सबसे पहले आईटीबीपी इंस्पेक्टर सुशील कुमार ने यह लड़ाई जीती थी। अब उन्हें 5400 रुपये का ग्रेड पे और सहायक कमांडेंट का पद मिल गया है। हालांकि सुशील कुमार ने सुप्रीम कोर्ट से अपने हक की लड़ाई जीती है। उनके मामले में सरकार, सुप्रीम में एलएलपी में गई थी। जब एसएलपी खारिज हुई तो सरकार, रिव्यू पिटीशन में चली गई। दोनों ही मामलों में सरकार को हार का सामना करना पड़ा।
बीएसएफ/सीआरपीएफ इंस्पेक्टरों की लड़ाई
इसके बाद बीएसएफ के इंस्पेक्टर भी अदालत पहुंचे। उन्हें भी जीत मिली। सीआरपीएफ के इंस्पेक्टर 'जीडी' और 'फार्मासिस्ट' को भी दिल्ली हाईकोर्ट में जीत मिल गई। दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस हरि शंकर और ओम प्रकाश शुक्ला ने अपने फैसले में कहा, आईटीबीपी के इंस्पेक्टर सुशील कुमार के केस की तर्ज पर सीआरपीएफ के इंस्पेक्टरों को भी उक्त वित्तीय फायदा दिया जाए। दिल्ली हाईकोर्ट ने आठ सप्ताह के भीतर यह फैसला लागू करने के लिए कहा था। जब इस पर कोई अमल नहीं हुआ तो इंस्पेक्टरों ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका लगाई।
15 साल से नहीं मिल रही पदोन्नति
सीआरपीएफ के इंस्पेक्टर सुरेश कुमार यादव एवं अन्य 'रिट पिटीशन संख्या 6179/2025' के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस हरि शंकर और ओम प्रकाश शुक्ला ने 15 अक्तूबर 2025 को इस मामले की सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया था। इससे अगले दिन यानी 16 अक्तूबर को रिट पिटीशन संख्या 16003/2025 सीताराम बरवाल एवं अन्य को लेकर भी दिल्ली हाईकोर्ट ने यही फैसला दिया। यह केस, सीआरपीएफ के दो सौ से ज्यादा इंस्पेक्टरों 'फार्मासिस्ट' ने किया था। दूसरे केस में सीआरपीएफ के 70 से ज्यादा इंस्पेक्टर 'जीडी' शामिल हैं। इस केस में वरिष्ठ अधिवक्ता अंकुर छिब्बर और निकुंज अरोड़ा के साथ तमाल सान्याल बतौर सहयोगी की भूमिका में रहे हैं। सीआरपीएफ इंस्पेक्टरों को एक ही रैंक में काम करते हुए लगभग 15 साल हो गए हैं, लेकिन उन्हें पदोन्नति नहीं मिल रही। खास बात है कि इन्हें पदोन्नति देना तो दूर की बात, 5400 रुपये का ग्रेड पे भी नहीं दिया गया। इस हक के लिए भी केंद्रीय बलों के इंस्पेक्टरों को अदालत की शरण लेनी पड़ रही है।
दिल्ली हाईकोर्ट में दिए गए थे ये तर्क
आईटीबीपी निरीक्षक सुशील कुमार के मामले में अदालत की सुनवाई में बताया गया कि वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने 29 अगस्त 2008 को एक कार्यालय ज्ञापन जारी किया था। इसमें कहा गया था कि जिन कर्मियों का 4800 ग्रेड पे है और उन्होंने चार साल की नौकरी कर ली है, तो उनका ग्रेड पे 5400 हो जाएगा। इस मामले में सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स 'सीबीडीटी' में कार्यरत कर्मियों को यह फायदा नहीं मिला। इस मामले में सीबीडीटी के इंस्पेक्टर एम सुब्रमणयम, '167/2009' कैट में चले गए। कैट ने भी इंस्पेक्टर के पक्ष में फैसला नहीं दिया। उसके बाद एम सुब्रमणयम, मद्रास हाईकोर्ट '13225/2010' में चले गए। सरकार ने अदालत में कहा, आपको ये लाभ नहीं मिलेगा। जो पदोन्नत होकर आए हैं, उन्हीं को ये लाभ मिलेगा। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा, उक्त कर्मचारी को यह लाभ दिया जाए।
केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट में चली गई
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ, केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट 8883/2011 में चली गई। सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की सुनवाई के बाद सरकार को लताड़ लगाई। मद्रास हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा। केंद्र सरकार, इसके बाद भी संबंधित कर्मचारी को फायदा देने के लिए तैयार नहीं हुई। सरकार की अपील भी 10 अक्तूबर 2017 को डिसमिस हो गई। सरकार ने एक नहीं, बल्कि दो रिव्यू दो पेटिशन किए थे। ये भी 23 अगस्त 2018 को डिसमिस कर दिए गए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इस मामले में जो एसएलपी रिजेक्ट की गई थी, केस का वही स्टे्टस रहेगा। इसके बाद सीबीडीटी ने भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला मंजूर कर लिया।
सरकार ने कहा, 'ग्रुप बी' में ही लागू होगा
सुप्रीम कोर्ट में याचिका रद्द होने के बाद केंद्र सरकार ने ग्रुप 'बी' में यह आदेश लागू कर दिया। मतलब, वित्त मंत्रालय के 2008 में जारी कार्यालय ज्ञापन 'ओएम' के अनुसार, जिन कर्मियों का 4800 रुपये का ग्रेड पे है और उन्होंने चार साल की नौकरी कर ली है, उनका ग्रेड पे 5400 रुपये हो जाएगा, ये फायदा दे दिया। सरकार ने कहा, यह आदेश केवल ग्रुप बी वालों के लिए ही लागू होगा। हालांकि यह 'पे ग्रेड' तो 'ग्रुप ए' में भी आता है, लेकिन 'ग्रुप बी' में ही ये फायदा दिया गया। इसके पीछे वजह बताई गई कि 'ग्रुप बी' में कमजोर वर्ग है, उन्हें आर्थिक तौर पर सफल बनाना है। केंद्र सरकार ने उस वक्त एक नई शर्त लगा दी। सरकार ने कहा, सभी को ये फायदा नहीं मिलेगा, केवल पदोन्नति वालों को ही दिया जाएगा। खास बात है कि केंद्र सरकार ने सभी विभागों में यह फायदा दिया, लेकिन अर्धसैनिक बलों को इससे बाहर रखा। ग्रुप बी 'सिविल' वालों को लाभ मिला, लेकिन केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को नहीं दिया।
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