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एक्सप्लेनर: क्या है किशाऊ बांध परियोजना; इसकी लागत कितनी, निर्माण पूरा होने के बाद किस राज्य को कितना फायदा?

Wed, 16 Sep 2026 04:54 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Wed, 16 Sep 2026 04:54 PM IST
सार

किशाऊ परियोजना टोंस नदी पर बनने वाला बहुउद्देशीय बांध है। ₹15,624 करोड़ की इस परियोजना से छह राज्यों को सिंचाई, पेयजल और बिजली का लाभ मिलेगा। 1940 से प्रस्तावित यह परियोजना लंबे समय से राज्यों के बीच सहमति न बनने के कारण अटकी थी। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

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Explainer: Kishau Dam Project, What is it, what will it cost, and which states/UT will benefit?
किशाऊ बांध परियोजना - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर लंबे समय से चली आ रही कवायद अब आगे बढ़ने की स्थिति में है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में हुए इस समझौते के बाद छह राज्यों के बीच परियोजना को लेकर सहमति बनी।

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ऐसे में आइए जानते हैं कि क्या है किशाऊ परियोजना? इसकी लागत कितनी है? इससे क्या-क्या लाभ मिलेगा? इस परियोजना का विचार कब आया? यह इतने लंबे साल से क्यों अटकी थी? इससे क्या-क्या प्रभावित होगा? इसे कैसे बनाया जाएगा?

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क्या है किशाऊ परियोजना?

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित जल भंडारण और जलविद्युत परियोजना है। टोंस नदी यमुना की सहायक नदी है। परियोजना हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा से जुड़े क्षेत्र में है। इसके तहत मानसून के दौरान नदी में आने वाले पानी को बांध के पीछे जमा किया जाएगा और जरूरत के अनुसार नियंत्रित तरीके से छोड़ा जाएगा। 

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  • गृह मंत्री अमित शाह के मुताबिक, परियोजना में 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट का गुरुत्व बांध बनाया जाएगा। 
  • इसकी जल भंडारण क्षमता 1,562 मिलियन घन मीटर होगी। 
  • इससे करीब 97 हजार हेक्टेयर जमीन की सिंचाई होगी और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत पैदा होगी। शाह ने दिल्ली को परियोजना का सबसे बड़ा लाभार्थी बताया है।
  • परियोजना की प्रस्तावित कुल लागत करीब 15,624 करोड़ रुपये है। इसमें जल घटक की लागत करीब 12,096 करोड़ रुपये है।

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किशाऊ बांध परियोजना - फोटो : Amar Ujala

कब आया था परियोजना का विचार?

किशाऊ परियोजना की कहानी 1940 से शुरू होती है। इसी साल पहली बार इस परियोजना का विचार सामने आया था। 1944-45 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने परियोजना क्षेत्र का सर्वे कराया, लेकिन 1946 में जांच का काम रोक दिया गया।

1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने दोबारा सर्वे शुरू किया। 1964 में 235 मीटर ऊंचे बांध के प्रस्ताव के साथ प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट तैयार हुई और 1965 में इसे केंद्र सरकार को भेजा गया।

इसके बाद परियोजना की जगह को लेकर भूगर्भीय समस्या सामने आई। केंद्रीय जल आयोग ने प्रस्तावित स्थल पर बड़े भूगर्भीय फॉल्ट की पहचान की। इसके कारण बांध की जगह और डिजाइन को लेकर नए सिरे से अध्ययन करना पड़ा।

1970 में आगे की जांच हुई। 1978 में पत्थर भरकर बांध बनाने के प्रस्ताव के साथ परियोजना रिपोर्ट तैयार की गई, लेकिन भूगर्भीय जटिलताओं और बड़े फॉल्ट के कारण उस स्थल को भी उपयुक्त नहीं माना गया।

इसके बाद अटाल, सांबरखेड़ा और मोरार जैसी वैकल्पिक जगहों का अध्ययन किया गया। इनमें सांबरखेड़ा को कंक्रीट के गुरुत्व बांध के लिए उपयुक्त पाया गया। इसके आधार पर 1988 में परियोजना रिपोर्ट तैयार हुई और 1998 में इसे संशोधित किया गया।

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किशाऊ बांध परियोजना - फोटो : Amar Ujala

कब मिला राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा?

किशाऊ परियोजना को 2008 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया। इसके बाद हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की संयुक्त कंपनी किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाई गई। विशेष उद्देश्य कंपनी की प्रक्रिया 2015 में शुरू हुई और कंपनी 16 जनवरी 2017 को पंजीकृत हुई।

राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिलने के बावजूद परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। इसकी बड़ी वजह राज्यों के बीच परियोजना की लागत और उससे मिलने वाले लाभ के बंटवारे को लेकर सहमति न बनना थी।

1994 का समझौता क्यों था अहम?

किशाऊ परियोजना को लेकर 12 मई 1994 का समझौता भी महत्वपूर्ण है। इसके तहत यमुना बेसिन में बनने वाली अलग-अलग जल भंडारण परियोजनाओं के लिए अलग समझौते किए जाने की व्यवस्था बनी थी।

इसके बाद लखवार और रेणुकाजी परियोजनाओं को लेकर राज्यों के बीच चल रहे विवाद 2019 में सुलझे। इसके बाद किशाऊ परियोजना पर भी सहमति बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

16 जून 2026 को परियोजना को लेकर औपचारिक सहमति बनी और 15 सितंबर को छह राज्यों ने समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। नई व्यवस्था के तहत परियोजना के जल घटक का करीब 90 प्रतिशत वित्तीय भार केंद्र सरकार उठाएगी, जबकि बाकी 10 प्रतिशत हिस्सा भागीदार राज्य वहन करेंगे।

किस राज्य की सहमति अटकी थी?

किशाऊ परियोजना पर सहमति बनाने में सबसे बड़ी रुकावट हिमाचल प्रदेश की ओर से थी। राज्य करीब आठ साल तक समझौते पर हस्ताक्षर करने से पीछे रहा।

हिमाचल की चिंता मुख्य रूप से परियोजना की लागत और उससे मिलने वाले लाभ को लेकर थी। खासकर बिजली उत्पादन से जुड़े हिस्से की लागत राज्य के लिए बड़ा मुद्दा थी। राज्य का कहना था कि उसे परियोजना के लिए खर्च करना पड़ेगा, जबकि पानी का बड़ा फायदा नीचे की ओर स्थित राज्यों को मिलेगा।

पहले की व्यवस्था में हिमाचल प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने करीब 800 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई थी। बाद में राज्य सरकार ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई। इसके साथ परियोजना के कारण राज्य में जमीन डूबने और लोगों के प्रभावित होने की चिंता भी सामने आई।

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किशाऊ बांध परियोजना - फोटो : Amar Ujala

कितनी जमीन और कितने लोग प्रभावित होंगे?

  • 2020 के व्यवहार्यता अध्ययन के अनुसार परियोजना से करीब 2,950 हेक्टेयर जमीन डूबने का अनुमान लगाया गया था। इसमें उत्तराखंड की करीब 1,452 हेक्टेयर और हिमाचल प्रदेश की करीब 1,498 हेक्टेयर जमीन शामिल है।
  • परियोजना से 17 गांव प्रभावित होने का अनुमान है। इनमें उत्तराखंड के नौ और हिमाचल प्रदेश के आठ गांव हैं। करीब 5,500 लोगों के प्रभावित होने की बात कही गई है।

हिमाचल के लिए क्या व्यवस्था बनी?

नई व्यवस्था में हिमाचल प्रदेश के पानी और परियोजना के बिजली वाले हिस्से की लागत को आपस में जोड़ा गया है। हिमाचल के हिस्से का पानी दिल्ली और राजस्थान को देने पर सहमति बनी है। इसके बदले दिल्ली और राजस्थान हिमाचल के बिजली घटक की लागत में योगदान करेंगे। हिमाचल प्रदेश को परियोजना से 211 मेगावाट बिजली और करीब 600 करोड़ रुपये सालाना लाभ मिलने का अनुमान है।

बांध की बनावट कैसी होगी?

किशाऊ में 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट का गुरुत्व बांध बनाया जाएगा। तकनीकी परियोजना विवरण में इसे रोलर से दबाकर मजबूत किए गए कंक्रीट से बनाने का प्रस्ताव है।

बांध का काम टोंस नदी के पानी को रोककर उसे जलाशय में जमा करना होगा। मानसून में जमा पानी को बाद में जरूरत के अनुसार छोड़ा जाएगा।

बिजलीघर में कितनी क्षमता होगी?

परियोजना में 422 मेगावाट क्षमता का बिजलीघर प्रस्तावित है। इसमें चार इकाइयां होंगी और प्रत्येक इकाई की क्षमता 105.5 मेगावाट होगी। जलाशय में जमा पानी को नियंत्रित तरीके से बिजलीघर की ओर छोड़ा जाएगा। पानी के बहाव से बिजली पैदा होगी। परियोजना से 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत पैदा होगी।

पानी का इस्तेमाल कहां होगा?

परियोजना में जमा पानी का इस्तेमाल सिंचाई और पेयजल के लिए किया जाएगा। इससे करीब 97 हजार हेक्टेयर जमीन की सिंचाई होगी। परियोजना संबंधी जानकारी में सिंचाई और कृषि व्यवस्था को इससे फायदा मिलने की बात कही गई है।

पानी को ताजेवाला और ओखला जल नियंत्रण केंद्रों के जरिए आगे पहुंचाने की व्यवस्था है। ताजेवाला की ओर पानी पहुंचाने वाली व्यवस्था में पूर्वी यमुना नहर, पश्चिमी यमुना नहर और खारा नहर शामिल हैं। ताजेवाला से ओखला तक पानी आगरा नहर और दिल्ली जल आपूर्ति व्यवस्था के जरिए पहुंचाने का प्रावधान है। इस व्यवस्था के जरिए परियोजना का पानी सिंचाई और दिल्ली की जल आपूर्ति से जुड़ी जरूरतों में इस्तेमाल किया जाएगा।

बाढ़ के पानी को नियंत्रित करने में कैसे मिलेगी मदद?

बांध में अतिरिक्त पानी निकालने के लिए छह जल निकासी द्वार होंगे। प्रत्येक द्वार 15 मीटर चौड़ा और 17 मीटर ऊंचा होगा। इनके जरिए अधिकतम 15,648 घन मीटर प्रति सेकंड पानी निकालने की व्यवस्था होगी। बांध के जरिए नीचे के क्षेत्रों में बाढ़ के जोखिम को कम करने में मदद मिलेगी। 

निर्माण के दौरान नदी का पानी कैसे निकलेगा?

बांध के निर्माण के दौरान नदी के पानी को दूसरी दिशा में ले जाने के लिए जल मोड़ सुरंगों की व्यवस्था होगी। इनके जरिए निर्माण के दौरान करीब 710 घन मीटर प्रति सेकंड पानी निकालने की क्षमता होगी। निर्माण पूरा होने के बाद इन रास्तों को बंद कर दिया जाएगा।

रोजगार और बुनियादी ढांचे को क्या फायदा होगा?

परियोजना के निर्माण और संचालन के दौरान रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है। इसके साथ स्थानीय और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

परियोजना से सड़क, पुल और पहुंच मार्ग जैसे बुनियादी ढांचे के विकास की भी बात कही गई है। इससे दूरदराज के इलाकों में संपर्क बेहतर होगा और शिक्षा, स्वास्थ्य तथा बाजारों तक पहुंच में सुधार हो सकता है।

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