एक्सप्लेनर: जामिया में 20 साल से क्यों नहीं हुए चुनाव; अब इसके एलान के बाद भी किसलिए विरोध कर रहे हैं छात्र?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ चुनाव के एलान के बावजूद छात्रों का विरोध जारी है। आखिर दो दशक से चुनाव क्यों नहीं हुए और अब प्रशासन के फैसले पर छात्रों को क्या आपत्ति है? इसी के साथ जामिया से जुड़े पुराने विवाद भी चर्चा में हैं। आइए जानते हैं।
विस्तार
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में करीब दो दशक के बाद छात्रसंघ चुनाव होंगे। छात्र आंदोलन के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने चुनाव कराने की घोषणा की है। जामिया के रजिस्ट्रार कार्यालय से जारी आदेश में कहा गया है कि छात्र संघ का चुनाव छात्र संघ के संविधान को मंजूरी मिलने की तारीख से 15 दिनों के बाद आयोजित किया जाएगा। हालांकि, इस घोषणा के बावजूद छात्रों और प्रशासन के बीच सहमति नहीं बन पाई है।
ऐसे में आइये जानते हैं कि ताजा मामला क्या है? विश्वविद्यालय ने क्या फैसला लिया? छात्र क्यों इस फैसले से असंतुष्ट हैं? जामिया में दो दशक से चुनाव पर प्रतिबंध क्यों लगा था? जामिया कब-कब विवादों के चलते सुर्खियों में रहा है?
जामिया की स्थापना कब हुई थी?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना 1920 में हुई थी। शुरुआत में यह उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में स्थित था। 1925 में इसे दिल्ली के करोल बाग में स्थानांतरित किया गया और बाद में इसका परिसर जामिया नगर में विकसित हुआ। वर्ष 1988 में संसद के एक अधिनियम के जरिए इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला।
अभी चर्चा में क्यों है विश्वविद्यालय?
जामिया में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर 12 अक्तूबर से प्रदर्शन शुरू हुआ था। पांच छात्रों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल भी शुरू की। उनकी प्रमुख मांग में छात्रसंघ की बहाली, चुनाव की निश्चित तारीख और इस संबंध में लिखित आश्वासन देना शामिल है। इसके अलावा, प्रदर्शनकारी प्रॉक्टर और सुरक्षा सलाहकार के इस्तीफे की भी मांग कर रहे हैं।इस बीच, छात्रों की संयुक्त कार्रवाई समिति (JAC) ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े की कानूनी राय विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंपी। छात्रों का कहना था कि इस राय के आधार पर प्रशासन चुनाव की तारीख घोषित करे। हेगड़े की राय में कहा गया कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं दिखता, जिससे चुनाव कराने पर हाईकोर्ट के आदेश का उल्लंघन हो। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक अदालत चुनाव प्रक्रिया रोकने का स्पष्ट निर्देश नहीं देती, विश्वविद्यालय को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की दिशा में काम करना चाहिए।
छात्रों के मुताबिक, कुलपति ने उनसे वरिष्ठ वकील की कानूनी राय लाने को कहा था। इसके बाद उन्होंने अपनी सात दिन की भूख हड़ताल खत्म की थी। हालांकि, विश्वविद्यालय की ओर से चुनाव की प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट समयसीमा नहीं दी गई।
सोमवार को रजिस्ट्रार प्रो. महताब आलम रिजवी ने आदेश जारी कर कहा कि छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिन बाद चुनाव कराए जाएंगे। लेकिन छात्रों ने इस आदेश को अधूरा बताया। उनका कहना है कि संविधान को मंजूरी कब मिलेगी, इसकी कोई तारीख तय नहीं की गई है। चुनाव के लिए भी कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं दिया गया। इसलिए उन्होंने प्रदर्शन और भूख हड़ताल खत्म करने से इनकार किया है।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के फैसले के बाद तेज हुई मांग
जामिया के छात्रों के आंदोलन के पीछे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) का फैसला भी एक अहम वजह बना। एएमयू में छात्रों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के बाद 9 अक्तूबर को छात्रसंघ चुनाव बहाल करने के लिए औपचारिक अधिसूचना जारी की गई थी। इसके बाद जामिया के छात्रों ने भी अपने विश्वविद्यालय में चुनाव बहाल करने की मांग तेज कर दी।
जामिया के छात्रों का कहना है कि सिर्फ चुनाव कराने की धोषणा पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को संविधान की मंजूरी से लेकर चुनाव की तारीख तक पूरी प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि प्रॉक्टर और सुरक्षा सलाहकार के इस्तीफे की मांग पर भी प्रशासन ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है।
जामिया में इतने वर्षों से क्यों नहीं हुए छात्रसंघ चुनाव?
जामिया में आखिरी बार छात्रसंघ चुनाव 2005 में हुए थे। इसके बाद 31 मार्च 2006 को विश्वविद्यालय प्रशासन ने निर्वाचित छात्रसंघ को भंग कर दिया। प्रशासन का आरोप था कि छात्र प्रतिनिधि प्रशासनिक मामलों में दखल देने लगे थे और छात्रसंघ की गतिविधियों से पढ़ाई का माहौल प्रभावित हो रहा था। कैंपस में हिंसा और अव्यवस्था की शिकायतें भी सामने आई थीं।
इसके बाद विश्वविद्यालय ने पूरे कैंपस के लिए एक निर्वाचित छात्रसंघ की जगह विभागों और विषयों के स्तर पर छात्र प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी। विश्वविद्यालय की नैक सेल्फ-स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक, अलग-अलग प्रोग्राम के लिए विषय संघ बनाए गए, जिनके सदस्य संबंधित छात्रों की ओर से अनौपचारिक रूप से चुने जाते थे। इन संघों का उद्देश्य शैक्षणिक और प्रशासनिक समस्याएं उठाना और अकादमिक गतिविधियां आयोजित करना था। हालांकि, इससे पूरे विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने वाला एक निर्वाचित छात्रसंघ नहीं बन पाया।
2012 में तत्कालीन कुलपति नजीब जंग ने उस शैक्षणिक सत्र में चुनाव कराने से इनकार किया था। उन्होंने पिछले अनुभवों का हवाला देते हुए फैकल्टी स्तर पर विषय संघों को मजबूत करने की बात कही थी। इसी साल दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई, जिसमें लिंगदोह समिति की सिफारिशों के मुताबिक स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराने की मांग की गई थी।
मार्च 2017 में विश्वविद्यालय ने जामिया स्टूडेंट काउंसिल का प्रस्ताव रखा। इसके तहत कक्षा प्रतिनिधि मुख्य पदों के लिए चुनाव लड़ सकते थे। हालांकि, यह सीधे छात्रसंघ चुनाव से अलग व्यवस्था थी और इसे लेकर आलोचना भी हुई। उस समय विश्वविद्यालय ने लंबित अदालती मामले और कानूनी अड़चनों का हवाला दिया था।
20 दिसंबर 2022 को दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया। सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय ने कहा था कि छात्रसंघ पहले ही भंग हो चुका है। हालांकि, अदालत के आदेश में भविष्य में चुनाव कराने पर रोक नहीं लगाई गई थी। इसी कानूनी स्थिति को लेकर अब छात्रों और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं।
कब-कब विवादों के चलते सुर्खियों में रहा ये विश्वविद्यालय?
सलमान रुश्दी की किताब पर विवाद
1992 में जामिया के तत्कालीन प्रो-वाइस चांसलर प्रोफेसर मुशीरुल हसन ने सलमान रुश्दी की किताब द सैटेनिक वर्सेज पर प्रतिबंध का विरोध किया था। उनका कहना था कि किताब पर प्रतिबंध का सवाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है। इस रुख के विरोध में कुछ छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किया और उनके इस्तीफे की मांग की। कुछ संगठनों ने परीक्षा के बहिष्कार और भूख हड़ताल का एलान भी किया था। उस समय विश्वविद्यालय को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा था।
अल्पसंख्यक संस्थान के दर्जे पर बहस
फरवरी 2011 में जामिया को अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किए जाने को लेकर विवाद हुआ। कुछ छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों ने इस फैसले का विरोध किया। बहस का मुख्य मुद्दा विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक दर्जा और इसके तहत दाखिले के नियम थे।
सीएए प्रदर्शन के दौरान कैंपस में घुसी पुलिस
15 दिसंबर 2019 को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में प्रदर्शन के दौरान जामिया के आसपास पथराव और गाड़ियों में आगजनी हुई। इसके बाद पुलिस विश्वविद्यालय परिसर में दाखिल हुई। छात्रों ने लाइब्रेरी में मारपीट और आंसू गैस के इस्तेमाल का आरोप लगाया था।
दिल्ली दंगों की साजिश में छात्रों के नाम
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा हुई। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में जामिया के छात्र मीरान हैदर समेत कुछ छात्रों और पूर्व छात्रों के नाम शामिल किए गए। उन पर हिंसा की कथित साजिश में शामिल होने के आरोप लगे।
छात्रों के बीच झड़प और गोलीकांड
29 सितंबर 2022 को जामिया की लाइब्रेरी में दो छात्र समूहों के बीच झड़प हुई। पुलिस के मुताबिक, एक छात्र के सिर में चोट लगी। बाद में दूसरे समूह के एक छात्र ने अस्पताल के पास नौमान अली पर गोली चला दी। इस मामले में 15 छात्रों पर कार्रवाई हुई, जिनमें तीन को निष्कासित किया गया।
डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग पर विवाद
25 जनवरी 2023 को जामिया में डॉक्यूमेंट्री इंडिया: द मोदी क्वेश्चन की स्क्रीनिंग को लेकर विवाद हुआ। विश्वविद्यालय प्रशासन ने अनुमति नहीं दी और कैंपस के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई। स्क्रीनिंग की कोशिश के दौरान दिल्ली पुलिस ने कम से कम एक दर्जन विद्यार्थियों को हिरासत में लिया।
बाबरी मस्जिद को लेकर नारेबाजी
22 जनवरी 2024 को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के दिन जामिया के कुछ छात्रों ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस के विरोध में नारे लगाए। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच शुरू की और सुरक्षाकर्मियों ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों को वहां से हटा दिया।
जामिया के इन पूर्व छात्रों ने बनाई खास पहचान
दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व छात्रों ने सिनेमा, पत्रकारिता, राजनीति, प्रशासन और विज्ञान समेत कई क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है।
1. शाहरुख खान: हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता शाहरुख खान जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रमुख पूर्व छात्रों में शामिल हैं। उन्होंने अभिनय के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है।
2. कबीर खान: फिल्म निर्देशक कबीर खान बजरंगी भाईजान, एक था टाइगर और 83 जैसी फिल्मों के निर्देशन के लिए जाने जाते हैं।
3. किरण राव: फिल्म निर्माता और निर्देशक किरण राव ने हिंदी सिनेमा में निर्देशन और निर्माण के क्षेत्र में काम किया है। उनकी चर्चित फिल्मों में लापता लेडीज शामिल है।
4. एसवाई कुरैशी: एसवाई कुरैशी भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। उन्होंने निर्वाचन आयोग में प्रमुख जिम्मेदारी निभाई और देश की चुनाव व्यवस्था से जुड़े कार्यों में योगदान दिया।
5. दानिश सिद्दीकी: भारतीय फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी ने संघर्षों और महत्वपूर्ण वैश्विक घटनाओं की तस्वीरों के जरिए अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। उन्हें फीचर फोटोग्राफी के लिए पुलित्जर पुरस्कार मिला था।