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Election: जंगल, जमीन और बेटी, झारखंड में भाजपा का दांव कितना होगा कारगर
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सार
Jharkhand News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा के स्टार नेताओं ने इस मुद्दे पर खूब ताल ठोंकी है जिससे यह मुद्दा निचले स्तर तक पहुंच गया है। यही कारण है कि अब झारखंड में इसकी जगह-जगह चर्चा होने लगी है।
झारखंड बीजेपी
- फोटो : PTI
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विस्तार
झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में बाहरी लोगों के द्वारा जमीन कब्जाने का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है। इस मुद्दे पर झारखंड के इतिहास में कई खूनी संघर्ष भी लिखे गए हैं। ऐसे में जब भाजपा ने चुनाव के दौरान बांग्लादेशी मुसलमानों के द्वारा आदिवासियों की जमीन हड़पे जाने का मुद्दा उठाया तो यह धीरे-धीरे चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बनता चला गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा के स्टार नेताओं ने इस मुद्दे पर खूब ताल ठोंकी है जिससे यह मुद्दा निचले स्तर तक पहुंच गया है। यही कारण है कि अब झारखंड में इसकी जगह-जगह चर्चा होने लगी है। चुनाव में जीत-हार किसकी होगी यह तो चुनाव परिणाम सामने आने पर ही पता चलेगा, लेकिन इस मुद्दे पर मची हलचल बता रही है कि यह मुद्दा चुनाव पर अपना असर दिखाने जा रहा है।
झारखंड के धनबाद जिले के रहने वाले राजेश्वर पांडे ने अमर उजाला को बताया कि जमीन और जंगल के मामले में आदिवासी समाज राज्य के ही शहरी इलाकों के लोगों को भी संदेह की दृष्टि से देखता है। यहां तक कि केंद्र या राज्य सरकार के द्वारा किसी बड़े निवेश के लिए जमीन अधिग्रहण का मामला हो तो भी यह यहां एक बड़ा मुद्दा होता है। ऐसे में जब भाजपा ने झारखंड में बांग्लादेशी घुसपैठिए के द्वारा आदिवासियों की बेटी और जमीन हड़पे जाने का मुद्दा उठाया तो यह बड़ा मामला बनता चला गया।
ज्यादातर मजदूर, लेकिन बदल रही डेमोग्राफी
राजेश्वर पांडे के अनुसार, सच्चाई यह है कि झरिया, लेवाबाद, एकड़ा और आसपास की खानों में काम करने के लिए बड़ी संख्या में श्रमिक पास-पड़ोस के राज्यों से यहां आते हैं। इसमें हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमान भी होते हैं। चूंकि खनन और लोडिंग का सबसे ज्यादा काम आज भी मानव श्रम के जरिए ही किया जाता है, ऐसे में यहां काम मिलने की काफी अधिक संभावना होती है। इसी कारण यहां यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल से भारी संख्या में श्रमिक चले आते हैं।
कुमार राकेश ने कहा कि पश्चिम बंगाल, बिहार के कई इलाकों में जूट का कारोबार बहुत कमजोर या कई इलाकों में लगभग समाप्त हो गया है। सूती वस्त्रों का कारोबार हो या बीड़ी के बंडल बनाने का काम, सब पर अलग-अलग कारणों से नकारात्मक असर पड़ा है। ऐसे में अब किसी विशेष कार्य के लिए दक्ष न होने वाले श्रमिकों के लिए बड़ी मुसीबत पैदा हो गई है। अब इन अकुशल श्रमिकों के लिए कोयले की खदानें आसान और सुरक्षित स्थान बन गई हैं। यही कारण है कि यहां भारी संख्या में प्रवासी मजदूर आ रहे हैं और अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी प्राप्त कर रहे हैं।
लेकिन यहां भारी संख्या में आने वाले श्रमिकों के कारण यहां की डेमोग्राफी बदल रही है। विशेषकर समुदाय विशेष के श्रमिक एक क्लस्टर की भांति एक ही जगह पर भारी संख्या में रहने लगे हैं। बाहर से आने वाले प्रवासी भूमि खरीद भी रहे हैें तो यह आदिवासी लोगों की ही होती है। कई बार वैवाहिक मामलों के कारण भी भूमि दूसरों के हाथों में जा रही है। सस्ती जमीनों के चक्कर में बाहरी लोग जंगलों के आसपास जमीन खरीद रहे हैं। यही कारण है कि ऐसे स्थानों पर आदिवासी या मूल निवासियों के मन में अपनी जमीन खोने का डर पैदा हो गया है। भाजपा का जमीन और बेटी खोने का मुद्दा इन्हीं इलाकों में बहुत कारगर साबित हो रहा है। कुमार राकेश मानते हैं कि इसका चुनावों पर असर पड़ सकता है।
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झारखंड के धनबाद जिले के रहने वाले राजेश्वर पांडे ने अमर उजाला को बताया कि जमीन और जंगल के मामले में आदिवासी समाज राज्य के ही शहरी इलाकों के लोगों को भी संदेह की दृष्टि से देखता है। यहां तक कि केंद्र या राज्य सरकार के द्वारा किसी बड़े निवेश के लिए जमीन अधिग्रहण का मामला हो तो भी यह यहां एक बड़ा मुद्दा होता है। ऐसे में जब भाजपा ने झारखंड में बांग्लादेशी घुसपैठिए के द्वारा आदिवासियों की बेटी और जमीन हड़पे जाने का मुद्दा उठाया तो यह बड़ा मामला बनता चला गया।
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ज्यादातर मजदूर, लेकिन बदल रही डेमोग्राफी
राजेश्वर पांडे के अनुसार, सच्चाई यह है कि झरिया, लेवाबाद, एकड़ा और आसपास की खानों में काम करने के लिए बड़ी संख्या में श्रमिक पास-पड़ोस के राज्यों से यहां आते हैं। इसमें हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमान भी होते हैं। चूंकि खनन और लोडिंग का सबसे ज्यादा काम आज भी मानव श्रम के जरिए ही किया जाता है, ऐसे में यहां काम मिलने की काफी अधिक संभावना होती है। इसी कारण यहां यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल से भारी संख्या में श्रमिक चले आते हैं।
कुमार राकेश ने कहा कि पश्चिम बंगाल, बिहार के कई इलाकों में जूट का कारोबार बहुत कमजोर या कई इलाकों में लगभग समाप्त हो गया है। सूती वस्त्रों का कारोबार हो या बीड़ी के बंडल बनाने का काम, सब पर अलग-अलग कारणों से नकारात्मक असर पड़ा है। ऐसे में अब किसी विशेष कार्य के लिए दक्ष न होने वाले श्रमिकों के लिए बड़ी मुसीबत पैदा हो गई है। अब इन अकुशल श्रमिकों के लिए कोयले की खदानें आसान और सुरक्षित स्थान बन गई हैं। यही कारण है कि यहां भारी संख्या में प्रवासी मजदूर आ रहे हैं और अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी प्राप्त कर रहे हैं।
लेकिन यहां भारी संख्या में आने वाले श्रमिकों के कारण यहां की डेमोग्राफी बदल रही है। विशेषकर समुदाय विशेष के श्रमिक एक क्लस्टर की भांति एक ही जगह पर भारी संख्या में रहने लगे हैं। बाहर से आने वाले प्रवासी भूमि खरीद भी रहे हैें तो यह आदिवासी लोगों की ही होती है। कई बार वैवाहिक मामलों के कारण भी भूमि दूसरों के हाथों में जा रही है। सस्ती जमीनों के चक्कर में बाहरी लोग जंगलों के आसपास जमीन खरीद रहे हैं। यही कारण है कि ऐसे स्थानों पर आदिवासी या मूल निवासियों के मन में अपनी जमीन खोने का डर पैदा हो गया है। भाजपा का जमीन और बेटी खोने का मुद्दा इन्हीं इलाकों में बहुत कारगर साबित हो रहा है। कुमार राकेश मानते हैं कि इसका चुनावों पर असर पड़ सकता है।

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