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सुप्रीम कोर्ट: शीर्ष अदालत में 76 साल से एक भी 'विशिष्ट विधिवेत्ता' नहीं बना जज, जस्टिस भुइयां ने जताया अफसोस
Sun, 30 Aug 2026 03:34 PM IST
पवन पांडेय
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Sun, 30 Aug 2026 03:34 PM IST
सार
जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारत में कई बेहद प्रतिभाशाली कानून विशेषज्ञ और शिक्षाविद हैं, लेकिन उन्हें वह पहचान और अवसर नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार हैं। उनका मानना है कि ऐसे विद्वान अगर सुप्रीम कोर्ट की बेंच का हिस्सा बनें तो वे देश में कानून के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
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जस्टिस उज्जल भुइयां, सुप्रीम कोर्ट के जज
- फोटो : sci.gov.in/judge/justice-ujjal-bhuyan
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने सुप्रीम कोर्ट में 'विशिष्ट विधिवेत्ताओं' को जज बनाए जाने की वकालत की है। उन्होंने कहा कि संविधान में इस तरह की नियुक्ति का स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद पिछले 76 वर्षों में एक भी विशिष्ट विधिवेत्ता सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बन पाया है। उन्होंने इसे संविधान के एक ऐसे प्रावधान के रूप में बताया, जिसका अब तक इस्तेमाल नहीं हुआ है। जस्टिस भुइयां रविवार को दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू), दिल्ली के पोस्टग्रेजुएट छात्रों के 13वें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच में अलग-अलग क्षेत्रों से प्रतिभाशाली लोगों को शामिल करने से न्यायपालिका में विविधता बढ़ेगी और कानून के विशेषज्ञ विद्वान देश के महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक मामलों में अपना योगदान दे सकेंगे।
यह भी पढ़ें- 'सवाल पूछना विद्रोह नहीं': सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा- लोकतंत्र में अलग आवाजों को सुना जाए
संविधान में प्रावधान, लेकिन अब तक नियुक्ति नहीं
जस्टिस भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 124(3)(c) का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें ऐसे व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त करने का प्रावधान है, जो राष्ट्रपति की नजर में एक 'विशिष्ट विधिवेत्ता' हो। इसके बावजूद संविधान लागू होने के 76 साल से अधिक समय में सुप्रीम कोर्ट में केवल हाईकोर्ट के जजों या प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के रास्ते ही नियुक्तियां हुई हैं। उन्होंने कहा कि यह बेहद अफसोस की बात है कि संविधान का यह प्रावधान अब तक इस्तेमाल नहीं किया गया। जस्टिस भुइयां ने कहा कि इसके दो संभावित कारण हो सकते हैं। पहला, केंद्र सरकार और कॉलेजियम को लगता हो कि भारतीय अकादमिक क्षेत्र में ऐसे पर्याप्त गहरे और योग्य विशेषज्ञ नहीं हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज पद के लिए गंभीरता से विचार किया जा सके। दूसरा, हो सकता है कि केंद्र और कॉलेजियम ने अब तक इस संवैधानिक प्रावधान को गंभीरता से तलाशा ही न हो।
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'कानूनी विद्वानों के पास व्यावहारिक अनुभव नहीं' वाली दलील को बताया कमजोर
जस्टिस भुइयां ने उन लोगों की दलील को भी खारिज किया, जो मानते हैं कि विश्वविद्यालयों में कानून पढ़ाने वाले विद्वानों के पास अदालतों में काम करने का पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव नहीं होता। उन्होंने इसे 'बहुत सतही आपत्ति' बताया। उनके मुताबिक, केवल अदालत में प्रैक्टिस के अनुभव को ही जज बनने की योग्यता का आधार नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि दुनिया के कई देशों में प्रसिद्ध कानूनी शिक्षाविदों और विद्वानों को संवैधानिक अदालतों में जज नियुक्त किया जाता है। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और केन्या जैसे देश शामिल हैं।
अकादमिक विशेषज्ञता से सुप्रीम कोर्ट को मिल सकता है फायदा
जस्टिस भुइयां ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट देश की नैतिक, कानूनी और संवैधानिक चेतना का संरक्षक है। ऐसे में अदालत को केवल तकनीकी कानूनी पहलुओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका, बार और कानून के अकादमिक क्षेत्र में भारत की वास्तविक विविधता दिखाई देनी चाहिए। उनके मुताबिक, 'विशिष्ट विधिवेत्ता' को सुप्रीम कोर्ट में शामिल करने के पीछे भी यही सोच थी कि प्रतिभाशाली और विद्वान लोगों को न्यायपालिका में जगह मिले। उन्होंने कहा कि अपनी अकादमिक विशेषज्ञता के कारण ऐसे विद्वान संकीर्ण कानूनी तकनीकीताओं से आगे जाकर जनहित और संवैधानिक कानून से जुड़े बड़े सवालों पर बेहतर योगदान दे सकते हैं। जस्टिस भुइयां ने कहा कि यह राय भी सामने आती रही है कि किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर का न्यायिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है और उन्हें इस विचार से असहमत होने का कोई कारण नहीं दिखता।
प्रतिभाशाली कानून विशेषज्ञों को मिला है कम अवसर
उन्होंने कहा कि किसी विशिष्ट विधिवेत्ता की विद्वता सुप्रीम कोर्ट की बेंच के लिए 'बहुत बड़ा मूल्यवर्धन' हो सकती है। अपनी गहरी कानूनी समझ और शोध के जरिए ऐसा व्यक्ति शीर्ष स्तर पर न्यायिक फैसलों की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
यह भी पढ़ें- एनआईए कोर्ट का बड़ा फैसला: ISIS साजिश में दोषी सैयद फासिउर को सात साल की सश्रम कैद, 48 हजार का जुर्माना भी
क्या है 'विशिष्ट विधिवेत्ता' का प्रावधान?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(3)(c) के तहत ऐसे व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाए जाने का प्रावधान है, जिसे राष्ट्रपति की राय में एक विशिष्ट विधिवेत्ता माना जाता हो। यह सामान्य जज नियुक्ति प्रक्रिया से अलग एक संवैधानिक रास्ता है। हालांकि, संविधान लागू होने के बाद से अब तक इस श्रेणी के तहत किसी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त नहीं किया गया है। जस्टिस भुइयां ने इसी लंबे अंतराल पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस प्रावधान को गंभीरता से इस्तेमाल करने पर सुप्रीम कोर्ट को कानून के अकादमिक और शोध क्षेत्र की विशेषज्ञता का लाभ मिल सकता है।
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संविधान में प्रावधान, लेकिन अब तक नियुक्ति नहीं
जस्टिस भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 124(3)(c) का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें ऐसे व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त करने का प्रावधान है, जो राष्ट्रपति की नजर में एक 'विशिष्ट विधिवेत्ता' हो। इसके बावजूद संविधान लागू होने के 76 साल से अधिक समय में सुप्रीम कोर्ट में केवल हाईकोर्ट के जजों या प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के रास्ते ही नियुक्तियां हुई हैं। उन्होंने कहा कि यह बेहद अफसोस की बात है कि संविधान का यह प्रावधान अब तक इस्तेमाल नहीं किया गया। जस्टिस भुइयां ने कहा कि इसके दो संभावित कारण हो सकते हैं। पहला, केंद्र सरकार और कॉलेजियम को लगता हो कि भारतीय अकादमिक क्षेत्र में ऐसे पर्याप्त गहरे और योग्य विशेषज्ञ नहीं हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज पद के लिए गंभीरता से विचार किया जा सके। दूसरा, हो सकता है कि केंद्र और कॉलेजियम ने अब तक इस संवैधानिक प्रावधान को गंभीरता से तलाशा ही न हो।
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'कानूनी विद्वानों के पास व्यावहारिक अनुभव नहीं' वाली दलील को बताया कमजोर
जस्टिस भुइयां ने उन लोगों की दलील को भी खारिज किया, जो मानते हैं कि विश्वविद्यालयों में कानून पढ़ाने वाले विद्वानों के पास अदालतों में काम करने का पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव नहीं होता। उन्होंने इसे 'बहुत सतही आपत्ति' बताया। उनके मुताबिक, केवल अदालत में प्रैक्टिस के अनुभव को ही जज बनने की योग्यता का आधार नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि दुनिया के कई देशों में प्रसिद्ध कानूनी शिक्षाविदों और विद्वानों को संवैधानिक अदालतों में जज नियुक्त किया जाता है। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और केन्या जैसे देश शामिल हैं।
अकादमिक विशेषज्ञता से सुप्रीम कोर्ट को मिल सकता है फायदा
जस्टिस भुइयां ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट देश की नैतिक, कानूनी और संवैधानिक चेतना का संरक्षक है। ऐसे में अदालत को केवल तकनीकी कानूनी पहलुओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका, बार और कानून के अकादमिक क्षेत्र में भारत की वास्तविक विविधता दिखाई देनी चाहिए। उनके मुताबिक, 'विशिष्ट विधिवेत्ता' को सुप्रीम कोर्ट में शामिल करने के पीछे भी यही सोच थी कि प्रतिभाशाली और विद्वान लोगों को न्यायपालिका में जगह मिले। उन्होंने कहा कि अपनी अकादमिक विशेषज्ञता के कारण ऐसे विद्वान संकीर्ण कानूनी तकनीकीताओं से आगे जाकर जनहित और संवैधानिक कानून से जुड़े बड़े सवालों पर बेहतर योगदान दे सकते हैं। जस्टिस भुइयां ने कहा कि यह राय भी सामने आती रही है कि किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर का न्यायिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है और उन्हें इस विचार से असहमत होने का कोई कारण नहीं दिखता।
प्रतिभाशाली कानून विशेषज्ञों को मिला है कम अवसर
उन्होंने कहा कि किसी विशिष्ट विधिवेत्ता की विद्वता सुप्रीम कोर्ट की बेंच के लिए 'बहुत बड़ा मूल्यवर्धन' हो सकती है। अपनी गहरी कानूनी समझ और शोध के जरिए ऐसा व्यक्ति शीर्ष स्तर पर न्यायिक फैसलों की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
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क्या है 'विशिष्ट विधिवेत्ता' का प्रावधान?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(3)(c) के तहत ऐसे व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाए जाने का प्रावधान है, जिसे राष्ट्रपति की राय में एक विशिष्ट विधिवेत्ता माना जाता हो। यह सामान्य जज नियुक्ति प्रक्रिया से अलग एक संवैधानिक रास्ता है। हालांकि, संविधान लागू होने के बाद से अब तक इस श्रेणी के तहत किसी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त नहीं किया गया है। जस्टिस भुइयां ने इसी लंबे अंतराल पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस प्रावधान को गंभीरता से इस्तेमाल करने पर सुप्रीम कोर्ट को कानून के अकादमिक और शोध क्षेत्र की विशेषज्ञता का लाभ मिल सकता है।