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Explainer: विलय से पहले ही काकोली के NCPI अध्यक्ष बनने का दावा हुआ हवा; TMC की बागी को किस बात का था खतरा?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 16 Jun 2026 05:13 PM IST
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सार
तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट का नेतृत्व कर रहीं सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने 14 जून को लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला से मिलकर टीएमसी के दो-तिहाई सांसदों के त्रिपुरा के राजनीतिक दल नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के साथ विलय की जानकारी दी थी। इसे लेकर फिलहाल कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन इसी बीच कुछ जगहों पर दावा हुआ कि काकोली 31 मई को ही एनसीपीआई की अध्यक्ष बन गई थीं। हालांकि, इस घोषणा को लेकर विवाद की स्थिति पैदा होने के बाद मंगलवार को खुद दस्तीदार ने एनसीपीआई के नए अध्यक्ष के नाम का खुलासा किया।
काकोली घोष दस्तीदार।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में टूट जारी है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच टीएमसी से सांसद चुनी गईं काकोली घोष दस्तीदार के 31 मई को ही नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) अध्यक्ष का पद संभालने का दावा किया गया। एनसीपीआई के एक कथित फेसबुक पेज ने ही इससे जुड़ा एक पोस्ट किया था। हालांकि, अब खुद दस्तीदार ने कहा है कि वह पार्टी की अध्यक्ष नहीं हैं, बल्कि ज्योतिप्रकाश चटर्जी एनसीपीआई के प्रमुख होंगे। इस पूरे नाटकीय घटनाक्रम में कई राजनीतिक और सांविधानिक पेच हैं। दरअसल, काकोली के अगर एनसीपीआई अध्यक्ष बनने का दावे की पुष्टि हो जाती तो उनकी संसदीय सदस्यता भी जा सकती थी। ऐसे में किसी विवाद से बचने के लिए न सिर्फ एनसीपीआई के पेज से वह पोस्ट गायब हो गया, बल्कि दस्तीदार ने खुद एनसीपीआई के नए अध्यक्ष का एलान भी कर दिया।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर काकोली अगर टीएमसी सांसद रहते हुए ही एनसीपीआई की अध्यक्ष बन जातीं तो उनके इस कदम की क्या वैधता होती? क्या कोई भी सांसद अपने दल के कुल दो-तिहाई सांसदों के दूसरे दल में विलय से पहले ही उस दूसरी पार्टी का अध्यक्ष बन सकता है? इसके अलावा तृणमूल के सांसदों के एनसीपीआई में जाने से जुड़े पेच क्या हैं? आइये जानते हैं इनके जवाब...
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर काकोली अगर टीएमसी सांसद रहते हुए ही एनसीपीआई की अध्यक्ष बन जातीं तो उनके इस कदम की क्या वैधता होती? क्या कोई भी सांसद अपने दल के कुल दो-तिहाई सांसदों के दूसरे दल में विलय से पहले ही उस दूसरी पार्टी का अध्यक्ष बन सकता है? इसके अलावा तृणमूल के सांसदों के एनसीपीआई में जाने से जुड़े पेच क्या हैं? आइये जानते हैं इनके जवाब...
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क्या एक दल से चुना गया सांसद दूसरे राजनीतिक दल में पद संभाल सकता है?
संविधान और दल-बदल विरोधी कानून के मुताबिक, अगर किसी एक राजनीतिक दल से चुना गया सांसद किसी दूसरे राजनीतिक दल में अध्यक्ष या कोई अन्य पद संभालता है, तो उसे सदन की सदस्यता से अयोग्य ठहराया जा सकता है।सांविधानिक मामलों के जानकार और 14वीं-15वीं लोकसभा के महासचिव पीडीटी अचार्य के मुताबिक, अगर कोई सांसद एक पार्टी का सदस्य रहते हुए किसी दूसरी पार्टी का अध्यक्ष बनता है या कोई पद ग्रहण करता है, तो इसका स्पष्ट अर्थ यह निकाला जाता है कि उसने अपनी पहली (मूल) पार्टी को स्वेच्छा से छोड़ दिया है। आचार्य ने बताया कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत, अगर कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता त्याग देता है या चुने जाने के बाद किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो वह सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य हो जाता है।
इस लिहाज से अगर टीएमसी के कम से कम दो-तिहाई बागी सांसदों के धड़े का नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया में विलय नहीं हुआ हो तो उसके किसी भी सांसद का दूसरे दल का पद लेना अयोग्यता की वजह बन सकता है। काकोली घोष दस्तीदार को लेकर भी यही नियम लागू होता। ऐसे में उन्हें एनसीपीआई अध्यक्ष बताने से जुड़े दावों पर खुद काकोली ने लगाम लगा दी।
14 जून को बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर एनसीपीआई में विलय की जानकारी दी थी और सदन में अलग बैठने की व्यवस्था मांगी थी। हालांकि, अध्यक्ष ने अभी इस विलय को मान्यता नहीं दी है। न्यूज एजेंसी पीटीआई के सूत्रों के मुताबिक, अध्यक्ष कोई भी निर्णय लेने से पहले केंद्रीय कानून मंत्रालय और वरिष्ठ विधि अधिकारियों से लिखित कानूनी राय लेंगे, ताकि उनका फैसला न्यायिक जांच में सही साबित हो सके।
...तो क्या टीएमसी के बागी धड़े का नहीं हुआ एनसीपीआई में विलय?
14 जून को बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर एनसीपीआई में विलय की जानकारी दी थी और सदन में अलग बैठने की व्यवस्था मांगी थी। हालांकि, अध्यक्ष ने अभी इस विलय को मान्यता नहीं दी है। न्यूज एजेंसी पीटीआई के सूत्रों के मुताबिक, अध्यक्ष कोई भी निर्णय लेने से पहले केंद्रीय कानून मंत्रालय और वरिष्ठ विधि अधिकारियों से लिखित कानूनी राय लेंगे, ताकि उनका फैसला न्यायिक जांच में सही साबित हो सके।
टीएमसी के बागी धड़े के एनसीपीआई में विलय में क्या है पेच?
1. मूल राजनीतिक दल करता है विलय का फैसलाकानूनी और सांविधानिक रूप से देखा जाए तो टीएमसी के बागी धड़े का एनसीपीआई में विलय अभी तक मान्य या पूरा नहीं हुआ है। पीडीटी आचार्य के अनुसार, संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत केवल सांसदों या विधायकों का कोई गुट अपनी मर्जी से दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकता। विलय केवल तभी कानूनी माना जाता है जब मूल राजनीतिक दल (इस मामले में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी) किसी अन्य दल में विलय करने का आधिकारिक फैसला करे। चूंकि मूल पार्टी (टीएमसी) ने विलय का कोई फैसला नहीं किया है, ये सभी 20 बागी सांसद कानून की नजर में अभी भी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के ही सदस्य माने जाएंगे।
2. एनसीपीआई के अंदर ही भ्रम की स्थिति
जिस एनसीपीआई में विलय का दावा किया जा रहा है, उसके खुद के पदाधिकारियों को भी इसकी ठीक से जानकारी नहीं है। एनसीपीआई की अध्यक्ष रहीं शिउली कुंडू का कहना है कि उन्होंने कुछ समय पहले इस्तीफा दे दिया था और उन्हें इस विलय के बारे में कोई सूचना नहीं थी। पार्टी के अन्य पदाधिकारियों का भी कहना है कि वे इस पूरी प्रक्रिया को लेकर अंधेरे में हैं और उन्हें मीडिया के जरिए इसका पता चला। इतना ही नहीं काकोली घोष दस्तीदार को लेकर यह दावा किया गया था कि वह 31 मई को ही एनसीपीआई की अध्यक्ष बन गईं थी, इसकी भी एनसीपीआई की पूर्व अध्यक्ष शिवली ने कोई पुष्टि करने से इनकार कर दिया और कहा कि ऐसी जानकारी देने से वे मुश्किल में आ सकती हैं।
3. मूल टीएमसी ने लोकसभा स्पीकर को भेजी है आपत्ति
टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने 10 जून को लिखे और 14 जून को सौंपे गए एक पत्र में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मांग की है कि वह बागी गुट को किसी भी प्रकार की मान्यता, दर्जा या सदन में अलग बैठने की सुविधाएं देने से इनकार कर दें। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक ममता बनर्जी के नियंत्रण वाले मूल संगठनात्मक पार्टी ढांचे का विलय नहीं होता, तब तक केवल सांसदों के विधायी विलय का कोई वजूद नहीं माना जा सकता।
जिस एनसीपीआई में विलय का दावा किया जा रहा है, उसके खुद के पदाधिकारियों को भी इसकी ठीक से जानकारी नहीं है। एनसीपीआई की अध्यक्ष रहीं शिउली कुंडू का कहना है कि उन्होंने कुछ समय पहले इस्तीफा दे दिया था और उन्हें इस विलय के बारे में कोई सूचना नहीं थी। पार्टी के अन्य पदाधिकारियों का भी कहना है कि वे इस पूरी प्रक्रिया को लेकर अंधेरे में हैं और उन्हें मीडिया के जरिए इसका पता चला। इतना ही नहीं काकोली घोष दस्तीदार को लेकर यह दावा किया गया था कि वह 31 मई को ही एनसीपीआई की अध्यक्ष बन गईं थी, इसकी भी एनसीपीआई की पूर्व अध्यक्ष शिवली ने कोई पुष्टि करने से इनकार कर दिया और कहा कि ऐसी जानकारी देने से वे मुश्किल में आ सकती हैं।
3. मूल टीएमसी ने लोकसभा स्पीकर को भेजी है आपत्ति
टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने 10 जून को लिखे और 14 जून को सौंपे गए एक पत्र में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मांग की है कि वह बागी गुट को किसी भी प्रकार की मान्यता, दर्जा या सदन में अलग बैठने की सुविधाएं देने से इनकार कर दें। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक ममता बनर्जी के नियंत्रण वाले मूल संगठनात्मक पार्टी ढांचे का विलय नहीं होता, तब तक केवल सांसदों के विधायी विलय का कोई वजूद नहीं माना जा सकता।
महाराष्ट्र राजनीतिक संकट मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए अभिषेक बनर्जी ने तर्क दिया कि संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत अब विभाजन की दलील देकर अयोग्यता से बचाव नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि कानूनी ढांचा केवल एक मुख्य राजनीतिक दल की पहचान को मान्यता देता है, न कि पार्टी के भीतर बने हुए प्रतिद्वंद्वी गुटों को।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि विलय के किसी भी दावे को वैध मानने के लिए दो चीजों का एक साथ होना जरूरी है- मूल राजनीतिक दल का विलय और दो-तिहाई सांसदों का समर्थन। कानून के तहत इनमें से केवल एक शर्त पूरी होने पर विलय को पर्याप्त और मान्य नहीं माना जा सकता। इसके अलावा टीएमसी के एक और सांसद कीर्ति आजाद ने भी बागी गुट के खिलाफ बयान दिया है।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि विलय के किसी भी दावे को वैध मानने के लिए दो चीजों का एक साथ होना जरूरी है- मूल राजनीतिक दल का विलय और दो-तिहाई सांसदों का समर्थन। कानून के तहत इनमें से केवल एक शर्त पूरी होने पर विलय को पर्याप्त और मान्य नहीं माना जा सकता। इसके अलावा टीएमसी के एक और सांसद कीर्ति आजाद ने भी बागी गुट के खिलाफ बयान दिया है।
टीएमसी में बगावत का बिगुल फूंकने वाली काकोली घोष दस्तीदार कौन हैं?
शुरुआती जीवन और परिवारकाकोली घोष दस्तीदार का जन्म नवंबर 1959 में हुआ था। पेशे से एक डॉक्टर, काकोली ने 1984 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद 1987 में उन्होंने ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज हॉस्पिटल मेडिकल स्कूल से एडवांस्ड अल्ट्रासाउंड में पोस्ट-ग्रेजुएशन किया।
वे पश्चिम बंगाल के बारासात के एक प्रमुख राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके चाचा अरुण मैत्र एक स्वतंत्रता सेनानी और राज्य कांग्रेस अध्यक्ष थे, जबकि उनके मामा गुरुदास दासगुप्ता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के दिग्गज नेता और सांसद रहे थे।
वहीं, उनके पति डॉ. सुदर्शन घोष दस्तीदार एक प्रसिद्ध प्रजनन विशेषज्ञ हैं, जिन्हें 2011 में ममता बनर्जी की सरकार में मंत्री भी बनाया गया था। उनके दो बेटे हैं और दोनों ही पेशे से डॉक्टर हैं।
राजनीति में एंट्री और ममता बनर्जी के साथ करीबी
काकोली और ममता बनर्जी का परिचय 1976 से है और 1984 से वे एक साथ काम कर रही हैं। दोनों 1980 के दशक में कांग्रेस के छात्र संगठन (छात्र परिषद) में एक साथ राजनीति में सक्रिय थीं। जहां ममता बनर्जी जोगमाया कॉलेज से तो वहीं काकोली आरजी कर में पढ़ाई के दौरान ही छात्र राजनीति में उतरी थीं। यहीं से दोनों का आपसी परिचय बढ़ा। बताया जाता है कि जब ममता वामपंथी शासन के खिलाफ सड़कों पर संघर्ष करते हुए घायल हो जाती थीं, तब काकोली ही उनके इलाज और चिकित्सा की व्यवस्था करती थीं।
इसके बाद 1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी की स्थापना की, तो काकोली संस्थापक सदस्यों में उनके साथ खड़ी थीं और पार्टी प्रमुख की बेहद भरोसेमंद वफादार मानी जाती रही हैं। काकोली ने 1998 (डायमंड हार्बर) और 1999 (हावड़ा) में लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार सीपीएम माकपा उम्मीदवारों से हार गईं। 2009 में वे पहली बार बारासात लोकसभा सीट से 1.22 लाख वोटों से चुनाव जीतीं। तब से लेकर वे लगातार चार बार (2009, 2014, 2019 और 2024) इस सीट से सांसद चुनी जा चुकी हैं।
वे टीएमसी के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक रही हैं। उन्होंने पार्टी की मुख्य प्रवक्ता और तृणमूल महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर काम किया। उन्हें टीएमसी ने लोकसभा में पार्टी का मुख्य सचेतक भी नियुक्त किया था।
काकोली और ममता बनर्जी का परिचय 1976 से है और 1984 से वे एक साथ काम कर रही हैं। दोनों 1980 के दशक में कांग्रेस के छात्र संगठन (छात्र परिषद) में एक साथ राजनीति में सक्रिय थीं। जहां ममता बनर्जी जोगमाया कॉलेज से तो वहीं काकोली आरजी कर में पढ़ाई के दौरान ही छात्र राजनीति में उतरी थीं। यहीं से दोनों का आपसी परिचय बढ़ा। बताया जाता है कि जब ममता वामपंथी शासन के खिलाफ सड़कों पर संघर्ष करते हुए घायल हो जाती थीं, तब काकोली ही उनके इलाज और चिकित्सा की व्यवस्था करती थीं।
इसके बाद 1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी की स्थापना की, तो काकोली संस्थापक सदस्यों में उनके साथ खड़ी थीं और पार्टी प्रमुख की बेहद भरोसेमंद वफादार मानी जाती रही हैं। काकोली ने 1998 (डायमंड हार्बर) और 1999 (हावड़ा) में लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार सीपीएम माकपा उम्मीदवारों से हार गईं। 2009 में वे पहली बार बारासात लोकसभा सीट से 1.22 लाख वोटों से चुनाव जीतीं। तब से लेकर वे लगातार चार बार (2009, 2014, 2019 और 2024) इस सीट से सांसद चुनी जा चुकी हैं।
वे टीएमसी के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक रही हैं। उन्होंने पार्टी की मुख्य प्रवक्ता और तृणमूल महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर काम किया। उन्हें टीएमसी ने लोकसभा में पार्टी का मुख्य सचेतक भी नियुक्त किया था।
टीएमसी छोड़ने और बगावत का घटनाक्रम
लंबे समय तक सबसे करीबी रहने के बावजूद काकोली घोष का टीएमसी से अलग होना एक बड़े घटनाक्रम का परिणाम है। बताया जाता है कि काकोली ने 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बारासात सीट से अपने बेटे वैद्यनाथ के लिए टिकट मांगा था, लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से एक सांसद पर परिवार के हर सदस्य को पद दिलाने की चाह रखने का कटाक्ष किया था, जिससे दोनों के बीच दरार आ गई।
2026 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी की हार के तुरंत बाद (मई में), ममता बनर्जी ने काकोली को लोकसभा मुख्य सचेतक और टीएमसी महिला अध्यक्ष के पद से हटा दिया और उनके विरोधी माने जाने वाले कल्याण बनर्जी को दोबारा सचेतक बना दिया। इस फैसले से आहत होकर काकोली ने 15 मई को पार्टी के संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा, "1976 से परिचय, 1984 से सफर... आज मुझे चार दशकों की वफादारी का इनाम मिला है।" उन्होंने पार्टी में बाहरी सलाहकारों (आई-पैक) के दखल और राशन व शिक्षक भर्ती जैसे घोटालों को लेकर भी सार्वजनिक रूप से गुस्सा जाहिर किया। इसके बाद ही बागी सांसदों के नेतृत्व और एनसीपीआई में विलय के एलान जैसे घटनाक्रम सामने आए।
लंबे समय तक सबसे करीबी रहने के बावजूद काकोली घोष का टीएमसी से अलग होना एक बड़े घटनाक्रम का परिणाम है। बताया जाता है कि काकोली ने 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बारासात सीट से अपने बेटे वैद्यनाथ के लिए टिकट मांगा था, लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से एक सांसद पर परिवार के हर सदस्य को पद दिलाने की चाह रखने का कटाक्ष किया था, जिससे दोनों के बीच दरार आ गई।
2026 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी की हार के तुरंत बाद (मई में), ममता बनर्जी ने काकोली को लोकसभा मुख्य सचेतक और टीएमसी महिला अध्यक्ष के पद से हटा दिया और उनके विरोधी माने जाने वाले कल्याण बनर्जी को दोबारा सचेतक बना दिया। इस फैसले से आहत होकर काकोली ने 15 मई को पार्टी के संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा, "1976 से परिचय, 1984 से सफर... आज मुझे चार दशकों की वफादारी का इनाम मिला है।" उन्होंने पार्टी में बाहरी सलाहकारों (आई-पैक) के दखल और राशन व शिक्षक भर्ती जैसे घोटालों को लेकर भी सार्वजनिक रूप से गुस्सा जाहिर किया। इसके बाद ही बागी सांसदों के नेतृत्व और एनसीपीआई में विलय के एलान जैसे घटनाक्रम सामने आए।