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धर्म और जाति के पेचीदा कॉकटेल में उलझा कर्नाटक विधानसभा चुनाव

Tue, 17 Apr 2018 10:27 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Tue, 17 Apr 2018 10:27 PM IST
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Karnataka Assembly Elections 2018: Entangled in the intriguing cocktail of religion and race
सिद्धारमैया और येदियुरप्पा
केन्द्रीय राजनीति ने एक बार फिर दक्षिण भारत की राजनीति का नया पैमाना तय कर दिया है। राजनीति के पंडितों का अनुमान है कि 2019 में दिल्ली की सत्ता का रास्ता 30 जिलों वाले कर्नाटक राज्य से होकर जाएगा। यहां तक कि चुनाव के नतीजे लोकसभा चुनाव के 2018 में या फिर 2019 में होने की संभावना को भी तय कर देंगे। इसलिए कांग्रेस और भाजपा जैसी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों ने राज्य में बाजी मारने के लिए पूरा जोर लगा दिया है। दिलचस्प यह भी है कि इस बार का चुनाव जाति और धर्म के पेचीदा कॉकटेल में उलझ गया है।
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राजनीति के जानकारों का मानना है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 में लिंगायत, वोक्कालिग्गा, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, दलित वर्ग का रुझान निर्णायक भूमिका में रहेगा। इसके लिए सभी दलों ने जातीय समीकरण से लेकर वोटों के ध्रुवीकरण के हर दांव आजमाएं हैं। 
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सिद्धारमैया... सिद्धारमैया...

कर्नाटक में सत्ताधारी दल का सारा दारोमदार मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर टिका है। सिद्धारमैया ने राज्य में कन्नड़िया स्वाभिमान, दलित, मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग के ध्रुवीकरण को केन्द्र में रखकर सर्वप्रिय नेता के रूप में अपनी छवि बनाई है। राज्य के लिए अलग झंडा और वीरशैव लिंगायत समुदाय को अलग अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा देकर सिद्धारमैया ने भाजपा का संकट बढ़ाया है। पंजाब के बाद कर्नाटक में सिद्धारमैया ऐसे दूसरे नेता हैं, जिनके पीछे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राज्य की सत्ता में वापसी के लिए भरपूर ताकत से खड़े हुए हैं। यहां तक कि टिकट बंटवारे में भी सिद्धारमैया की ही सबसे अधिक चली है।
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पार्टी के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, कर्नाटक के कृषिमंत्री रहे और मजबूत बोक्कालिग्गा नेता कृष्णा वी गौड़ा समेत अन्य ने सिद्धारमैया को आगे करके एकजुटता से चुनाव लड़ने के पार्टी हाई कमान के दिशा निर्देशों को वरीयता दी है। कुल मिलाकर कांग्रेस का लक्ष्य 12 मई को होने वाले कुल मतदान का 36.5-38 फीसदी तक वोट पाना है। हालांकि कांग्रेस पार्टी के इस रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा सिद्धारमैया ही होंगे। सिद्धारमैया कर्नाटक में सात फीसदी की आबादी वाली कुरुब जाति के हैं। लिंगायत, वोक्कालिग्गा कुरुब सिद्धारमैया का कितना साथ देगा, यह चुनाव बाद पता चलेगा।

जद(एस) ने फंसाया पेंच

पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा की पार्टी जद(एस) करीब 10 साल से सत्ता से बाहर है। देवगौड़ा के पुत्र एचडी कुमार स्वामी पार्टी के सबसे प्रभावी और निर्णायक नेता हैं। लेकिन कर्नाटक के किसानों, दलितों, अल्पसंख्यकों और खासकर लिंगायत के बाद दूसरे स्तर का प्रभावी दर्ज रखने वाले वोक्कालिग्गा समाज में मजबूत पकड़ रखने वाले अपने पिता को चुनाव का मुख्य चेहरा बनाया है। बसपा और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने जद(एस) को समर्थन दे दिया है।

मंड्या, मैसूर, कोलार, चिकमंगलूर समेत 10 जिलों में जद(एस) दबदबा रखती है। ऐसे में जद(एस) को कर्नाटक विधानसभा चुनाव में किंग मेकर की भूमिका में भी देखा जा रहा है। कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद भी मानते हैं कि जद(एस) इस चुनाव में मजबूत दावेदार है। हालांकि हरिप्रसाद के मुताबिक इससे कांग्रेस पार्टी के चुनाव में सफलता पाने पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

भाजपा तोड़ेगी चक्रव्यूह

Karnataka Assembly Elections 2018: Entangled in the intriguing cocktail of religion and race
Amit Shah
भाजपा की निगाह कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सिद्धारमैया द्वारा बिछाए गए राजनीतिक चक्रव्यूह को तोड़ना है। इसके लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की टीम प्रदेश भाजपा नेताओं के साथ मिलकर होमवर्क कर रही है। पार्टी ने 81 उम्मीदवारों की दूसरी सूची जारी की है और लिंगायतों को अपने पक्ष में बनाए रखने के लिए 31 लिंगायत उम्मीदवार उतारे हैं। बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है। येदियुरप्पा शिकारीपुर से चुनाव मैदान में हैं। हालांकि दो डेवलपमेंट भाजपा के पक्ष में नहीं कहे जा रहे हैं। 

पहला यह कि भाजपा ने बेल्लारी के गली जनार्दन रेड्डी के भाई गली सोमशेखर रेड्डी को बेल्लारी से चुनाव मैदान में उतारा है। इसके अलावा दो अन्य रेड्डी कुनबे के लोगों को टिकट दिया है। रेड्डी वहां खनन माफिया के तौर पर जाने जाते हैं। बेल्लारी में प्रभाव रखते हैं, लेकिन उनके ऊपर भ्रष्टाचार के भी आरोप हैं।

येदियुरप्पा को भी भ्रष्टाचार के आरोप में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। येदियुरप्पा से अच्छा समीकरण न रखने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता का भी मानना है कि इसका पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके बावजूद भाजपा और जद(एस) दोनों को धर्म और जाति के प्रभाव में चुनाव के समीकरण बदलने की उम्मीद है।

कौन होगी सबसे बड़ी पार्टी?

इस सवाल का जवाब बहुत आसान नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का दावा कर रही हैं। कांग्रेस पार्टी के नेताओं के अनुसार उनके दल को राज्य में बहुमत मिलेगा। एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री के अनुसार न भी मिला तो बहुमत से दो-चार सीट ही कांग्रेस पीछे रहेगी। राजनीति के हालात पर नजर रखने वाले प्रमुख सूत्र के अनुसार फरवरी 2018 तक के आकलन के अनुसार कांग्रेस पार्टी को 100-108 सीटें तक मिल सकती हैं। यह आकलन एक पार्टी द्वारा कराए गए आंतरिक सर्वेक्षण के आधार पर है।

इस सर्वेक्षण में 75-85 सीटों के साथ भाजपा को दूसरी सबसे पार्टी के रूप में बताया गया है। जद(एस) के खाते में 35-40 सीटें दी गई हैं। हालांकि यह सर्वे उम्मीदवारों की घोषणा से पहले का है। उम्मीदवारों की घोषणा में कांग्रेस ने जहां अपने पुराने जिताऊ उम्मीदवारों को वरीयता दी है तथा मौजूदा विधायकों के गिने-चुने टिकट काटे हैं, वहीं भाजपा ने युवा नेताओं और नये चेहरों को अधिक अवसर दिया है। भाजपा ने उम्मीदवारों के चयन में खासी सावधानी बरती है। 
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