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केरलम: 33 हफ्ते के गर्भ में पल रहा बच्चा, जन्म के बाद नहीं रखेंगे मां-पिता; कोर्ट ने किसे सौंपने की दी अनुमति?
Tue, 27 Oct 2026 01:14 PM IST
अमन मौर्या
पीटीआई, कोच्चि, केरलम
पीटीआई, कोच्चि, केरलम
Published by: अमन मौर्या
Updated Tue, 27 Oct 2026 01:14 PM IST
सार
केरल हाई कोर्ट ने एक जोड़े को अनुमति दी है कि वे 'स्केलेटल डिस्प्लेसिया' से पीड़ित अपने होने वाले बच्चे को जन्म के बाद चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को सौंप सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि गर्भावस्था समाप्त करने की आवश्यकता नहीं है।
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केरल हाई कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
केरल हाई कोर्ट ने एक ऐसे जोड़े को, जिनके होने वाले बच्चे को 'स्केलेटल डिस्प्लेसिया' है, जन्म के बाद बच्चे को चाइल्ड वेलफेयर कमिटी (सीडब्ल्यूसी) को सौंपने की अनुमति दे दी है। जस्टिस हरिशंकर वी मेनन ने कहा कि चूंकि जोड़ा जन्म के बाद बच्चे को अपने पास नहीं रखना चाहता, इसलिए गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, बच्चे को चाइल्ड वेलफेयर कमिटी (सीडब्ल्यूसी) को सौंपा जा सकता है। यह जोड़ा 33 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति मांगने के लिए हाई कोर्ट पहुंचा था, लेकिन कोर्ट द्वारा गठित एक मेडिकल बोर्ड ने ऐसा न करने की सलाह दी।
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मेडिकल बोर्ड ने क्या कहा?
बोर्ड ने बताया कि भ्रूण को 'स्केलेटल डिस्प्लेसिया' है, जो जानलेवा नहीं है, इसलिए गर्भावस्था को समाप्त करने की कोई जरूरत नहीं है। बोर्ड ने कोर्ट को यह भी बताया कि अगर जोड़ा बच्चे को नहीं रखना चाहता, तो उसे सीडब्ल्यूसी को सौंप दिया जाना चाहिए। बोर्ड ने यह भी कहा कि जेनेटिक टेस्टिंग न होने की वजह से, इस चरण में विकास में देरी का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। मेडिकल बोर्ड की सलाह को देखते हुए, जोड़े ने गर्भावस्था को समाप्त न करने का फैसला किया, लेकिन उन्होंने बच्चे को सीडब्ल्यूसी को सौंपने की अनुमति मांगी।
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क्या है स्केलेटल डिस्प्लेसिया?
मेडिकल जर्नल्स के अनुसार, 'स्केलेटल डिस्प्लेसिया' 400 से 750 से अधिक दुर्लभ आनुवंशिक स्थितियों का एक बड़ा समूह है, जो हड्डियों और कार्टिलेज के बनने, बढ़ने या विकसित होने की प्रक्रिया में बाधा डालता है। इन स्थितियों में 'एकोंड्रोप्लेसिया' शामिल है, जो बौनेपन का सबसे आम और जानलेवा न होने वाला प्रकार है। इसमें हाथ-पैर छोटे रह जाते हैं और माथा उभरा हुआ होता है। इसके अलावा, इसमें हड्डियों के कमजोर होने की बीमारी और 'हाइपोकोंड्रोप्लेसिया' भी शामिल हैं। 'हाइपोकोंड्रोप्लेसिया' में हाथ-पैर छोटे रह जाते हैं, लेकिन यह स्थिति इतनी हल्की होती है कि बचपन या किशोरावस्था तक इसका पता भी नहीं चल पाता। 'स्केलेटल डिस्प्लेसिया' के कुछ ऐसे रूप भी होते हैं जो जानलेवा होते हैं; इनमें फेफड़ों का विकास अधूरा रह जाता है या बच्चे का जन्म मृत होता है।
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मेडिकल बोर्ड ने क्या कहा?
बोर्ड ने बताया कि भ्रूण को 'स्केलेटल डिस्प्लेसिया' है, जो जानलेवा नहीं है, इसलिए गर्भावस्था को समाप्त करने की कोई जरूरत नहीं है। बोर्ड ने कोर्ट को यह भी बताया कि अगर जोड़ा बच्चे को नहीं रखना चाहता, तो उसे सीडब्ल्यूसी को सौंप दिया जाना चाहिए। बोर्ड ने यह भी कहा कि जेनेटिक टेस्टिंग न होने की वजह से, इस चरण में विकास में देरी का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। मेडिकल बोर्ड की सलाह को देखते हुए, जोड़े ने गर्भावस्था को समाप्त न करने का फैसला किया, लेकिन उन्होंने बच्चे को सीडब्ल्यूसी को सौंपने की अनुमति मांगी।
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क्या है स्केलेटल डिस्प्लेसिया?
मेडिकल जर्नल्स के अनुसार, 'स्केलेटल डिस्प्लेसिया' 400 से 750 से अधिक दुर्लभ आनुवंशिक स्थितियों का एक बड़ा समूह है, जो हड्डियों और कार्टिलेज के बनने, बढ़ने या विकसित होने की प्रक्रिया में बाधा डालता है। इन स्थितियों में 'एकोंड्रोप्लेसिया' शामिल है, जो बौनेपन का सबसे आम और जानलेवा न होने वाला प्रकार है। इसमें हाथ-पैर छोटे रह जाते हैं और माथा उभरा हुआ होता है। इसके अलावा, इसमें हड्डियों के कमजोर होने की बीमारी और 'हाइपोकोंड्रोप्लेसिया' भी शामिल हैं। 'हाइपोकोंड्रोप्लेसिया' में हाथ-पैर छोटे रह जाते हैं, लेकिन यह स्थिति इतनी हल्की होती है कि बचपन या किशोरावस्था तक इसका पता भी नहीं चल पाता। 'स्केलेटल डिस्प्लेसिया' के कुछ ऐसे रूप भी होते हैं जो जानलेवा होते हैं; इनमें फेफड़ों का विकास अधूरा रह जाता है या बच्चे का जन्म मृत होता है।