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Khabaron ke Khiladi: शुभेंदु के एक्शन और ममता के दल में मची भगदड़, विश्लेषकों ने बताया किस ओर जा रहा बंगाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 30 May 2026 05:33 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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बंगाल के चुनाव नतीजे आने के बाद भी ये राज्य सुर्खियों में बना हुआ है। राज्य के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के एक्शन लगातार चर्चा में हैं। वहीं, दूसरी ओर ममता बनर्जी की पार्टी में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। हर कोई हार के अपने-अपने कारण गिना रहा है। कई सांसदों के पार्टी छोड़ने तक की चर्चा है। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार राम कृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, पीयूष पंत, मिहिर रंजन और अवधेश कुमार मौजूद रहे।
राम कृपाल सिंह: सीधी एक बात होती है कि आप नैतिकता के बजाय सीधे सिस्टम एक्शन, सिस्टम की बात कीजिए और उसको फुल प्रूफ बनाइए। हो सकता है कि ना बने, मैं हमेशा किसी चीज में 100% अचीवमेंट हो जाएगा ये नहीं मानता। बेसिकली जो लीडरशिप होती है, उसे अपने दिमाग में बिल्कुल क्लियर होना चाहिए और मैसेज जो उसका होता है वो डाउन द लाइन जाना चाहिए। ममता बनर्जी जो कभी इसी पार्लियामेंट में... सोमनाथ चटर्जी के ऊपर जो पेपर फाड़ के फेंका था उसमें यही था घुसपैठियों को बंगाल से निकालो। उनका एजेंडा खत्म हो गया। यह शुभेंदु अधिकारी का पहले से एजेंडा है कि हम निकालेंगे। मेरा वही कहना है कि फर्क डाउन द लाइन वही जाएगा जो आप तय करते हैं।
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राम कृपाल सिंह: सीधी एक बात होती है कि आप नैतिकता के बजाय सीधे सिस्टम एक्शन, सिस्टम की बात कीजिए और उसको फुल प्रूफ बनाइए। हो सकता है कि ना बने, मैं हमेशा किसी चीज में 100% अचीवमेंट हो जाएगा ये नहीं मानता। बेसिकली जो लीडरशिप होती है, उसे अपने दिमाग में बिल्कुल क्लियर होना चाहिए और मैसेज जो उसका होता है वो डाउन द लाइन जाना चाहिए। ममता बनर्जी जो कभी इसी पार्लियामेंट में... सोमनाथ चटर्जी के ऊपर जो पेपर फाड़ के फेंका था उसमें यही था घुसपैठियों को बंगाल से निकालो। उनका एजेंडा खत्म हो गया। यह शुभेंदु अधिकारी का पहले से एजेंडा है कि हम निकालेंगे। मेरा वही कहना है कि फर्क डाउन द लाइन वही जाएगा जो आप तय करते हैं।
पीयूष पंत: देखिए जो 15 साल वहां शासन किया है और तो वह पार्टी जब हार जाती है जो झटका लगता है तो इस तरह का बिखराव होता है, ये नेचुरल है। यह हमने पहले भी देखा जब सीपीएम हारी तो पूरा कार्डर का कार्डर टीएमसी में चला गया और अभी ये स्थिति दिख रही है कि ऊपर तो कम हुई रेजिग्नेशन। पार्टी में बिखराव थोड़ा बहुत होगा। इसलिए ममता बनर्जी ने तुरंत इंडिया अलायंस वाली बात उठा दी है और तुरंत उसमें वो जुड़ गईं, ताकि वो बिखराव की स्थिति ना बने और टीएमसी का एक वॉइस, उसका एक वजूद अब नेशनल लेवल पर बनी रहे। वो जानती हैं कि उनको पॉलिटिक्स में और पूरे सिनेरियो में बने रहना है, तभी वह उनकी पार्टी बंगाल में भी बचेगी। थोड़ा बहुत टूटन तो होता है, लेकिन मुझे अभी दिखाई नहीं दे रहा कि बहुत बड़ी टूट होगी।
अवधेश कुमार: लीडरशिप के पास अपना विजन क्लियर होना चाहिए। अगर वो क्लियर है तो बहुत कुछ करने की आवश्यकता नहीं होती है। जो घुसपैठिए हैं आप देख रहे हैं हकीमपुर में कल का जो पूरा वीडियो है वो कह रहे हैं कि भाई अब सरकार बदल गई है, हम लोग तो जा रहे हैं लाइन में लगे हुए हैं। तो बहुत ज्यादा तो मेहनत भी बहुत मुझे नहीं लगता है कि आगे इसके लिए करने की जरूरत है। जो बंगाल में है, उनको जाना ही पड़ेगा। सिस्टम ऐसा हो गया है कि जिसमें उनकी स्वीकृति नहीं हो सकती। मैंने अपने जीवन में पिछले एक सप्ताह के अंदर किसी भी सरकार के बदलने पर इतना आमूल परिवर्तन नहीं देखा था। उत्तर प्रदेश के परिवर्तन में भी समय लगा था। ट्रक वाले कह रहे हैं कि अब तो हमसे कोई पैसा नहीं मांगता है। पहले एक गुजरात मॉडल होता था, अब देश के सामने थोड़ा यूपी मॉडल हुआ, अब इस समय जो बीजेपी के पास है वो दिखाने के लिए अब पश्चिम बंगाल का मॉडल है।
अवधेश कुमार: लीडरशिप के पास अपना विजन क्लियर होना चाहिए। अगर वो क्लियर है तो बहुत कुछ करने की आवश्यकता नहीं होती है। जो घुसपैठिए हैं आप देख रहे हैं हकीमपुर में कल का जो पूरा वीडियो है वो कह रहे हैं कि भाई अब सरकार बदल गई है, हम लोग तो जा रहे हैं लाइन में लगे हुए हैं। तो बहुत ज्यादा तो मेहनत भी बहुत मुझे नहीं लगता है कि आगे इसके लिए करने की जरूरत है। जो बंगाल में है, उनको जाना ही पड़ेगा। सिस्टम ऐसा हो गया है कि जिसमें उनकी स्वीकृति नहीं हो सकती। मैंने अपने जीवन में पिछले एक सप्ताह के अंदर किसी भी सरकार के बदलने पर इतना आमूल परिवर्तन नहीं देखा था। उत्तर प्रदेश के परिवर्तन में भी समय लगा था। ट्रक वाले कह रहे हैं कि अब तो हमसे कोई पैसा नहीं मांगता है। पहले एक गुजरात मॉडल होता था, अब देश के सामने थोड़ा यूपी मॉडल हुआ, अब इस समय जो बीजेपी के पास है वो दिखाने के लिए अब पश्चिम बंगाल का मॉडल है।
मिहिर रंजन: जब कोई फॉर्मूला चलने लगता है तो हर कोई उसे आजमाता है। इसमें किसी भी तरह की नई या चौंकाने वाली बात नहीं है। ये चलने वाले फॉर्मूले को ही अमली जामा पहना रहे हैं। ये आज की बात नहीं है ये अगले पांच साल तक आपको दिखेगा। जहां तक टीएमसी की बात है तो बंगाल में जो पार्टी जाती है वो चली ही जाती है। इसलिए टीएमसी के नेता अब सोच रहे होंगे कि अगले पांच साल में हमारा भविष्य क्या होने वाला है। टीएमसी में जिन सांसदों के सुर बदले हैं, वो लोग सात-आठ महीने बाद कहां होंगे ये देखना ज्यादा दिलचस्प होगा।
विनोद अग्निहोत्री: डूबते को तिनके का सहारा। तो ममता जी को भी अब सहारा चाहिए। अब वो आएंगी राष्ट्रीय राजनीति में हाथ जोड़ वाली मुद्रा में। अब उनको कांग्रेस की भी जरूरत है, उनको समाजवादी पार्टी की भी जरूरत है, उनको तमाम यहां तक कि वामपंथियों की भी जरूरत है। टीएमसी में अभिषेक बनर्जी की स्वीकार्यता नहीं है। ममता जी चुनाव भले हार गई हैं, लेकिन जो भी स्वीकार्यता है तृणमूल कांग्रेस में वो ममता बनर्जी की ही है। ऐसा नहीं है कि वो बंगाल पूरी तरह छोड़ देंगी। वो इंडिया गठबंधन इसलिए मजबूत करना चाहती हैं ताकि भारतीय जनता पार्टी से जब लड़ाई हो, उसमें फिर दमन भी होगा तब उनको सहयोग की जरूरत पड़ेगी दिल्ली में। इसलिए उनको इंडिया गठबंधन की जरूरत है। उनकी सबसे बड़ी चुनौती अपने सांसदों को बचाने की है। जो गैर मुस्लिम है उनको बीजेपी के साथ आने में कोई दिक्कत नहीं होगी। उनको क्या है, तृणमूल की तीन पत्तियां हटा के फूल ही तो डालना है, डाल लेंगे।
विनोद अग्निहोत्री: डूबते को तिनके का सहारा। तो ममता जी को भी अब सहारा चाहिए। अब वो आएंगी राष्ट्रीय राजनीति में हाथ जोड़ वाली मुद्रा में। अब उनको कांग्रेस की भी जरूरत है, उनको समाजवादी पार्टी की भी जरूरत है, उनको तमाम यहां तक कि वामपंथियों की भी जरूरत है। टीएमसी में अभिषेक बनर्जी की स्वीकार्यता नहीं है। ममता जी चुनाव भले हार गई हैं, लेकिन जो भी स्वीकार्यता है तृणमूल कांग्रेस में वो ममता बनर्जी की ही है। ऐसा नहीं है कि वो बंगाल पूरी तरह छोड़ देंगी। वो इंडिया गठबंधन इसलिए मजबूत करना चाहती हैं ताकि भारतीय जनता पार्टी से जब लड़ाई हो, उसमें फिर दमन भी होगा तब उनको सहयोग की जरूरत पड़ेगी दिल्ली में। इसलिए उनको इंडिया गठबंधन की जरूरत है। उनकी सबसे बड़ी चुनौती अपने सांसदों को बचाने की है। जो गैर मुस्लिम है उनको बीजेपी के साथ आने में कोई दिक्कत नहीं होगी। उनको क्या है, तृणमूल की तीन पत्तियां हटा के फूल ही तो डालना है, डाल लेंगे।