राजघराने के समलैंगिक युवराज लड़ेंगे अब आगे की लड़ाई, बच्चा गोद लेने का भी बने प्रावधान
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय दंड संहिता की धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट के एतिहासिक फैसले के बाद एलजीबीटी समुदाय में नागरिक अधिकारों की मांग शुरू हो गई हैं। सुप्रीम कोर्ट में एलजीबीटी अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अब अगली लड़ाई सामाजिक अधिकारिकों और बच्चों के गोद लेने के कानूनों में बदलाव के लिए लड़ी जाएगी। वहीं राजपीपला के राजघराने के समलैंगिक युवराज मानवेंद्र सिंह गोहिल भी बच्चा गोद लेने की सोच रहे हैं।
समाज रूढ़िवादी विचारधारा से बाहर आए
अमर उजाला से खास बातचीत में ललित सूरी हॉस्पिटैलिटी ग्रुप रे एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर केशव सूरी का कहना है कि आगे की लड़ाई अभी बाकी है। हमें समाज में एलजीबीटी समुदाय के प्रति जागरुकता लानी होगी। समाज को रूढ़िवादी विचारधारा से बाहर निकलना होगा और हमें स्वीकार करना होगा। केशव का कहना है कि फिलहाल अभी सेक्शन 377 को इस अपराध के दायरे से बाहर निकालना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है, लेकिन लड़ाई अभी जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद समाज में एलजीबीटी कपल्स की संख्या बढ़ेगी। वर्तमान में कई कपल्स बच्चों को गोद लेना चाहते हैं, लेकिन वर्तमान कानूनों के तहत यह संभव नहीं है। लेकिन आगे की लड़ाई में इस मुद्दे को भी प्रमुखता से शामिल किया जाएगा और एडॉप्शन कानूनों में बदलाव की मांग की जाएगी।
युवराज लड़ेंगे सोशल राइट्स के लिए लड़ाई
एडॉप्शन लॉ में बदलावों की मांग को लेकर गुजरात के राजपीपला के राजघराने के समलैंगिक युवराज मानवेंद्र सिंह गोहिल भी खासे उत्साहित हैं। अमरउजाला से विशेष बातचीत में उन्होंने बताया कि उन्होंने वंश चलाने की खातिर बच्चा गोद लेने का फैसला किया है। मानवेंद्र का कहना है कि वह नहीं चाहते कि उनके समलैंगिक होने और शादी न करने से राजघराने की वंश चलाने की परंपरा खत्म न जाए। इसलिए उन्होंने एक बच्चा गोद लेकर वंश आगे बढ़ाने का इरादा बना लिया है। उनका कहना है कि इस लड़ाई को ही जीतने में 25 साल लग गए, आगे की लड़ाई में कितना वक्त लगेगा पता नहीं। उन्होंने कहा कि लीगल राइट्स के बाद हम सोशल राइट्स के लिए लड़ेंगे। मानवेंद्र ने यह भी कहा कि वह परिवार में ही किसी का बच्चा गोद लेंगे।
सुप्रीम कोर्ट है संजीदा
उन्होंने कहा कि एक समलैंगिक कपल शादी के बाद बच्चों को गोद लेने के बारे में भी सोचेगा, लेकिन हमारे कानून इसकी इजाजत नहीं देते। अंजलि का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि देश में सभी को समानता का अधिकार मिला हुआ है। इसलिए सभी को बराबर के अधिकार मिलने चाहिए।
मिलें सामान्य कपल जैसे अधिकार
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में गोपनीयता और व्यक्तिगत आजादी के सिद्धांत को मान्यता दी है। हर किसी की निजता का सम्मान करना वक्त की जरूरत है।
साल्वे ने कहा कि समान नागरिक अधिकार और आर्थिक अधिकारों की लड़ाई आगे जारी रहेगी। वहीं इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली प्रीथा श्रीकुमार ने समानता के अधिकारों की पुरजोर वकालत की। उन्होंने कहा कि एक सामान्य कपल की तरह होमो सेक्शुअल कपल्स को भी सभी अधिकार मिलने चाहिए। उन्होंने कहा कि बाहरी देशों में समलैंगिक कपल्स बच्चे गोद ले सकते हैं।
विदेशों में ले सकते हैं गोद
गौरतलब है कि इंग्लेंड और वेल्स में सन् 2005, स्कॉटलैंड में सन् 2009 और नॉर्दन आयरलैंड में सन् 2013 से समलैंगिक जोड़ों का संयुक्त रूप से बच्चा गोद लेना कानूनी रूप से वैध है। लेकिन यहां के कानून के मुताबिक यह संभव नहीं है।
दक्षिण अफ्रिका के कानून की बात करें, तो वहां भी समलैंगिकता, समलैंगिक जोड़ों का विवाह और बच्चे गोद लेना कानूनी तौर पर वैध है। विधि आयोग ने कॉमन सिविल कोड पर पेश अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में सभी समुदायों के लिए गोद लेने के कानूनों में बदलाव की बात कही थी। आयोग ने कहा था कि जूवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015 को मजबूत धर्मनिरपेक्ष कानून बनाने के लिए विस्तारित किया जाना चाहिए, ताकि सभी समुदायों के लोग बच्चों को गोद ले सकें।
वहीं केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में एकांत में परस्पर सहमति से वयस्कों के बीच सेक्स से संबंधित धारा 377 की संवैधानिक वैधता की परख करने का मामला शीर्ष अदालत के विवेक पर छोड़ दिया था। सरकार ने कहा था कि समलैंगिक विवाह, गोद लेना और दूसरे नागरिक अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट को विचार नहीं करना चाहिए।