सरकार-विपक्ष के बीच टकराव बढ़ा, विपक्ष ने सरकार की बैठक का बहिष्कार किया
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संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान राज्यसभा की कार्रवाई ठप रहने से नाराज विपक्ष ने बृहस्पतिवार को सरकार द्वारा आहूत बैठक का बहिष्कार कर दिया। 11 दिसंबर से शुरु हुए शीतकालीन सत्र में राज्यसभा एक दिन भी नहीं चल पाई है। अन्ना डीएमके के सांसद रोज सुबह सदन के वेल में जाकर नारेबाजी करते हैं और महज कुछ मिनट बाद सभापति एम वेंकैय्या नायडू दिन भर के लिए राज्यसभा स्थगित कर देते हैं।
नायडू ने ही सरकार को विपक्ष से बात कर इस गतिरोध को खत्म करने के निर्देश दिए थे। इसी क्त्रस्म में संसदीय कार्यमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और राज्यमंत्री विजय ने बृहस्पतिवार को विपक्षी नेताओं से अगले सप्ताह के लिए राज्यसभा का एजेंडा तय करने के लिए नेता सदन अरुण जेटली के संसद भवन स्थित कक्ष में आने का न्योता दिया। लेकिन विपक्षी दलों ने बैठक का बहिष्कार कर दिया।
राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल के नेता डेरेक ओ’ब्रायन का कहना था कि सरकार अपने सहयोगी दल अन्नाडीएमके का सहारा लेकर जानबूझकर राज्यसभा नहीं चलने दे रही है जिससे विपक्ष जनता से जुड़े किसानों की समस्या, रोजगार के अवसरों की कमी, सीबीआई, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, सरकार द्वारा आम लोगों के कंप्यूटर की जासूसी कराना और राफेल विमान सौदे पर विवाद जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे उठा न पाए।
विपक्षी नेताओं का कहना था कि जब सदन चलना ही नहीं है तो मीटिंग ही क्यों करना। संसद सत्र शुरू होने से पहल बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में अन्ना डीएमके ने खुद को सरकार का सहयोगी दल करार दिया था। यदि सरकार सदन चलाने के प्रति सचमुच गंभीर है तो उसे अन्ना डीएमके के सांसदों को सदन बाधित न करने के लिए मनाना चाहिए।
इसलिए वे जेटली के कमरे में जाने के बजाए नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद के कार्यालय में मिले और आगे की रणनीति बनाई। इस बैठक में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के अलावा, सपा, बसपा, माकपा, भाकपा, राकांपा, तेदेपा, रालोद आदि दलों के नेता शामिल हुए।
हंगामे में बिल पेश होने पर नाराज
जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 में संशोधन कर आप्रवासी भारतीयों को मतदान का अधिकार देने वाले विधेयक को सरकार द्वारा राज्यसभा में चल रहे हंगामे के पेश किए जाने पर भी विपक्षी दल नाराज हैं। उन्होंने अपनी नाराजगी से सरकार को भी अवगत करा दिया। वे ट्रांसजेंडर और मानव तस्करी रोकथाम पर लोकसभा में पारित बिलों को प्रवर समिति के हवाले करने का फैसला किया है। यानी ये विधेयक अब लोकसभा चुनाव के बाद ही पारित हो पाएंगे।