सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Parliament Lok Sabha Speaker Om Birla Opposition may bring No Confidence Motion in Budget Session procedure

क्या है लोकसभा स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया: विपक्ष ला सकता है अविश्वास प्रस्ताव, जानें नियम; पहले कब हुआ ऐसा?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 09 Feb 2026 05:28 PM IST
विज्ञापन
सार

लोकसभा स्पीकर को लेकर विपक्ष की क्या शिकायतें हैं? संसद के निचले सदन के अध्यक्ष को हटाने की क्या प्रक्रिया है? विपक्ष कब तक इस प्रस्ताव को पेश करने की योजना बना रहा है? क्या पहले कभी लोकसभा स्पीकर को हटाने की कोशिशें की गई हैं? आइये जानते हैं...

Parliament Lok Sabha Speaker Om Birla Opposition may bring No Confidence Motion in Budget Session procedure
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ला सकता है अविश्वास प्रस्ताव। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार

लोकसभा में बजट सत्र की शुरुआत से लेकर अब तक सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध की स्थिति बनी हुई है। खासकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी की तरफ से भारत के पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब से जुड़े संदर्भ पेश करने की मांग के बाद से। 
Trending Videos


इस मामले में विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को भी घेरा है, जिन्होंने राहुल को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव से इतर किसी किताब या रिपोर्ट पर बोलने की इजाजत नहीं दी। अब सामने आया है कि लोकसभा स्पीकर के खिलाफ विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। न्यूज एजेंसी एएनआई के सूत्रों के मुताबिक, विपक्षी सांसदों का आरोप है कि लोकसभा स्पीकर सदन में पक्षपात करते हैं और कुछ सदस्यों को बोलने की मंजूरी नहीं देते।
विज्ञापन
विज्ञापन

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर लोकसभा स्पीकर को लेकर विपक्ष की क्या शिकायतें हैं? संसद के निचले सदन के अध्यक्ष को हटाने की क्या प्रक्रिया है? विपक्ष कब तक इस प्रस्ताव को पेश करने की योजना बना रहा है? क्या पहले कभी लोकसभा स्पीकर को हटाने की कोशिशें की गई हैं? आइये जानते हैं...

पहले जानें- लोकसभा स्पीकर से क्या हैं विपक्ष की शिकायतें?

विपक्षी दलों का आरोप है कि उन्हें बहस के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया जाता और उनके नोटिसों को चुनिंदा तरीके से स्वीकार किया जाता है। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल के अनुसार, जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी बोलने के लिए खड़े होते हैं, तो अक्सर उनका माइक बंद कर दिया जाता है।

विपक्ष ने स्पीकर के उस बयान पर आपत्ति जताई है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि महिला सांसद प्रधानमंत्री पर हमले की योजना बना रही थीं। विपक्ष ने इस आरोप को निराधार बताते हुए स्पीकर से इस पर स्पष्टीकरण और सबूत की मांग की है।

ये भी पढ़ें: Om Birla: लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है विपक्ष, लगाए गंभीर आरोप

क्या लोकसभा अध्यक्ष को हटाया जा सकता है, आखिर कैसे?

भारतीय संविधान में लोकसभा स्पीकर (अध्यक्ष) को हटाने की प्रक्रिया है। इसे तकनीकी रूप से 'महाभियोग' नहीं कहा जाता। संविधान में स्पीकर को हटाने का जिक्र अनुच्छेद 94(सी) के तहत दिया गया है। इसमें कहा गया है कि स्पीकर को लोकसभा के प्रस्ताव के जरिए हटाया जा सकता है।

क्या है लोकसभा स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया?

14 दिनों का नोटिस: स्पीकर को हटाने के लिए लिखित नोटिस दिया जाना जरूरी है। वह भी कम से कम प्रक्रिया शुरू करने से 14 दिन पहले। इसी के साथ ऐसे किसी भी प्रस्ताव के लिए कम से कम 50 सांसदों का समर्थन जरूरी है।

सदन की अध्यक्षता: जब स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर सदन में चर्चा या बहस हो रही होती है, तब स्पीकर सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते। इस दौरान डिप्टी स्पीकर या राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त कोई अन्य सदस्य सदन की कार्यवाही का संचालन करता है।

मतदान की प्रक्रिया: स्पीकर को हटाने के लिए सदन के तत्कालीन सभी सदस्यों के बहुमत की जरूरत होती है। सीधे शब्दों में यह सामान्य अविश्वास प्रस्ताव से अलग है, क्योंकि इसमें केवल सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत पर्याप्त नहीं होता। सभी सदस्यों की मौजूदगी और उनका मतदान करना जरूरी होता है।

इसे एक उदाहरण से समझें, अगर सदन की कुल सदस्य संख्या 543 है, तो स्पीकर को हटाने के लिए कम से कम 272 वोटों की जरूरत होगी, चाहे सदन में कितने भी सदस्य गैरमौजूद हों या मतदान में हिस्सा न ले रहे हों।

प्रस्ताव पारित होने का असर: अगर लोकसभा में यह प्रस्ताव बहुमत से पारित हो जाता है, तो स्पीकर को तत्काल प्रभाव से पद छोड़ना पड़ता है। इसके साथ ही सदन को नए अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करनी होती है।

चूंकि लोकसभा स्पीकर मुख्यतः उसी दल की तरफ से चुना जाता है, जो सत्ता में होता है, ऐसे में अगर स्पीकर को हटाने के लिए जरूरी वोट मिल जाते हैं तो यह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के तौर पर देखा जाता है। इसका मतलब है कि सत्तापक्ष लोकसभा में बहुमत खो चुका है और उसके पास सरकार में रहने के लिए जरूरी 272 सदस्यों का समर्थन नहीं है। ऐसे में विपक्ष मौके पर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी ला सकता है।


 

क्या हो सकते हैं लोकसभा स्पीकर को हटने के अन्य आधार?

अयोग्यता: अगर स्पीकर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धाराओं के तहत लोकसभा की सदस्यता के लिए अयोग्य घोषित हो जाते हैं, तो उन्हें पद छोड़ना होगा।

इस्तीफा: स्पीकर खुद डिप्टी स्पीकर को लिखित इस्तीफा देकर पद त्याग सकते हैं।

ऐतिहासिक रूप से, भारत में अब तक किसी भी लोकसभा स्पीकर को इस प्रक्रिया के जरिए नहीं हटाया गया है। यानी साफ तौर पर संविधान की तरफ से स्पीकर पद की गरिमा को ऊपर रखा गया है। इसलिए इसकी प्रक्रिया को भी जटिल किया गया है। विपक्षी दल अक्सर इस प्रक्रिया का इस्तेमाल संख्याबल में जीत हासिल करने के बजाय स्पीकर के आचरण पर औपचारिक रूप से सवाल उठाने के लिए करते हैं।

क्या पहले भी कभी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आए हैं?

भारतीय संसदीय इतिहास में लोकसभा अध्यक्ष को उनके पद से हटाने के लिए अब तक तीन बार प्रस्ताव लाए गए हैं, लेकिन ये तीनों ही बार सदन में गिर गए और कभी भी किसी अध्यक्ष को हटाया नहीं जा सका।

1. नेहरू के प्रधानमंत्री रहते हुए
भारत के पहले लोकसभा अध्यक्ष जीवी मालवंकर के खिलाफ 18 दिसंबर 1954 को अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। विपक्ष ने उन पर पक्षपातपूर्ण आचरण करने और सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्षी सदस्यों के अधिकारों की रक्षा न करने का आरोप लगाया था। विपक्ष का मानना था कि वे सरकार के प्रति अधिक झुकाव रख रहे थे। हालांकि, मालवंकर के मामले में भी, तत्कालीन सरकार के पास भारी बहुमत होने के कारण यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था।

ये भी पढ़ें: Parliament: 'लोकसभा स्पीकर के महिला सांसदों के खिलाफ बयान अपमानजनक', विपक्ष ने ओम बिरला को लिखा पत्र

2. जब पेश भी नहीं हो पाया था प्रस्ताव
स्पीकर को हटाने के लिए एक अविशअवास प्रस्ताव 24 नवंबर 1966 को लाया गया था। इसमें आरोप था कि उन्होंने कई प्रश्नों को सदन में रखने की इजाजत नहीं दी, क्योंकि यह सवाल प्रधानमंत्री, अन्य मंत्रियों, कांग्रेस के अन्य नेताओं और उच्च अधिकारियों के लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकते थे। 

स्पीकर पर यह भी आरोप लगे थे कि वे खुद सांसदों के विशेषाधिकारों का हनन कर रहे थे, क्योंकि वे सदन में दूसरे नेताओं के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने तक की अनुमति नहीं दे रहे थे। उन पर संसदीय प्रक्रिया को मनमाने तरीके से चलाने और अनुशासनात्मक शक्तियों का इस्तेमाल सरकार को बचाने के लिए करने का आरोप भी लगा था। विपक्ष का कहना था कि वह अपनी ताकत के जरिए उसकी आवाज दबा रहे थे। 

हालांकि, विपक्ष इस प्रस्ताव को लोकसभा में पेश ही नहीं कर सका, क्योंकि उसे इसे पेश करने के लिए 50 सांसदों का समर्थन भी हासिल नहीं हुआ। 
 

3. तीसरी बार भी सफल नहीं रहा था प्रस्ताव
15 अप्रैल 1987 को भी लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए एक प्रस्ताव लाया गया। इसे माकपा सांसद सोमनाथ चटर्जी की तरफ से पेश किया गया। उन पर भी पक्षपात के आरोप लगे थे। हालांकि, सदन में उनके खिलाफ लाया गया प्रस्ताव पारित नहीं कराया जा सका। 

पहले अविश्वास प्रस्ताव के दौरान क्या बोले थे पीएम नेहरू?

दिसंबर 1954 में भारत के पहले लोकसभा अध्यक्ष जी.वी. मालवंकर के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विपक्ष के इस कदम की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने इस प्रस्ताव को विपक्ष की अक्षमता, ओछेपन का प्रदर्शन करार दिया था। 

नेहरू ने लोकसभा अध्यक्ष की ईमानदारी पर सवाल उठाने पर गहरा दुख जताया था। उन्होंने कहा था कि जब हम अध्यक्ष की निष्ठा को चुनौती देते हैं, तो हम देशवासियों और दुनिया के सामने यह दिखाते हैं कि हम छोटे लोग हैं और यही इस स्थिति की गंभीरता है। नेहरू ने विपक्ष द्वारा हस्ताक्षरित संकल्प को विद्वेषपूर्ण कहा था और संदेह जताया कि क्या हस्ताक्षर करने वालों ने इसे पढ़ने की जहमत भी उठाई थी।

नेहरू इस प्रस्ताव के खिलाफ जरूर थे, लेकिन उन्होंने स्पीकर से अपील की थी कि इसकी प्रकृति को देखते हुए सदन में विपक्ष को सत्ता पक्ष की तुलना में बोलने के लिए अधिक समय दिया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने कम्युनिस्ट सांसदों की आलोचना करते हुए कहा कि वे लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते, इसलिए उनसे जिम्मेदारी की उम्मीद नहीं की जा सकती। अंत में उन्होंने यह तक कह दिया कि किसी भी सदस्य से इस प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए कहना यह मान लेने जैसा होगा कि उस सदस्य के पास अपनी कोई बुद्धि नहीं है।

नेहरू का मानना था कि अध्यक्ष का पद सदन की गरिमा और स्वतंत्रता का प्रतीक है, और इस पर हमला करना देश की स्वतंत्रता के प्रतीक पर हमला करने जैसा है। आखिरकार सरकार के बहुमत के कारण यह प्रस्ताव सदन में खारिज हो गया था।

अन्य वीडियो
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

Election
एप में पढ़ें

Followed