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ओबीसी आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- माता-पिता के वेतन से तय नहीं होगी क्रीमीलेयर; केंद्र से मांगा जवाब
Fri, 06 Nov 2026 12:50 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 06 Nov 2026 12:50 PM IST
सार
ओबीसी क्रीमीलेयर तय करने में माता-पिता के वेतन के साथ उनके पद की श्रेणी भी अहम होगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि फैसले से पुरानी नियुक्तियों और प्रमोशन पर असर नहीं पड़ेगा। लेकिन लंबित मामलों और 958 अभ्यर्थियों के सेवा आवंटन का क्या होगा? पढ़िए इस रिपोर्ट में।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार की ओर से दाखिल एक आवेदन पर फैसला सुनाया। केंद्र ने 11 मार्च को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा था। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के किसी अभ्यर्थी का क्रीमीलेयर दर्जा केवल उसके माता-पिता की वेतन से होने वाली आय के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता के पदों की श्रेणी पर भी विचार करना जरूरी है।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला इस मामले में शामिल पक्षों पर ही लागू होगा। पहले से तय वरिष्ठता और पदोन्नति के मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा। लंबित मामलों पर संबंधित अदालतें अपने-अपने तथ्यों और पात्रता के आधार पर फैसला करेंगी। साथ ही, कोर्ट ने अपने फैसले का पालन करने के लिए आठ सप्ताह का और समय दिया है।
पुरानी नियुक्तियों और दाखिलों पर क्या होगा असर?
न्यायमूर्ति पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार के विविध आवेदन पर यह फैसला सुनाया। केंद्र ने आग्रह किया था कि 11 मार्च के फैसले को भविष्य में लागू किया जाए। फैसले की प्रति अभी उपलब्ध नहीं हुई है।
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केंद्र सरकार ने फैसले को पुराने मामलों पर लागू करने के संभावित नतीजों को लेकर चिंता जताई थी। उसने कहा था कि इसकी ऐसी व्याख्या से केंद्र सरकार, 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पहले ही पूरी हो चुकी भर्तियों और दाखिलों पर असर पड़ सकता है।
केंद्र की याचिका में कहा गया था, पात्रता के बदले हुए मानदंड को पिछली तारीख से या देरी से लागू करने से उन नियुक्तियों और दाखिलों में अनिश्चितता पैदा हो सकती है, जो उस समय लागू नियमों और प्रमाणपत्रों के आधार पर किए गए थे। इससे ओबीसी-एनसीएल दर्जे, वरिष्ठता, सेवा शर्तों और करियर में आगे बढ़ने को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
ये भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स: पंजाब-हरियाणा को हिमाचल को देनी होगी 11973 मिलियन यूनिट बिजली; 60 साल पुराना विवाद खत्म
सरकार ने आगे कहा था कि इसका असर केंद्रीय और राज्य के शैक्षणिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक संस्थानों में दाखिलों पर भी पड़ सकता है। इसलिए आवेदक विनम्रतापूर्वक यह आग्रह करता है कि फैसले को किस समय से लागू किया जाएगा, इस बारे में स्पष्टीकरण दिया जाए। इससे पहले पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं, नियुक्तियों और दाखिलों तथा उनसे जुड़े अधिकारों में बदलाव की स्थिति से बचा जा सके।
केंद्र ने किन दो मांगों के लिए मांगा था समय?
केंद्र सरकार ने दो साल का समय मांगा था। इसका उद्देश्य दूसरे संगठनों में मौजूद पदों की सरकारी पदों के बराबर स्थिति तय करना था। इसके लिए संबंधित पक्षों से बातचीत की जानी थी। साथ ही, जहां पदों की बराबरी तय नहीं हुई है, वहां ओबीसी क्रीमीलेयर का दर्जा तय करने के लिए एक समान व्यवस्था बनाने की मांग की गई थी।
केंद्र ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की लोक सेवा परीक्षा (सीएसई) 2025 में अनुशंसित 958 अभ्यर्थियों को सेवा आवंटित करने की अनुमति भी मांगी थी। यह मांग स्पष्टीकरण आवेदन पर फैसला आने तक के लिए की गई थी।
11 मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
11 मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केवल वेतन से होने वाली आय के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई अभ्यर्थी ओबीसी क्रीमीलेयर में आता है या नहीं। कोर्ट ने कहा था कि अभ्यर्थी के माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी भी जरूरी आधार हैं।
यह विवाद 8 अगस्त 1993 के कार्यालय ज्ञापन और 14 अक्तूबर 2004 के स्पष्टीकरण पत्र की व्याख्या से जुड़ा था। 1993 के कार्यालय ज्ञापन में माता-पिता के वेतन को क्रीमीलेयर का दर्जा तय करने का आधार नहीं बनाया गया है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित पद किस श्रेणी में आता है।
जहां आय और संपत्ति जांच का नियम लागू होता है, वहां वेतन और कृषि से होने वाली आय को कुल आय की गणना में शामिल नहीं किया जाता। हालांकि, 2004 के स्पष्टीकरण में कहा गया था कि जहां सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू), बैंकों, विश्वविद्यालयों और निजी संस्थानों जैसे संगठनों के पदों की सरकारी पदों से बराबरी तय नहीं हुई है, वहां माता-पिता की वेतन से होने वाली आय पर विचार किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 2004 का स्पष्टीकरण ऐसी नई और जरूरी शर्त नहीं जोड़ सकता, जो 1993 की नीति में मौजूद ही नहीं थी। कोर्ट ने यह भी कहा था कि पीएसयू या निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के साथ सरकारी कर्मचारियों के समान स्थिति वाले बच्चों से अलग व्यवहार करना भेदभाव हो सकता है। ऐसे बच्चों को वेतन के आधार पर क्रीमीलेयर से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन हो सकता है।
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शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला इस मामले में शामिल पक्षों पर ही लागू होगा। पहले से तय वरिष्ठता और पदोन्नति के मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा। लंबित मामलों पर संबंधित अदालतें अपने-अपने तथ्यों और पात्रता के आधार पर फैसला करेंगी। साथ ही, कोर्ट ने अपने फैसले का पालन करने के लिए आठ सप्ताह का और समय दिया है।
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पुरानी नियुक्तियों और दाखिलों पर क्या होगा असर?
न्यायमूर्ति पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार के विविध आवेदन पर यह फैसला सुनाया। केंद्र ने आग्रह किया था कि 11 मार्च के फैसले को भविष्य में लागू किया जाए। फैसले की प्रति अभी उपलब्ध नहीं हुई है।
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केंद्र सरकार ने फैसले को पुराने मामलों पर लागू करने के संभावित नतीजों को लेकर चिंता जताई थी। उसने कहा था कि इसकी ऐसी व्याख्या से केंद्र सरकार, 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पहले ही पूरी हो चुकी भर्तियों और दाखिलों पर असर पड़ सकता है।
केंद्र की याचिका में कहा गया था, पात्रता के बदले हुए मानदंड को पिछली तारीख से या देरी से लागू करने से उन नियुक्तियों और दाखिलों में अनिश्चितता पैदा हो सकती है, जो उस समय लागू नियमों और प्रमाणपत्रों के आधार पर किए गए थे। इससे ओबीसी-एनसीएल दर्जे, वरिष्ठता, सेवा शर्तों और करियर में आगे बढ़ने को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
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सरकार ने आगे कहा था कि इसका असर केंद्रीय और राज्य के शैक्षणिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक संस्थानों में दाखिलों पर भी पड़ सकता है। इसलिए आवेदक विनम्रतापूर्वक यह आग्रह करता है कि फैसले को किस समय से लागू किया जाएगा, इस बारे में स्पष्टीकरण दिया जाए। इससे पहले पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं, नियुक्तियों और दाखिलों तथा उनसे जुड़े अधिकारों में बदलाव की स्थिति से बचा जा सके।
केंद्र ने किन दो मांगों के लिए मांगा था समय?
केंद्र सरकार ने दो साल का समय मांगा था। इसका उद्देश्य दूसरे संगठनों में मौजूद पदों की सरकारी पदों के बराबर स्थिति तय करना था। इसके लिए संबंधित पक्षों से बातचीत की जानी थी। साथ ही, जहां पदों की बराबरी तय नहीं हुई है, वहां ओबीसी क्रीमीलेयर का दर्जा तय करने के लिए एक समान व्यवस्था बनाने की मांग की गई थी।
केंद्र ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की लोक सेवा परीक्षा (सीएसई) 2025 में अनुशंसित 958 अभ्यर्थियों को सेवा आवंटित करने की अनुमति भी मांगी थी। यह मांग स्पष्टीकरण आवेदन पर फैसला आने तक के लिए की गई थी।
11 मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
11 मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केवल वेतन से होने वाली आय के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई अभ्यर्थी ओबीसी क्रीमीलेयर में आता है या नहीं। कोर्ट ने कहा था कि अभ्यर्थी के माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी भी जरूरी आधार हैं।
यह विवाद 8 अगस्त 1993 के कार्यालय ज्ञापन और 14 अक्तूबर 2004 के स्पष्टीकरण पत्र की व्याख्या से जुड़ा था। 1993 के कार्यालय ज्ञापन में माता-पिता के वेतन को क्रीमीलेयर का दर्जा तय करने का आधार नहीं बनाया गया है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित पद किस श्रेणी में आता है।
जहां आय और संपत्ति जांच का नियम लागू होता है, वहां वेतन और कृषि से होने वाली आय को कुल आय की गणना में शामिल नहीं किया जाता। हालांकि, 2004 के स्पष्टीकरण में कहा गया था कि जहां सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू), बैंकों, विश्वविद्यालयों और निजी संस्थानों जैसे संगठनों के पदों की सरकारी पदों से बराबरी तय नहीं हुई है, वहां माता-पिता की वेतन से होने वाली आय पर विचार किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 2004 का स्पष्टीकरण ऐसी नई और जरूरी शर्त नहीं जोड़ सकता, जो 1993 की नीति में मौजूद ही नहीं थी। कोर्ट ने यह भी कहा था कि पीएसयू या निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के साथ सरकारी कर्मचारियों के समान स्थिति वाले बच्चों से अलग व्यवहार करना भेदभाव हो सकता है। ऐसे बच्चों को वेतन के आधार पर क्रीमीलेयर से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन हो सकता है।