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Explainer: क्या है ऑपरेशन टाइगर, जिसके चलते उद्धव शिवसेना के सांसद टूटने का खतरा, कौन-किसके साथ, कौन खिलाफ?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 17 Jun 2026 06:02 PM IST
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सार
2022 में शिवसेना में हुई टूट के बाद अब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना-यूबीटी पर फिर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। दरअसल, पार्टी के कुछ सांसदों और विधायकों के शिंदे शिवसेना के संपर्क में होने की बात सामने आई है। शिवसेना-यूबीटी ने सीधे तौर पर इसे भाजपा की साजिश करार दिया है। महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम को ऑपरेशन टाइगर का भी नाम दिया है।
शिवसेना-यूबीटी बनाम शिवसेना।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
देश की राजनीति में इस वक्त बगावतों का दौर चल रहा है। पहले आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा कैंप में बगावत, फिर तमिलनाडु के चुनाव नतीजे आने के बाद अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) के सांसदों का बागी रवैया, इसके बाद पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों और विधायकों का टूटना और अब महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव-बालासाहेब) ठाकरे में एक और टूट की आहट। यानी एक के बाद एक चार दलों में बागी नेताओं ने सियासी हलचल बढ़ा दी हैं।
महाराष्ट्र में यह सियासी हलचल कई मायनों में अहम है। दरअसल, 2022 में ही उद्धव के नेतृत्व वाली शिवेसना के कई विधायक और सांसद टूट चुके हैं। इसके चलते उद्धव ठाकरे को अपनी पार्टी शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न दोनों खोने पड़े थे। अब एक बार फिर पार्टी के कुछ सांसदों के टूटने की आशंका जताई जा रही है। इसे लेकर महाराष्ट्र से दिल्ली तक राजनीतिक माहौल गर्माया हुआ है। शिवसेना-यूबीटी ने सीधे तौर पर इसे भाजपा की साजिश करार दिया है। महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम को ऑपरेशन टाइगर का भी नाम दिया है।
महाराष्ट्र में यह सियासी हलचल कई मायनों में अहम है। दरअसल, 2022 में ही उद्धव के नेतृत्व वाली शिवेसना के कई विधायक और सांसद टूट चुके हैं। इसके चलते उद्धव ठाकरे को अपनी पार्टी शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न दोनों खोने पड़े थे। अब एक बार फिर पार्टी के कुछ सांसदों के टूटने की आशंका जताई जा रही है। इसे लेकर महाराष्ट्र से दिल्ली तक राजनीतिक माहौल गर्माया हुआ है। शिवसेना-यूबीटी ने सीधे तौर पर इसे भाजपा की साजिश करार दिया है। महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम को ऑपरेशन टाइगर का भी नाम दिया है।
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आइये जानते हैं कि महाराष्ट्र में जिस ऑपरेशन टाइगर की चर्चाएं तेज हैं, वह क्या है और इसकी आहट कब से सुनी जा रही थी? शिवसेना में लेकर हालिया घटनाक्रम क्या हुआ है, जिसने उद्धव ठाकरे की चिंता बढ़ा दी है? इस बारे में पार्टी का क्या कहना है? क्या शिवसेना-यूबीटी से एक और टूट संभव है? इसके अलावा अगर यह टूट संभव होती है और इसका फायदा एनडीए को होता है तो इसके क्या मायने होंगे?
ऑपरेशन टाइगर महाराष्ट्र की राजनीति में इस्तेमाल किया जा रहा एक शब्द है, जो एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना की तरफ से उद्धव ठाकरे गुट वाली शिवसेना के नेताओं और सांसदों को अपने पाले में लाने की एक कथित कोशिश का पर्याय माना जाता है। चर्चाओं और दावों के मुताबिक, शिवसेना-यूबीटी के नौ लोकसभा सांसदों में से छह से सात सांसद शिंदे गुट के संपर्क में हैं और वे संसद के मानसून सत्र से पहले पाला बदल सकते हैं। इसके अलावा, 16 विधायकों के भी शिंदे गुट के संपर्क में होने का दावा किया गया है।
महाराष्ट्र में जिस ऑपरेशन टाइगर की चर्चाएं तेज हैं, वह क्या है?
ऑपरेशन टाइगर महाराष्ट्र की राजनीति में इस्तेमाल किया जा रहा एक शब्द है, जो एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना की तरफ से उद्धव ठाकरे गुट वाली शिवसेना के नेताओं और सांसदों को अपने पाले में लाने की एक कथित कोशिश का पर्याय माना जाता है। चर्चाओं और दावों के मुताबिक, शिवसेना-यूबीटी के नौ लोकसभा सांसदों में से छह से सात सांसद शिंदे गुट के संपर्क में हैं और वे संसद के मानसून सत्र से पहले पाला बदल सकते हैं। इसके अलावा, 16 विधायकों के भी शिंदे गुट के संपर्क में होने का दावा किया गया है।
इस पूरे घटनाक्रम को ऑपरेशन टाइगर इसलिए कहा जाता है क्योंकि बाघ अविभाजित शिवसेना का पारंपरिक प्रतीक रहा है, जिसे पार्टी के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने खुद बनाया था। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, चूंकि एकनाथ शिंदे गुट की ओर से उद्धव ठाकरे गुट के सांसदों को तोड़कर अपने पाले में लाने की इस कथित कोशिश का मकसद बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत (जिसका प्रतीक बाघ है) पर पूरी तरह से नियंत्रण करना और उद्धव गुट की ताकत को खत्म करना है, इसलिए महाराष्ट्र के राजनीतिक हलकों में दल-बदल के इस अभियान को ऑपरेशन टाइगर का नाम दिया गया है।
इस नामकरण पर उद्धव शिवसेना के नेता संजय राउत ने तीखी प्रतिक्रिया भी दी थी। उन्होंने याद दिलाया कि बाघ बालासाहेब ठाकरे का प्रतीक है, इसलिए जो लोग पार्टी में सेंधमारी कर रहे हैं वे भेड़िये हैं। इसके जवाब में उन्होंने अपनी पार्टी की ओर से ऑपरेशन वुल्फ शुरू करने की चेतावनी दी थी।
इस नामकरण पर उद्धव शिवसेना के नेता संजय राउत ने तीखी प्रतिक्रिया भी दी थी। उन्होंने याद दिलाया कि बाघ बालासाहेब ठाकरे का प्रतीक है, इसलिए जो लोग पार्टी में सेंधमारी कर रहे हैं वे भेड़िये हैं। इसके जवाब में उन्होंने अपनी पार्टी की ओर से ऑपरेशन वुल्फ शुरू करने की चेतावनी दी थी।
कबसे सुनी जा रही थी ऑपरेशन टाइगर की आहट?
अप्रैल के महीने में ही यह खबर आने लगी थी कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने उद्धव ठाकरे की शिवसेना के नेताओं में सेंधमारी करने के लिए गुपचुप तरीके से ऑपरेशन टाइगर शुरू कर दिया है। शिंदे गुट के नेता कृपाल तुमाने ने हाल ही में यह दावा किया था कि उद्धव गुट के सांसदों के पाला बदलने को लेकर लगभग एक महीने से चर्चा चल रही थी, जो अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है।हाल के कुछ हफ्तों में इन अफवाहों ने तब बहुत ज्यादा जोर पकड़ लिया, जब दोनों खेमों के नेताओं ने दलबदल की कोशिशों पर सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी शुरू कर दी। बीते शनिवार को यह सुगबुगाहट तब एक बड़े राजनीतिक तूफान में बदल गई जब केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव और कृपाल तुमाने जैसे शिंदे गुट के नेताओं ने खुलकर दावा किया कि छह से सात सांसद उनके संपर्क में हैं और ऑपरेशन टाइगर कभी भी पूरा किया जा सकता है।
किस घटनाक्रम ने ऑपरेशन टाइगर को लेकर बढ़ाई उद्धव की चिंता?
मातोश्री की बैठक और जन्मदिन में सांसदों की गैरमौजूदगीदल-बदल की अफवाहों के बीच उद्धव ठाकरे ने अपने सभी नौ लोकसभा सांसदों की मुंबई स्थित आवास मातोश्री पर एक बैठक बुलाई थी, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसमें केवल चार सांसद ही व्यक्तिगत रूप से पहुंचे। हालांकि, पार्टी ने बताया कि चार अन्य सांसद वर्चुअली और एक फोन के माध्यम से जुड़े, लेकिन उसी हफ्ते के अंत में पार्टी नेता आदित्य ठाकरे का जन्मदिन होने के बावजूद सांसदों की इस अनुपस्थिति ने पार्टी के अंदर शंकाओं को जन्म दिया।
फिर संपर्क से ही बाहर चले गए सांसद
उद्धव ठाकरे खेमे की चिंता तब और ज्यादा बढ़ गई जब पार्टी के कई सांसद के फोन कथित तौर पर नॉट रिचेबल यानी संपर्क से बाहर हो गए। वरिष्ठ नेताओं की तरफ से संपर्क स्थापित करने की तमाम कोशिशों के बावजूद कई सांसदों ने फोन का जवाब देना बंद कर दिया था।
सांसदों के दिल्ली आने की खबरें
पार्टी नेतृत्व उस समय और बेचैन हो गया जब यह खबर आई कि छह शिवसेना-यूबीटी सांसदों ने अलग-अलग रास्तों, जैसे- रोड ट्रिप, कमर्शियल फ्लाइट्स और चार्टर्ड विमानों के जरिए चुपचाप दिल्ली का रुख कर लिया है। इसके अलावा एक और चौंकाने वाली खबर यह भी रही कि मातोश्री की अहम बैठक में पारिवारिक कारणों का हवाला देकर शामिल न होने वाले सांसद संजय देशमुख ने दिल्ली जाकर शिंदे गुट के केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव से मुलाकात की, जिसने पार्टी छोड़ने की इन अफवाहों को और तेज कर दिया। इन सबके बीच यह खबर भी तेजी से फैली कि बागी सांसद दिल्ली में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और एकनाथ शिंदे से मुलाकात करके अपना अलग संसदीय गुट बनाने की मान्यता मांग सकते हैं।
पार्टी नेतृत्व उस समय और बेचैन हो गया जब यह खबर आई कि छह शिवसेना-यूबीटी सांसदों ने अलग-अलग रास्तों, जैसे- रोड ट्रिप, कमर्शियल फ्लाइट्स और चार्टर्ड विमानों के जरिए चुपचाप दिल्ली का रुख कर लिया है। इसके अलावा एक और चौंकाने वाली खबर यह भी रही कि मातोश्री की अहम बैठक में पारिवारिक कारणों का हवाला देकर शामिल न होने वाले सांसद संजय देशमुख ने दिल्ली जाकर शिंदे गुट के केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव से मुलाकात की, जिसने पार्टी छोड़ने की इन अफवाहों को और तेज कर दिया। इन सबके बीच यह खबर भी तेजी से फैली कि बागी सांसद दिल्ली में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और एकनाथ शिंदे से मुलाकात करके अपना अलग संसदीय गुट बनाने की मान्यता मांग सकते हैं।
शिवसेना-यूबीटी का क्या है पक्ष?
ऑपरेशन टाइगर की अटकलों के बीच उद्धव शिवसेना का रुख टूट को लेकर लगातार बदलता रहा है। जहां पहले पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, जैसे संजय राउत और अनिल देसाई ने दल-बदल की इन खबरों को निराधार और अफवाह बताया तो वहीं आज (बुधवार) को उन्होंने कहा कि जिन सांसदों को पाला बदलना है, उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।राउत ने आरोप लगाया है कि महाराष्ट्र में सांसदों की खरीद-फरोख्त की गई और बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की तरह शिवसेना को भी तोड़ने की कोशिश की गई है। भाजपा शिवसेना को तोड़ने का प्रयास कर रही है। संजय राउत ने गंभीर आरोप लगाया है कि पार्टी तोड़ने के लिए उनके सांसदों को 50 करोड़ रुपये का ऑफर दिया जा रहा है, जिसमें से 15 करोड़ रुपये एडवांस के तौर पर दिए जा रहे हैं।
टूट को रोकने के लिए क्या कदम उठा रही शिवसेना-यूबीटी?
इस बीच पार्टी के चीफ व्हिप अनिल देसाई ने सभी लोकसभा सांसदों के लिए एक सख्त व्हिप जारी किया है। इसमें सभी सांसदों को 18 जून को सुबह 11 बजे दिल्ली के संसद भवन (संविधान सदन) में होने वाली एक अहम बैठक में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है। इसका मकसद यह है कि अगर कोई सांसद अलग गुट बनाने की कोशिश करता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सके।वहीं, लोकसभा सांसदों के बाद उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र विधानमंडल के मानसून सत्र के पहले दिन यानी 22 जून को पार्टी के सभी विधायकों और विधान परिषद सदस्यों की एक अहम बैठक बुलाई है ताकि राज्य स्तर पर भी पार्टी की स्थिति मजबूत रखी जा सके।
दूसरी तरफ स्थिति से निपटने के लिए उद्धव गुट के सांसद अरविंद सावंत ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने स्पीकर से आग्रह किया है कि वे दल-बदल करने वाले सांसदों के किसी भी अलग गुट को या किसी अन्य पार्टी में उनके विलय को मान्यता न दें, क्योंकि शिवसेना-यूबीटी कानूनी रूप से एक वैध राजनीतिक दल है। अपने सांसदों को एकजुट रखने और किसी भी राजनीतिक हलचल पर नजर रखने के लिए अरविंद सावंत, अनिल देसाई और संजय राउत जैसे वरिष्ठ नेता दिल्ली में ही कैंप कर रहे हैं।
क्या शिवसेना-यूबीटी से एक और टूट संभव है, क्या कहता है कानून?
मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रमों और अटकलों के मुताबिक, शिवसेना-यूबीटी में एक और टूट की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता है। ऑपरेशन टाइगर के तहत लगातार यह दावा किया जा रहा है कि पार्टी के नौ लोकसभा सांसदों में से छह से सात सांसद एकनाथ शिंदे गुट के संपर्क में हैं और वे पाला बदल सकते हैं। इसके अलावा पार्टी के 20 में से कुल 16 विधायकों के भी पार्टी छोड़ने की अटकलें लगाई गई हैं।
जहां तक कानून की बात है, इस पूरी संभावित बगावत के केंद्र में दल-बदल विरोधी कानून यानी संविधान की दसवीं अनुसूची है। कानून के प्रमुख प्रावधान और उनका मौजूदा गणित के मुताबिक, संसद सदस्यता से अयोग्य ठहराए जाने से बचने के लिए अलग होने वाले गुट को अपनी मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन की जरूरत होती है। शिवसेना-यूबीटी के मामले को देखा जाए तो लोकसभा में उसके कुल 9 सांसद हैं। इस नौ के आंकड़े का दो-तिहाई छह सांसद होता है।
अगर यह छह या उससे ज्यादा सांसद एक साथ पार्टी छोड़ते हैं और लोकसभा स्पीकर के पास जाकर एक अलग गुट बनाने या शिंदे गुट में विलय करने का दावा पेश करते हैं, तो उन पर दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होगा और उनकी सदस्यता बरकरार रहेगी। यही मुख्य कारण है कि राजनीतिक चर्चाओं में बार-बार छह या सात सांसदों के टूटने का आंकड़ा सामने आ रहा है। हालांकि, सिर्फ सांसदों के टूटने से ही वे दल-बदल कानून के दायरे से नहीं बचेंगे, बल्कि पार्टी के पूरे विधायी दल (सांसद और विधायकों) के दो-तिहाई की संख्या में टूटने से ही वे कानूनी तौर पर किसी कार्रवाई से बच सकते हैं। ऐसे में दो-तिहाई विधायकों का भी टूटना अनिवार्य होगा।
अगर यह छह या उससे ज्यादा सांसद एक साथ पार्टी छोड़ते हैं और लोकसभा स्पीकर के पास जाकर एक अलग गुट बनाने या शिंदे गुट में विलय करने का दावा पेश करते हैं, तो उन पर दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होगा और उनकी सदस्यता बरकरार रहेगी। यही मुख्य कारण है कि राजनीतिक चर्चाओं में बार-बार छह या सात सांसदों के टूटने का आंकड़ा सामने आ रहा है। हालांकि, सिर्फ सांसदों के टूटने से ही वे दल-बदल कानून के दायरे से नहीं बचेंगे, बल्कि पार्टी के पूरे विधायी दल (सांसद और विधायकों) के दो-तिहाई की संख्या में टूटने से ही वे कानूनी तौर पर किसी कार्रवाई से बच सकते हैं। ऐसे में दो-तिहाई विधायकों का भी टूटना अनिवार्य होगा।
अब तक पार्टियों में हुई टूट का भाजपा-एनडीए को क्या फायदा?
मौजूदा समय में एनडीए के पास 293 सांसद हैं। इनमें भाजपा के 240 सांसद हैं, जबकि सहयोगी दलों के 53 सांसद भी शामिल हैं।1. टीएमसी में टूट: तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट का दावा है कि उनके पास कुल 28 सांसदों में से 19-20 सांसदों का समर्थन है। ऐसे में अगर यह सांसद एनडीए को समर्थन देते हैं तो इस गठबंधन को कुल 313 सांसदों तक का समर्थन मिल सकता है।
2. शिवसेना में टूट: वहीं, शिवसेना के भी नौ में से छह-सात सांसद टूटने की आशंका जताई जा रही है। इस लिहाज से अगर यह सांसद शिंदे गुट के साथ जाते हैं तो एनडीए का कुल समर्थन 320 तक पहुंच सकता है।
3. द्रमुक-कांग्रेस में फूट: तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के बाद विजय की पार्टी टीवीके को कांग्रेस ने समर्थन दे दिया। इसे लेकर द्रमुक ने नाराजगी जताई है और कांग्रेस पर अपने चुनाव पूर्व बने गठबंधन को तोड़ने का आरोप लगाया। नाराजगी जताते हुए द्रमुक हाल ही में हुई विपक्षी गठबंधन- इंडिया की बैठक में भी नहीं पहुंचा था। अटकलें लग रही हैं कि द्रमुक मुद्दों के आधार पर एनडीए सरकार को समर्थन दे सकती है। द्रमुक से 22 सांसद हैं। ऐसा होता है तो एनडीए का आंकड़ा बढ़कर 342 हो जाएगा।