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जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर विवाद: पूर्व सीजेआई गवई समेत कई रिटायर्ड जजों ने क्यों जताई आपत्ति, क्या है मामला?

Mon, 05 Oct 2026 05:15 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 05 Oct 2026 05:15 PM IST
सार

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी को लेकर पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने आपत्ति जताई है। भुइयां ने कहा था कि लाखों नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी होगी। पूर्व न्यायाधीशों का कहना है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में क्या न्यायिक मर्यादा प्रभावित होती है? आइए, पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं...

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SIR Row: Former CJI B R Gavai and Retired Judges Criticise Justice Ujjal Bhuyan’s Remarks on Disenfranchisemen
जस्टिस उज्जल भुइयां ने एसआईआर पर क्या कहा था? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने रविवार को नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित 19वें जस्टिस बोध राज साहनी स्मृति मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में एसआईआर को लेकर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिससे लाखों भारतीय नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित होते हैं, स्वाभाविक रूप से मनमानी होगी और संवैधानिक व्यवस्था का निषेध होगी। उन्होंने यह भी कहा था कि संविधान नागरिकों को दो वर्गों में नहीं बांटता। एक वर्ग ऐसा नहीं हो सकता जिसके पास मतदान का अधिकार हो और दूसरा ऐसा जिसके पास यह अधिकार न हो।

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बीआर गवई ने जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर क्या कहा?
पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा कि न्यायिक मर्यादा उन्हें ऐसे मामले पर टिप्पणी करने की अनुमति नहीं देगी, जो सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है। उनका कहना था कि शीर्ष अदालत के किसी मौजूदा न्यायाधीश को ऐसे मुद्दे पर सार्वजनिक बयान नहीं देना चाहिए, जिस पर उसी अदालत में सुनवाई हो रही हो। गवई की इस राय से दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसएन ढींगरा और आरएस सोढ़ी ने भी सहमति जताई और जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर सवाल उठाए।
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सेवानिवृत्त जजों ने एसआईआर को लेकर क्या कहा?
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एसएन ढींगरा ने कहा कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी शीर्ष अदालत के मौजूदा न्यायाधीश की सीमाओं से काफी आगे थी। उन्होंने कहा कि जब मामला उसी अदालत में लंबित हो तो सार्वजनिक कार्यक्रम में ऐसी टिप्पणी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जस्टिस भुइयां को ऐसा बयान देने से पहले पूरे मामले के तथ्यों पर विचार करना चाहिए था। वहीं, एसएन ढींगरा ने चुनाव आयुक्तों के बीच एसआईआर को लेकर कथित मतभेदों पर कहा कि अगर कोई असहमति है तो चुनाव आयुक्त खुद अपनी बात रखने में सक्षम हैं।
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जस्टिस आरएस सोढ़ी ने मतदान के अधिकार को लेकर क्या कहा?
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति आरएस सोढ़ी ने एसआईआर को मताधिकार से वंचित करने की प्रक्रिया बताए जाने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि मतदान का अधिकार कानूनी व्यवस्था के तहत तय होता है। अगर कोई व्यक्ति कानून में तय शर्तों के दायरे में आता है तो उसे वोट देने का अधिकार है और अगर वह शर्तों के दायरे में नहीं आता तो उसे वोट का अधिकार नहीं होगा। उन्होंने कहा कि अगर किसी ऐसे व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में है जो कानूनी शर्तें पूरी नहीं करता तो उसे हटाने की प्रक्रिया कानून के अनुसार होनी चाहिए। वहीं, पात्र व्यक्ति का नाम गलत तरीके से हट गया है तो वह फिर से नाम शामिल कराने की कानूनी प्रक्रिया अपना सकता है।


एसआईआर का मामला अभी कहां पहुंचा है?
एसआईआर और उससे जुड़े कई मुद्दे सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। इनमें चुनाव आयोग से जुड़े नए कानून की वैधता का मामला भी शामिल है। इस कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाले चयन पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखा गया है। ऐसे में जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी पर पूर्व सीजेआई और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की आपत्ति का मुख्य आधार यही है कि संबंधित मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लंबित है। जस्टिस भुइयां नालसार के कुलाधिपति भी रह चुके हैं। अपने संबोधन में उन्होंने विश्वविद्यालय के छात्रों की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने देश और दुनिया को दिखाया है कि कानून के छात्र किस तरह के होने चाहिए।

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