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Supreme Court: कोर्ट ने खारिज की छत्तीसगढ़ के कांग्रेस MLA की याचिका; बंद किया प्रदूषित नदियों से जुड़ा मामला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Tue, 24 Feb 2026 06:33 PM IST
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सार
पीठ ने गौर किया कि स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही 2021 में शुरू की गई थी, जब दिल्ली की यमुना नदी में प्रदूषण के बढ़ते स्तर से संबंधित एक मामला उसके समक्ष आया था। निर्देश में कहा गया कि पीठ ने सबसे पहले यमुना के प्रदूषण पर विचार किया था और उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और केंद्र को नोटिस जारी किए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तार वकील को तुरंत रिहा करने के आदेश दिए
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को छत्तीसगढ़ कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपनी छत्तीसगढ़ विधानसभा की चुनाव जीत के खिलाफ दायर याचिका की वैधता पर सवाल उठाया था।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार किया और कहा कि यादव राहत के लिए हाईकोर्ट का रुख कर सकते हैं। पीठ ने कहा कि सभी अधिकार और दलीलें सुरक्षित हैं और याचिकाकर्ता इन्हें हाईकोर्ट में प्रस्तुत कर सकते हैं। इस मामले में यादव की ओर से वरिष्ठ वकील नरिंदर हुड्डा और वकील सुमीर सोढ़ी पेश हुए।
भाजपा नेता प्रेम प्रकाश पांडे की ओर से वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने कहा कि यादव के भिलाई नगर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पिछले एक साल से स्थगित है और कोर्ट इसे छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दे सकती है। पीठ ने कहा कि वह मुकदमे की कोई समयसीमा तय नहीं कर रही है।
प्रदूषित नदियों से जुड़े मामले को सु्प्रीम कोर्ट ने किया बंद
प्रदूषण मुक्त जल के अधिकार को मौलिक अधिकार मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को प्रदूषित नदियों से जुड़ी 2021 की अपनी स्वतः संज्ञान कार्यवाही को समाप्त कर दिया। अदालत ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) की प्रधान पीठ को मामले को फिर से खोलने और निरंतर निगरानी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
शीर्ष अदालत ने शुरुआत में 13 जनवरी, 2021 के उस आदेश पर सवाल उठाया, जिसमें नदियों में दूषित जल के प्रदूषण का स्वतः संज्ञान लेते हुए समानांतर कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया गया था। जबकि नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) पहले से ही इसी तरह के मामले पर विचार कर रहा था।
ये भी पढ़ें: हल्द्वानी अतिक्रमण विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जमीन रेलवे की है, अतिक्रमणकारी शर्तें तय नहीं कर सकते
क्या अदालत के लिए सभी प्रदूषित नदियों का जायजा लेना संभव? :सुप्रीम कोर्ट
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, 'क्या इस अदालत के लिए सभी प्रदूषित नदियों का जायजा लेना संभव है? हम एक-एक करके देख सकते हैं। हम इतने सारे मामलों पर सुनवाई करते हैं और निर्देश जारी करते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि हम मामलों पर एक साथ सुनवाई करें। इस तरह के अनेक मामलों की क्या आवश्यकता है?'
यह टिप्पणी तब की गई जब केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने एनजीटी के समक्ष इसी तरह के एक लंबित मामले का जिक्र किया। विधि अधिकारी ने पीठ से विचार करने का आग्रह किया कि क्या वह सुनवाई जारी रखना चाहती है या क्या एनजीटी से सुनवाई को फिर से शुरू करने के लिए कहा जा सकता है।
एनजीटी के दिए मामले की निगरानी के निर्देश
दोनों पक्षों की बात कुछ समय तक सुनने के बाद पीठ ने एनजीटी को मामले को फिर से खोलने का निर्देश दिया। इस बात पर जोर देते हुए कि नदियों को बचाने के लिए आवश्यक निरंतर निगरानी के लिए एक विशेष निकाय बेहतर रूप से सुसज्जित है।
ये भी पढ़ें: Supreme Court Updates: फिल्म 'यादव जी की लव स्टोरी' पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर
पीठ ने निर्देश में यह भी कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वच्छ वातावरण और स्वच्छ जल के साथ मानवीय गरिमापूर्ण स्वच्छ परिस्थितियों में रहने का अधिकार अनुच्छेद 21 में निहित है। जल प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव इस न्यायालय का ध्यान आकर्षित करता है।
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भाजपा नेता प्रेम प्रकाश पांडे की ओर से वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने कहा कि यादव के भिलाई नगर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पिछले एक साल से स्थगित है और कोर्ट इसे छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दे सकती है। पीठ ने कहा कि वह मुकदमे की कोई समयसीमा तय नहीं कर रही है।
प्रदूषित नदियों से जुड़े मामले को सु्प्रीम कोर्ट ने किया बंद
प्रदूषण मुक्त जल के अधिकार को मौलिक अधिकार मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को प्रदूषित नदियों से जुड़ी 2021 की अपनी स्वतः संज्ञान कार्यवाही को समाप्त कर दिया। अदालत ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) की प्रधान पीठ को मामले को फिर से खोलने और निरंतर निगरानी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
शीर्ष अदालत ने शुरुआत में 13 जनवरी, 2021 के उस आदेश पर सवाल उठाया, जिसमें नदियों में दूषित जल के प्रदूषण का स्वतः संज्ञान लेते हुए समानांतर कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया गया था। जबकि नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) पहले से ही इसी तरह के मामले पर विचार कर रहा था।
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क्या अदालत के लिए सभी प्रदूषित नदियों का जायजा लेना संभव? :सुप्रीम कोर्ट
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यह टिप्पणी तब की गई जब केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने एनजीटी के समक्ष इसी तरह के एक लंबित मामले का जिक्र किया। विधि अधिकारी ने पीठ से विचार करने का आग्रह किया कि क्या वह सुनवाई जारी रखना चाहती है या क्या एनजीटी से सुनवाई को फिर से शुरू करने के लिए कहा जा सकता है।
एनजीटी के दिए मामले की निगरानी के निर्देश
दोनों पक्षों की बात कुछ समय तक सुनने के बाद पीठ ने एनजीटी को मामले को फिर से खोलने का निर्देश दिया। इस बात पर जोर देते हुए कि नदियों को बचाने के लिए आवश्यक निरंतर निगरानी के लिए एक विशेष निकाय बेहतर रूप से सुसज्जित है।
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पीठ ने निर्देश में यह भी कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वच्छ वातावरण और स्वच्छ जल के साथ मानवीय गरिमापूर्ण स्वच्छ परिस्थितियों में रहने का अधिकार अनुच्छेद 21 में निहित है। जल प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव इस न्यायालय का ध्यान आकर्षित करता है।
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