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महाराष्ट्र: उद्धव गुट ने नसरापुर केस के फैसले का किया स्वागत, पूछा- महिला सुरक्षा के लिए क्या कर रही सरकार?

Tue, 30 Jun 2026 01:03 PM IST
Asmita Tripathi आईएएनएस, मुंबई
आईएएनएस, मुंबई Published by: Asmita Tripathi Updated Tue, 30 Jun 2026 01:03 PM IST
सार

उद्धव ठाकरे गुट ने नसरापुर नाबालिग हत्या मामले में दोषी को फांसी की सजा का स्वागत किया। इसके साथ ही कहा कि इससे महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा का मूल संकट खत्म नहीं होगा। 'सामना' के संपादकीय में राज्य सरकार पर कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा और अपराध रोकने में विफल रहने का आरोप लगाया गया।

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Uddhav faction welcomes the verdict in the Nasrapur case asks what the government is doing for women's safety
उद्धव ठाकरे, प्रमुख, शिवसेना यूबीटी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

शिवसेना के उद्धव बालासाहेब ठाकरे ने मंगलवार को विशेष न्यायालय के एक फैसले का स्वागत किया। दरअसल, कोर्ट ने नसरापुर नाबालिग पर हमले और हत्या के भयावह मामले में मुख्य आरोपी को मौत की सजा सुनाई है। इस फैसले ने महाराष्ट्र में कानून-व्यवस्था के बिगड़ने और महिलाओं एवं बच्चों के लिए बढ़ती असुरक्षा के माहौल को लेकर राज्य भर में एक व्यापक बहस छेड़ दी है।

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सामना के संपादकीय में क्या लिखा?
ठाकरे खेमे ने पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में एक संपादकीय में कहा कि यह फैसला पीड़ित के शोक संतप्त माता-पिता को राहत देता है, लेकिन इससे एक बड़ी और व्यापक व्यवस्थागत विफलता उजागर होती है। हालांकि सत्ताधारी प्रशासन इस मामले को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करने की कोशिश करेगा। यह बताते हुए कि कैसे इसे मात्र 58 दिनों में निपटाकर सजा सुनाई गई। लेकिन मूल मुद्दा अनसुलझा ही रहेगा। क्या महिलाओं के खिलाफ अपराध वास्तव में कम होंगे?

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ठाकरे खेमे ने क्या आरोप लगाया?
ठाकरे खेमे ने मौजूदा सरकार पर भ्रष्टाचार, करोड़ों के घोटालों, परीक्षा पत्रों के लीक होने और राजनीतिक सौदेबाजी में व्यस्त रहने का आरोप लगाया है। वहीं, वह नागरिकों की सुरक्षा करने में विफल रही है। संपादकीय में कहा गया है कि प्रमुख शहरों में घटी कई चौंकाने वाली घटनाओं ने इस बढ़ते संकट को उजागर किया है।

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'महिलाओं की चीखें अनसुनी रह जाती हैं'
इसमें कहा गया है कि कभी राज्य की सांस्कृतिक और शैक्षिक राजधानी के रूप में सम्मानित पुणे अब महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों, दहेज हत्याओं, कोयता गिरोह' के आतंक, खुलेआम हत्याओं और व्यापक गुंडागर्दी के लिए कुख्यात हो गया है। खबरों के अनुसार, मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र नागपुर में भी कानून व्यवस्था चरमरा गई है, जहां पीड़ित महिलाओं की चीखें अनसुनी रह जाती हैं।  

महिलाओं की सुरक्षा अनदेखा करने का लगया आरोप
ठाकरे खेमे ने मौजूदा नेतृत्व के राजनीतिक पाखंड की कड़ी आलोचना की है। 'राज्य सरकार, जो महिलाओं के वोट हासिल करने के लिए 'लड़की बहन' जैसी कल्याणकारी योजनाओं का जोर-शोर से प्रचार करती है। वहीं, शारीरिक सुरक्षा के मामले में इन्हीं महिलाओं को पूरी तरह से नजरअंदाज कर रही है। मुंबई की लोकल ट्रेनों में रोज़ाना का सफर भी खतरनाक हो गया है, जहां मामूली कहा-सुनी अक्सर जानलेवा चाकूबाजी में तब्दील हो जाती है।'

नाबालिग बच्चों से जुड़े हिंसा में कितने मामले दर्ज हुए?
संपादकीय में महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार द्वारा 2020 में पारित किए गए कड़े 'महाराष्ट्र शक्ति आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक' का जिक्र किया गया है। हालांकि, यह विधेयक पिछले छह वर्षों से केंद्र सरकार के पास लंबित है। संपादकीय में कहा गया है। 'हाल के वर्षों में महाराष्ट्र में नाबालिग बच्चों से जुड़े हिंसा और हत्या के 23,000 से अधिक मामले आधिकारिक तौर पर दर्ज किए गए हैं। 

सुरक्षा से संबंधित जवाब राज्य सरकार दे
अगर अपंजीकृत मामलों को भी शामिल किया जाए तो यह संख्या कहीं अधिक है, जो यह साबित करता है कि पॉक्सो जैसे कड़े कानूनों का अपराधियों पर निवारक प्रभाव खत्म हो गया है।' संपादकीय में यह भी कहा गया है कि हालांकि न्यायपालिका ने नसरापुर मामले में दो महीने के भीतर ही अपना कर्तव्य तेजी से निभाया है, लेकिन अंतिम जवाबदेही अदालतों की नहीं है। संपादकीय में टिप्पणी की गई, 'राज्य की सुरक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण सवालों का जवाब न्यायपालिका नहीं दे सकती। इनका जवाब राज्य सरकार और मुख्यमंत्री को देना होगा, जिनके पास गृह मंत्रालय का पोर्टफोलियो है।"

ठाकरे खेमे ने पूछे कई सवाल
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने पूछा, 'क्या सत्ताधारी राजनेता, जिन्होंने महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील और सुरक्षित राज्य को बदलापुर से नासरापुर तक फैली इस अंधकारमय गली में धकेल दिया है, इन सवालों के जवाब दे सकते हैं? सच्चा न्याय तभी मिलेगा जब महिलाएं और बच्चे बिना किसी डर के खुलकर सांस ले सकेंगे। तब तक, एक फांसी की सजा एक स्थायी संकट का सिर्फ एक अस्थायी समाधान है, जिससे यह भयावह सवाल अनसुलझा रह जाता है आगे क्या होगा?'

 

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