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Explainer: आज बंगाल में आ सकता है UCC विधेयक; क्या है इसका इतिहास, इसके लागू होने से क्या बदलेगा?

Mon, 29 Jun 2026 09:34 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 29 Jun 2026 09:34 AM IST
सार

संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता के बारे में प्रावधान हैं। दरअसल, संविधान निर्माताओं ने विधान सभा में इसकी प्रासंगिकता पर व्यापक विचार-विमर्श बहस की थी। अनुच्छेद 44 को संविधान सभा ने 23 नवंबर 1948 को बहस के बाद अपनाया था।

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Uniform Civil Code History what was the debate of the Constituent Assembly opposition West Bengal Bill Present
समान नागरिक संहिता। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पश्चिम बंगाल के लिए आज बड़ा दिन है। राज्य की नवनिर्वाचित भाजपा सरकार सोमवार (29 जून) को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को विधानसभा में पेश कर सकती है। बंगाल में इस विधेयक की महज चर्चाओं ने ही सियासी सरगर्मियां छेड़ दीं। कांग्रेस, वाम दल और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कई नेताओं ने इस पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, मुख्यमंत्री शुभेंदु सरकार ने हाल ही में साफ कर दिया था कि बंगाल में यूसीसी विधेयक चरणबद्ध तरीके से लाया और फिर पारित कराने के बाद लागू कराया जाएगा। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह समान नागरिक संहिता क्या है? संविधान इस मुद्दे पर क्या कहता है? इसका इतिहास क्या है? हमारे संविधान निर्माताओं ने समान नागरिक संहिता पर क्या बहस की थी? किसने इसका समर्थन किया था? कानून के विरोध में कौन था? समान नागरिक संहिता लाने का मूल मकसद क्या है? आइये जानते हैं...
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समान नागरिक संहिता क्या है?
समान नागरिक संहिता का अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता लागू होने से सभी धर्मों का एक कानून होगा। शादी, तलाक, गोद लेने और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा। 

 यह मुद्दा कई दशकों से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है। UCC केंद्र की मौजूदा सत्ताधारी भाजपा के लिए जनसंघ के जमाने से प्राथमिकता वाला एजेंडा रहा है।  भाजपा सत्ता में आने पर UCC को लागू करने का वादा करने वाली पहली पार्टी थी और यह मुद्दा उसके 2019 के लोकसभा चुनाव घोषणापत्र का भी हिस्सा था। इसके साथ ही उसके शासन वाले राज्यों में इसे जोर-शोर से लागू भी कराया जा रहा है। इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल में यूसीसी लागू कराना पार्टी का अगला लक्ष्य है। 

संविधान इस पर क्या कहता है?
देश में संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता को लेकर प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि राज्य इसे लागू कर सकता है। इसका उद्देश्य धर्म के आधार पर किसी भी वर्ग विशेष के साथ होने वाले भेदभाव या पक्षपात को खत्म करना और देशभर में विविध सांस्कृतिक समूहों के बीच सामंजस्य स्थापित करना था। संविधान निर्माता डॉ. बीआर आम्बेडकर ने कहा था कि UCC जरूरी है लेकिन फिलहाल यह स्वैच्छिक रहना चाहिए।

संविधान के मसौदे के अनुच्छेद 35 को भारत के संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 44 के रूप में राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों के हिस्से के रूप में जोड़ा गया था। इसे संविधान में इस नजरिए के रूप में शामिल किया गया था जो तब पूरा होगा जब राष्ट्र इसे स्वीकार करने के लिए तैयार होगा और UCC को सामाजिक स्वीकृति दी जा सकती है।
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इसका इतिहास क्या है?
UCC की उत्पत्ति औपनिवेशिक भारत में हुई जब ब्रिटिश सरकार ने 1835 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में अपराधों, सबूतों और अनुबंधों से संबंधित भारतीय कानूनों की एकरूपता की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। विशेष रूप से इसमें यह सिफारिश की गई थी कि हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) को  इस तरह के संहिताकरण के बाहर रखा जाए। 

ब्रिटिश सरकार को 1941 में हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिए बी एन राव समिति बनाई।  समिति ने शास्त्रों के अनुसार, एक संहिताबद्ध हिंदू कानून की सिफारिश की, जो महिलाओं को समान अधिकार देगा। इसके साथ ही समिति ने हिंदुओं के लिए विवाह और उत्तराधिकार के मुद्दों में भी नागरिक संहिता की सिफारिश की।

समान नागरिक संहिता क्या करेगी?
UCC लागू होने पर हिंदू कोड बिल, शरीयत कानून, विशेष विवाह अधिनियम जैसे कानूनों की जगह लेगा। समान नागरिक कानून तब सभी नागरिकों पर लागू होगा चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। इसके समर्थकों का तर्क है कि यह लैंगिक समानता की बढ़ावा देने, धर्म के आधार पर भेदभाव की कम करने और कानूनी प्रणाली की सरल बनाने में मदद करेगा। वहीं, दूसरी ओर विरोधियों का कहना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करेगा और व्यक्तिगत कानूनों को प्रत्येक धार्मिक समुदाय के विवेक पर छोड़ देना चाहिए।

देश में समान नागरिक संहिता की स्थिति क्या है?
चूंकि हमारे संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता को लेकर प्रावधान हैं। इसमें कहा गया है कि राज्य इसे लागू कर सकता है। इसका उद्देश्य धर्म के आधार पर किसी भी वर्ग विशेष के साथ होने वाले भेदभाव या पक्षपात को खत्म करना है। इस अनुच्छेद को संविधान सभा ने 23 नवंबर 1948 को एक जोरदार बहस के बाद अपनाया था। 

समान नागरिक संहिता पर क्या बहस हुई थी?
देश में संविधान बनाने के लिए संविधान सभा गठित की गई थी। संविधान सभा की पहली बैठक दिसंबर 1946 में हुई। संविधान बनाने के दौरान निर्माताओं ने समान नागरिक संहिता की अवधारणा, प्रासंगिकता और उपयोगिता पर व्यापक विचार-विमर्श किया था। जहां संविधान सभा में मुस्लिम प्रतिनिधियों ने समान नागरिक संहिता का विरोध किया तो कई सदस्यों ने इसके पक्ष में तर्क दिया।

बहस के दौरान संविधान सभा में पर्सनल लॉ को लेकर व्यापक चर्चा हुई थी। दिलचस्प है कि मौजूदा समय में समान नागरिक संहिता अनुच्छेद 44 के तहत आती है लेकिन संविधान सभा ने अनुच्छेद 35 के तहत इस पर चर्चा की थी।

कानून के विरोध में कौन था? 
मद्रास से आने वाले सदस्य मोहम्मद इस्माइल ने अनुच्छेद 35 में एक संशोधन का प्रस्ताव रखा। इसमें कहा गया कि किसी भी समूह, वर्ग या लोगों के समुदाय को अपने व्यक्तिगत कानून को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, यदि उसके पास कोई व्यक्तिगत कानून है। उन्होंने तर्क दिया कि किसी के व्यक्तिगत कानूनों का पालन करना एक मौलिक अधिकार है और ये कानून लोगों की जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा हैं।

इस्माइल का मानना था कि व्यक्तिगत कानूनों में कोई भी हस्तक्षेप उन लोगों की जीवनशैली में हस्तक्षेप करने के जैसे होगा जो पीढ़ियों से इन कानूनों का पालन करते आ रहे हैं। उन्होंने तर्क रखा कि चूंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है, इसलिए उसे ऐसे कार्यों से बचना चाहिए जो उसके लोगों के धार्मिक और सांस्कृतिक लोकाचार को बाधित कर सकते हैं। अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने यूगोस्लाविया, सर्बिया, क्रोएशिया और स्लोवेनिया के उदाहरणों का हवाला दिया। इसके अलावा उन्होंने अल्पसंख्यकों से जुड़े अन्य यूरोपीय संविधानों का भी उल्लेख किया।



संविधान सभा के सदस्य एमए अयंगर ने इस मुद्दे पर हस्तक्षेप किया। अयंगर ने तर्क दिया कि धर्मनिरपेक्षता की भारतीय अवधारणा सभी धर्मों को समान सम्मान और गरिमा के साथ समायोजित करती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में विभिन्न समुदायों को अपने धर्म और संस्कृति का पालन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। अयंगर के अनुसार, लोगों को अपने व्यक्तिगत कानून का पालन करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

संविधान सभा के महबूब अली बेग ने बहस में हिस्सा लिया। बेग का तर्क था कि अनुच्छेद 35 में उल्लिखित नागरिक संहिता में पारिवारिक कानून और विरासत शामिल नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि यह स्पष्ट करने के लिए एक प्रावधान जोड़ा जाए कि नागरिक संहिता संपत्ति हस्तांतरण और अनुबंध जैसे मामलों को विनियमित करेगी न कि व्यक्तिगत कानूनों को।

इसके अलावा कई अन्य सदस्यों ने धार्मिक कानूनों में हस्तक्षेप करने के संविधान सभा के अधिकार पर सवाल उठाया। उनका मानना था कि अनुच्छेद 35 धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है।

कानून के पक्ष में कौन था? 
जहां संविधान सभा के कई सदस्यों ने समान नागरिक संहिता को धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया तो कई लोगों ने इससे इतर राय भी रखी थी। कांग्रेस सदस्य और संविधान सभा मसौदा समिति के सदस्य केएम मुंशी ने प्रस्तावित कानून के पक्ष में थे। केएम मुंशी ने कहा कि अनुच्छेद 35 के बिना भी संसद के लिए समान नागरिक संहिता बनाना कानूनी होगा। उन्होंने कहा था कि यह अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देने वाला है। अनुच्छेद 35 राज्य को धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को विनियमित करने का भी अधिकार देता है।

केएम मुंशी ने कहा कि तुर्की और मिस्र जैसे कुछ मुस्लिम देशों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के व्यक्तिगत कानूनों की रक्षा नहीं की। यूरोपीय देशों में समान कानून थे जो अल्पसंख्यकों पर भी लागू होते थे। पर्सनल लॉ से धर्म को अलग कर देना चाहिए। 

संविधान सभा के सदस्य अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने केएम मुंशी का समर्थन किया। इसके साथ ही अय्यर ने संविधान सभा से समान नागरिक संहिता से जुड़े अनुच्छेद को मंजूरी देने का आग्रह किया।

संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ. बीआर अंबेडकर ने अनुच्छेद 35 के तहत होने वाले संशोधनों को खारिज कर दिया। अंबेडकर ने विभिन्न समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में हस्तक्षेप करने के राज्य के अधिकार का बचाव किया। उन्होंने संविधान सभा के हिंदू सदस्यों के तर्कों का बचाव किया। इसके साथ ही अंबेडकर ने मुस्लिम सदस्यों को आश्वासन दिया कि यह प्रस्ताव एक 'शक्ति' पैदा कर रहा है न कि 'दायित्व'। 

अंबेडकर ने तर्क दिया कि विवाह और उत्तराधिकार से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों के कुछ मसलों को छोड़कर मानवीय संबंधों के लगभग हर पहलू के लिए समान कानून लागू थे। उन्होंने यह भी कहा कि इस बात पर बहस करने में बहुत देर हो चुकी है कि संहिता को लागू किया जाना चाहिए या नहीं, क्योंकि काफी हद तक इसे पहले ही लागू किया जा चुका है।

इसके अलावा अंबेडकर ने पुष्टि की कि भले ही समान नागरिक संहिता लागू हो, यह केवल उन लोगों पर लागू होगी जो इसके के लिए सहमत हैं। 
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