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UP: जनजातियों के 500 से अधिक आभूषण-बर्तनों का संरक्षण, नई पीढ़ी को मिल रहा सांस्कृतिक धरोहर को जानने का अवसर

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: संध्या Updated Tue, 03 Feb 2026 05:04 PM IST
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सार

 जनजातीय संस्कृति से नई पीढ़ी को परिचित कराने के लिए प्रदेश की जनजातियों के 500 से अधिक पारंपरिक आभूषणों व बर्तनों का संरक्षण किया जा रहा है। ये पहल उत्तर प्रदेश जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान की ओर से की गई है।

unique initiative by Tribal and Folk Art Culture Institute preserving artifacts  tribal communities
जनजाति धरोहर - फोटो : up tribal department
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान जनजातियों के पारंपरिक आभूषणों व दुर्लभ बर्तनों के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार का प्रयास कर रहा है। संस्थान प्रदेश की विभिन्न जनजातियों के पारंपरिक तरीके से बनाए गए 500 से अधिक आभूषणों व बर्तनों का न केवल संरक्षण किया जा रहा है, बल्कि इनकी प्रदर्शनी के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक धरोहर को जानने का अवसर भी प्रदान कर रहा है।

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उत्तर प्रदेश की थारू, बुक्सा, गोंड और बैगा जनजातियों के आभूषण न केवल सौंदर्य के प्रतीक हैं, बल्कि जनजातीय समाज की गहरी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं को भी जीवंत बनाते हैं। संस्थान के निदेशक अतुल द्विवेदी ने बताया कि ये आभूषण पूरी तरह से हस्तनिर्मित होते हैं, जिन्हें जनजातियों के शिल्पकार अपने सदियों पुराने ज्ञान और हस्तकौशल से तैयार करते हैं। जो इन जनजातियों की सांस्कृतिक परंपराओं के साथ उनके कला कौशल की भी पहचान हैं।

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ये आभूषण गिलेट या गोटा चांदी, पुराने भारतीय सिक्कों, मनकों, तांबा, पीतल, लकड़ी, हड्डी व सीप जैसी सामग्रियों से बनाए जाते हैं। इनका निर्माण पारंपरिक तरीके से होता है, जिसमें धातु को भट्टी में गर्म कर तार और चादरों में बदला जाता है, फिर हाथों से अंतिम आकार दिया जाता है। इनमें हंसली, पायल, करधनी, कड़े, झुमकी, हार, अंगूठियां, बाजूबंद और मंगलसूत्र जैसे आभूषण जनजातीय जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।  

यूपी की थारू, बुक्सा, अगरिया, खरवार जनजातियों के बर्तनों का हो रहा है संरक्षण

संस्थान जनजातियों के विलुप्त होते पीतल, तांबे और मिट्टी के पारंपरिक बर्तनों के संरक्षण में भी सक्रिय है। संस्थान के निदेशक ने बताया कि थारू, बुक्सा, अगरिया, खरवार और सोनभद्र क्षेत्र की जनजातियों के धातु के बर्तन, मृदभांड, धातु पात्र और जंगली लौकी से बनी ‘तुंबी’ आज भी जनजातीय समाज की जीवनशैली का सजीव उदाहरण है। हमारा संस्थान इनका संरक्षण करने के साथ समय-समय पर इनकी प्रदर्शनी भी लगाता है। 

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