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बुद्ध पूर्णिमा: 'भारत ने विश्व को दिए अनेक उपहार, उनमें बौद्ध धर्म सर्वोपरि'

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 01 May 2026 08:05 AM IST
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सार

मणिमेकलई और कुंडलकेसी जैसे तमिल साहित्यिक ग्रंथों में बौद्ध दर्शन का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। हालांकि, अनेक प्राचीन ग्रंथ समय के साथ लुप्त हो गए, फिर भी उनका योगदान अमूल्य बना हुआ है।

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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

चित्रा पूर्णिमा के शुभ अवसर पर, जब मंदिरों में उत्सव मनाए जा रहे हैं, मैं प्रार्थना करता हूं कि प्रत्येक घर में सुख-समृद्धि बढ़े। भारत ने विश्व को जो अनेक उपहार दिए हैं, उनमें बौद्ध धर्म सर्वोपरि है। भगवान बुद्ध का जीवन और उनके उपदेश, आज भी दुनिया भर के लाखों लोगों के जीवन को प्रकाशमान कर रहे हैं।  भारत ने विश्व को आत्म-साक्षात्कार का महत्व सिखाया। बुद्ध शब्द का अर्थ ही है जाग्रत व्यक्ति। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मानवता को आत्मज्ञान की राह दिखाने वाली इस महान आत्मा का जन्म और ज्ञान प्राप्ति, दोनों एक ही दिन हुए।
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राजकुमार सिद्धार्थ का पालन-पोषण विलासिता में हुआ। 29 वर्ष की आयु में, उन्होंने अपना महल, पत्नी, पुत्र और समस्त सांसारिक धन-संपत्ति त्यागकर आध्यात्मिक सत्य की खोज में विचरण किया। छह वर्षों के गहन शोध के बाद, उन्होंने बोधगया के बोधि वृक्ष के नीचे परम ज्ञान प्राप्त किया और बुद्ध बन गए। चार आर्य सत्यों और नैतिक आचरण के मार्ग की प्राप्ति ने एक नए दर्शन का आरंभ किया, जिसने विश्व इतिहास में भारत के गौरव को नई ऊंचाई दी। वाराणसी के पास सारनाथ में उन्होंने पांच तपस्वियों को अपना प्रथम उपदेश दिया। धर्मचक्र प्रवर्तन के नाम से प्रसिद्ध यह उपदेश बौद्ध धर्म की नींव बना और बौद्ध परंपरा की औपचारिक शुरुआत का यह प्रतीक था। समय के साथ, अनेक लोग उनके उपदेशों से प्रभावित हुए। मगध के राजा बिम्बिसार ने राजगीर में वेणुवन (बांस उपवन) विहार दान किया।
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धनी अनाथपिंडिका ने पूरे जेतवन उपवन को स्वर्ण मुद्राओं से ढककर एक विहार(मठ) का निर्माण करवाया। ऐसे कार्य भारत में विद्यमान धर्मपरायणता में गहरी आस्था को दर्शाते हैं। विहारों के माध्यम से चार आर्य सत्यों का प्रसार होता है: इच्छा दुख का मूल कारण है; इच्छा का त्याग करने से दुख पर विजय पाई जा सकती है, और अष्टांगिक मार्ग का पालन कर दुख से मुक्त जीवन जिया जा सकता है। बुद्ध ने सलाह दी: अतीत पर ध्यान न दें, वर्तमान में जिएं। सत्यनिष्ठा में महान शक्ति होती है। मन सभी कर्मों का मूल है, इसलिए सकारात्मक सोच विकसित करें। कठिन समय में भय से पीछे न हटें। जीवन की यात्रा अंततः व्यक्तिगत होती है, इसलिए इसे आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाओ। शब्दों में घाव देने की शक्ति होती है, इसलिए मधुर वाणी बोलो। प्रेम और अहिंसा आवश्यक हैं।  निरंतर सीखते रहो, कभी रुकें नहीं।

तमिल ग्रंथों में मिलता है बौद्ध दर्शन का सुंदर वर्णन
मणिमेकलई और कुंडलकेसी जैसे तमिल साहित्यिक ग्रंथों में बौद्ध दर्शन का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। हालांकि, अनेक प्राचीन ग्रंथ समय के साथ लुप्त हो गए, फिर भी उनका योगदान अमूल्य बना हुआ है।

मदिरा जो मन को भ्रमित करती है, और जीव हिंसा, बुद्धिमान, मोह से मुक्त होकर, इनका त्याग करते हैं, सुनो, जन्म और मृत्यु, तथा मृत्यु के बाद पुनर्जन्म, नींद और जागरण के समान हैं-यही सत्य है। जो धर्मपूर्ण कर्म करते हैं, वे श्रेष्ठ लोक को प्राप्त होते हैं, और जो अधर्म करते हैं, वे गहन दुःख में गिरते हैं।

इस सत्य को समझकर विवेकी जन अपने सभी बंधनों को तोड़ देते हैं। इस प्रकार महाकाव्य मणिमेकलै (आथिरै पिच्चैयिट्टा काथै: 84–90) बौद्ध धर्म के सार को स्पष्ट करता है।

पांच नैतिक सिद्धांतों पर बल दिया
भगवान बुद्ध ने पांच नैतिक सिद्धांतों पर विशेष बल दिया-अहिंसा, चोरी न करना, व्यभिचार से दूर रहना, सत्य बोलना और नशीले पदार्थों से परहेज़ करना। धर्म से आगे बढ़कर उन्होंने सिखाया कि मन ही हर चीज़ की जड़ है। सकारात्मक विचार और श्रेष्ठ कर्म ही व्यक्ति तथा समाज में संतुलन और शांति लाते हैं।  

मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम के शब्द याद आते हैं-भगवान गौतम बुद्ध के जीवन का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने हमें सिखाया कि शांति की शुरुआत हमारे भीतर से होती है, उन्होंने यह एहसास कराया कि स्वयं पर विजय पाना ही सबसे बड़ी जीत है। आज जब दुनिया तनाव और संघर्ष के दौर से गुजर रही है, तब बुद्ध के उपदेश और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।

सम्राट अशोक जैसे युद्धप्रिय शासक को करुणा का समर्थक बना दिया
बुद्ध के उपदेशों की परिवर्तनकारी शक्ति इस बात से स्पष्ट होती है कि उन्होंने सम्राट अशोक जैसे युद्धप्रिय शासक को भी शांति और करुणा का समर्थक बना दिया। सम्राट अशोक ने शिलालेखों और स्तूपों के माध्यम से पूरे देश में बौद्ध सिद्धांतों का प्रचार किया। सांची और सारनाथ के स्तूप आज भी दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करते हैं। सारनाथ का सिंह स्तंभ आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।

भारत ने हर मत को स्वीकार किया
हजारों वर्षों से इस भूमि पर अनेक आध्यात्मिक विचारधाराएं और दर्शन विकसित होते रहे हैं। चाहे बौद्ध धर्म हो या जैन धर्म, भारत ने हर मत और पंथ को एकात्म भावना से स्वीकार किया है। यह दर्शाता है कि सांस्कृतिक चेतना और साझा भावनाओं के स्तर पर यह राष्ट्र सदैव एक रहा है। बौद्ध धर्म ने आजीवन शिक्षा पर विशेष बल दिया और विशाल स्तर पर शिक्षण संस्थानों तथा पुस्तकालयों की स्थापना की। पांचवीं शताब्दी में ही नालंदा विश्वविद्यालय एक महान ज्ञान केंद्र के रूप में विकसित हुआ, जहां लगभग 10,000 विद्यार्थी और 1,500 आचार्य शिक्षा एवं अध्यापन में संलग्न थे।

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