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बिना मुकदमे एक साल तक हिरासत: आखिर चर्चा में क्यों है पश्चिम बंगाल का पब्लिक सेफ्टी बिल? पुलिस की बढ़ेगी ताकत
Mon, 13 Jul 2026 10:00 AM IST
प्रशांत तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Mon, 13 Jul 2026 10:00 AM IST
सार
पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026 पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा लाया गया नया कानून है। इसका मकसद संगठित अपराध, गुंडागर्दी और समाज विरोधी गतिविधियों पर सख्ती से लगाम लगाना है। यह विधेयक जून 2026 में विधानसभा से पारित हुआ है।
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सीएम शुभेंदु अधिकारी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
पश्चिम बंगाल सरकार का पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026 संगठित अपराध और समाज विरोधी गतिविधियों पर लगाम लगाने के उद्देश्य से लाया गया है। इसे आज से प्रदेश में लागू किया जा रहा है। इसमें बिना मुकदमे के 12 महीने तक निवारक हिरासत, किसी व्यक्ति को क्षेत्र से बाहर करने और पुलिस को विशेष अधिकार देने जैसे प्रावधान हैं। सरकार इसे कानून व्यवस्था मजबूत करने वाला कदम बता रही है, जबकि विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञ इसके दुरुपयोग की आशंका जता रहे हैं।
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यह बिल लाने की जरूरत क्यों पड़ी?
सरकार के मुताबिक इस कानून को लाने का उद्देश्य संगठित अपराध और गुंडागर्दी पर रोक लगाना, सार्वजनिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखना, लोगों में भय और असुरक्षा फैलाने वाली गतिविधियों पर नियंत्रण करना तथा सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।
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किन गतिविधियों को समाज विरोधी माना जाएगा?
बिल के अनुसार यदि कोई व्यक्ति या समूह ऐसी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, जिससे लोगों में डर, दहशत या असुरक्षा फैले, सार्वजनिक शांति और कानून व्यवस्था बिगड़े, लोगों के जान माल को खतरा हो, किसी व्यक्ति को उसकी चल या अचल संपत्ति से अवैध रूप से बेदखल किया जाए, व्यापार, रोजगार या किसी वैध काम में बाधा पहुंचे, सरकारी या निजी संपत्ति को भारी नुकसान हो या अवैध खनन, रेत खनन, वन संपदा तथा वन्यजीवों से जुड़े अपराधों के कारण सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचे, तो उसे समाज विरोधी गतिविधि की श्रेणी में माना जा सकता है।
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इस बिल में 'गुंडा' किसे माना गया है?
बिल में "गुंडा" की परिभाषा काफी व्यापक रखी गई है। इसके दायरे में आदतन अपराधी, संगठित अपराध गिरोह के सदस्य, जबरन वसूली करने वाले, जमीन पर अवैध कब्जा करने वाले, अवैध खनन में शामिल लोग तथा हथियार, मादक पदार्थ और विस्फोटक कानूनों से जुड़े गंभीर अपराधों में शामिल आरोपियों को रखा जा सकता है।
इस कानून में प्रशासन को कौन कौन सी बड़ी शक्तियां मिली हैं?
1. क्या बिना मुकदमे के एक साल तक हिरासत में रखा जा सकेगा?
यदि जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस आयुक्त या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को आशंका हो कि कोई व्यक्ति समाज विरोधी गतिविधियों में शामिल हो सकता है, तो उसे बिना मुकदमा चलाए अधिकतम 12 महीने तक निवारक हिरासत में रखा जा सकता है।
2. क्या किसी व्यक्ति को जिले या क्षेत्र से बाहर किया जा सकेगा?
इस कानून के तहत प्रशासन किसी व्यक्ति को किसी विशेष क्षेत्र, जिले या एक से अधिक जिलों से बाहर जाने का आदेश दे सकता है। साथ ही उसे एक वर्ष तक उस क्षेत्र में वापस लौटने से भी रोका जा सकता है।
3. पुलिस को कौन से विशेष अधिकार दिए गए हैं?
इस बिल के तहत पुलिस को तलाशी लेने, गिरफ्तारी करने, आपराधिक गतिविधियों से जुड़ी संपत्ति जब्त करने और कई मामलों को संज्ञेय तथा गैर जमानती श्रेणी में रखने जैसे विशेष अधिकार दिए गए हैं।
सरकार इस कानून के पक्ष में क्या तर्क दे रही है?
राज्य सरकार का कहना है कि इस कानून से संगठित अपराध और माफिया के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई संभव होगी। कानून व्यवस्था बेहतर होगी, आम नागरिकों की सुरक्षा मजबूत होगी और जमीन माफिया, अवैध खनन तथा रंगदारी जैसे अपराधों पर अंकुश लगेगा।
विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों की क्या आपत्तियां हैं?
विपक्ष और कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि "समाज विरोधी गतिविधि" की परिभाषा काफी व्यापक है। उनका तर्क है कि बिना मुकदमे के एक वर्ष तक हिरासत में रखने का प्रावधान नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा प्रशासन को मिले व्यापक अधिकारों के राजनीतिक या व्यक्तिगत दुरुपयोग की आशंका भी जताई जा रही है। आलोचकों का कहना है कि यह कानून संविधान में दिए गए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों से जुड़े कई सवाल खड़े करता है।
क्या भारत में यह पहला ऐसा कानून है?
नहीं। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में संगठित अपराध और समाज विरोधी गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए पहले से विशेष कानून लागू हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश गिरोहबंद और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1986 पहले से प्रभावी है।
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आखिर इस बिल का मतलब क्या है?
कुल मिलाकर यह कानून पश्चिम बंगाल सरकार का ऐसा प्रयास है, जिसका उद्देश्य संगठित अपराध, गुंडागर्दी और समाज विरोधी गतिविधियों पर सख्ती करना है। इसमें निवारक हिरासत, किसी व्यक्ति को क्षेत्र से बाहर करने और पुलिस को अतिरिक्त अधिकार देने जैसे प्रावधान शामिल हैं। सरकार इसे कानून व्यवस्था मजबूत करने वाला कदम बता रही है, जबकि आलोचकों का मानना है कि इसकी व्यापक शक्तियों का दुरुपयोग भी हो सकता है।