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What Is PSLV-C62 EOS-N1 Anvesha: अंतरिक्ष में ISRO की छलांग बेहद खास, एक साथ 15 उपग्रह प्रक्षेपित; जानिए सबकुछ

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रिया दुबे Updated Mon, 12 Jan 2026 10:27 AM IST
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सार

इसरो ने आज श्रीहरिकोटा से PSLV-C62 मिशन लॉन्च किया है, जो 2026 की पहली बड़ी अंतरिक्ष उड़ान है। इस मिशन के तहत 15 सैटेलाइट्स को सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट में स्थापित किया जाएगा। इसमें DRDO का सैटेलाइट EOS-N1, भारत का पहला ऑन-ऑर्बिट फ्यूलिंग डेमो सैटेलाइट AayulSAT और पहली ऑर्बिटल AI-इमेज लैब MOI-1 शामिल है। आइए विस्तार से जानते हैं। 

What is the PSLV-C62 mission? Learn what's special about ISRO's first major space flight in 2026
इसरो का पीएसएलवी-सी62 - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र पर देश की नजरें टिकी हुई हैं। इसरो ने इस साल के पहले बड़े ऑर्बिटल मिशन पीएसएलवी-सी62 को आज लॉन्च किया। यह मिशन सुबह 10:17 बजे प्रथम लॉन्च पैड से रवाना हुआ। हालांकि प्रक्षेपण के तीसरे चरण में तकनीकी खराबी आ गई। इसरो के अनुसार रॉकेट तय रास्ते से भटक गया।

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15 उपग्रहों में 7 भारतीय और 8 विदेशी

यह सिर्फ एक नियमित प्रक्षेपण नहीं है। 15 उपग्रहों को सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट में स्थापित करने वाला यह मिशन वैश्विक स्मॉल-सैटेलाइट लॉन्च बाजार में भारत की बढ़ती पकड़ को दिखाता है। लॉन्च किए गए कुल 15 सैटेलाइट्स में 7 भारत के हैं, जबकि 8 विदेशी सैटेलाइट्स भी इस मिशन का हिस्सा हैं। विदेशी पेलोड में फ्रांस, नेपाल, ब्राजील और यूनाइटेड किंगडम के सैटेलाइट शामिल हैं।


मुख्य पेलोड: EOS-N1 'अन्वेषा' की जानें खासियत

मिशन का प्रमुख उपग्रह EOS-N1, जिसे 'अन्वेषा' नाम दिया गया है। यह  रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित एक उन्नत अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है।

इसमें हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग तकनीक है, जो हर पिक्सल में सैकड़ों लाइट बैंड रिकॉर्ड करती है। इससे फसल स्वास्थ्य, मिट्टी की नमी, खनिज संसाधन, शहरी विस्तार और पर्यावरणीय बदलावों की बेहद सूक्ष्म जानकारी मिल सकेगी।

डिफेंस सेक्टर के लिए क्यों अहम है यह तकनीक?

सैटेलाइट आधारित HRS (हाइपरस्पेक्ट्रल रिमोट सेंसिंग) तकनीक को डिफेंस के लिए एक तरह का सीक्रेट वेपन माना जा रहा है। इसके इस्तेमाल से सेना को कई रणनीतिक फायदे मिलते हैं।

  • जंगल, माइनिंग और पर्यावरण निगरानी: सैटेलाइट से जंगलों, खनन क्षेत्रों और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर सटीक नजर रखी जा सकती है।
  • सेना की मूवमेंट प्लानिंग: HRS के जरिए किसी इलाके की मिट्टी का प्रकार पहचाना जा सकता है। इससे यह पहले ही पता चल जाता है कि टैंक या भारी सैन्य वाहन उस क्षेत्र से गुजर सकते हैं या नहीं।
  • दुश्मन की छिपी गतिविधियों का खुलासा: घने जंगलों, झाड़ियों के पीछे छिपे जवान या नदी के पानी के नीचे छुपाए गए हथियारों की पहचान संभव होती है।
  • जंग के लिए 3D सिमुलेशन: HRS डेटा और इमेज के आधार पर युद्ध की स्थिति का सिमुलेशन तैयार किया जा सकता है, जिससे सही रूट, दुश्मन का फॉर्मेशन और रणनीति समझने में मदद मिलती है।
  • सीमाओं पर निगरानी: बॉर्डर इलाकों में दुश्मन की हर मूवमेंट पर रियल-टाइम नजर रखना आसान हो जाता है।

ऑर्बिट में ईंधन भरने की दिशा में कदम

इस मिशन की बड़ी खासियत है आयुलसैट, जिसे बंगलूरू की स्टार्टअप ऑर्बिटएड एयरोस्पेस ने विकसित किया है। यह भारत के पहले ऑन-ऑर्बिट ईंधन भरने वाले मॉडल का टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर है। इसका लक्ष्य माइक्रोग्रैविटी में डॉकिंग और ईंधन ट्रांसफर सिस्टम का परीक्षण करना है, जिससे भविष्य में उपग्रहों की उम्र बढ़ाई जा सके और स्पेस डेब्रिस की समस्या कम हो।

अंतरिक्ष में AI लैब और 'स्पेस साइबरकैफे'

PSLV-C62 के साथ MOI-1 उपग्रह भी भेजा जा रहा है। यह हैदराबाद की स्टार्टअप्स टेकमी2स्पेस और ईऑन स्पेस लैब्स का संयुक्त प्रयास है। MOI-1 भारत की पहली ऑर्बिटल एआई-इमेज लैब है, जो सैटेलाइट पर ही डेटा प्रोसेसिंग करती है। इससे रियल-टाइम एनालिसिस संभव होगा। खास बात यह है कि उपयोगकर्ता सिर्फ $2 (करीब ₹180) प्रति मिनट में प्रोसेसर का समय किराए पर ले सकेंगे। इसे 'दुनिया का पहला स्पेस साइबरकैफे' कहा जा रहा है।

दुनिया की सबसे हल्की स्पेस टेलीस्कोप

MOI-1 के भीतर मौजूद है MIRA, दुनिया की सबसे हल्की स्पेस टेलीस्कोप। सिर्फ 502 ग्राम की यह टेलीस्कोप एक ही ठोस फ्यूज्ड सिलिका ब्लॉक से बनी है। इसकी सिंगल-पीस संरचना इसे लॉन्च के दौरान होने वाले तीव्र कंपन से सुरक्षित रखती है और फोकस को स्थिर बनाए रखती है।

वैश्विक राइडशेयर: नेपाल से ब्राजील तक

  • इसरो की कमर्शियल शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड ने इस मिशन को अंतरराष्ट्रीय 'सैटेलाइट टैक्सी' का रूप दिया है।
  • नेपाल का मुनल उपग्रह देश की टोपोग्राफी मैप करेगा।
  • स्पेन का केस्ट्रेल इनिशियल डेमोंस्ट्रेटर (केआईडी) री-एंट्री तकनीक का परीक्षण करेगा।
  • इंडो-मॉरीशस संयुक्त उपग्रह।
  • ब्राजील का एल्डिबारन-1 समुद्री रेस्क्यू के लिए उपग्रह।
  • 'ऑर्बिटल टेम्पल' जिसमें 14,000 नाम अंतरिक्ष में संरक्षित किए जाएंगे। 
  • देश के भीतर, ध्रुवा स्पेस  के LACHIT और Thybolt-3 जैसे उपग्रह स्वदेशी संचार प्रणालियों का परीक्षण करेंगे।

अब तक कितने देशों ने एचवाईएसआईएस सैटेलाइट लॉन्च किए?

अब तक छह से ज्यादा देश हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट (HySIS) लॉन्च कर चुके हैं। भारत के अलावा अमेरिका, चीन, जर्मनी, जापान, इटली और पाकिस्तान इस तकनीक वाले सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेज चुके हैं। भारत ने अपनी पहली हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट 29 नवंबर 2018 को लॉन्च की थी।

HySIS नाम के उस सैटेलाइट का वजन करीब 380 किलोग्राम था और यह 55 स्पेक्ट्रल बैंड्स में रोशनी को डिटेक्ट करने में सक्षम था। नया सैटेलाइट अन्वेषा, HySIS का अपग्रेडेड संस्करण है, जिसकी हाइपरस्पेक्ट्रल क्षमता पहले से कहीं अधिक उन्नत है।

पीएसएलवी की 64वीं उड़ान

यह मिशन इसरो के भरोसेमंद लॉन्च व्हीकल PSLV की 64वीं उड़ान है। अब तक PSLV 63 सफल मिशन पूरे कर चुका है। इसी रॉकेट के जरिए चंद्रयान-1, मार्स ऑर्बिटर मिशन  (MOM) और आदित्य-L1 जैसे अहम मिशन लॉन्च किए गए हैं।

PSLV का पिछला मिशन PSLV-C61 था, जिसमें 18 मई 2025 को EOS-09 सैटेलाइट लॉन्च किया गया था। हालांकि, तीसरे चरण में आई तकनीकी खामी के कारण वह मिशन पूरी तरह सफल नहीं हो पाया था।

देश की नजरें आसमान पर

आज जब PSLV के इंजन बंगाल की खाड़ी के तट पर गूंजेंगे, भारत एक बार फिर खुद को एक भरोसेमंद और नवोन्मेषी स्पेस लॉन्च हब के रूप में स्थापित करेगा। आसमान तैयार है और इसरो भी।


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