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Explainer: अचानक क्यों महंगी हो रही चीनी? 65 रुपये किलो तक पहुंचा भाव; आपकी जेब पर क्या होगा असर?

Sat, 22 Aug 2026 05:37 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Sat, 22 Aug 2026 05:37 AM IST
सार

चीनी की बढ़ती कीमतों ने त्योहारों से पहले आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। बाजार में भाव 60-65 रुपये किलो तक पहुंचने के बीच सरकार ने कीमतों पर काबू पाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी शुल्क-मुक्त आयात करने का फैसला किया है। सवाल सिर्फ चीनी के महंगे होने का नहीं, बल्कि यह है कि आने वाले दिनों में इसकी कीमतें कहां तक जाएंगी और क्या सरकार का आयात वाला कदम त्योहारों से पहले राहत दिला पाएगा?

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Why Is Sugar Suddenly Getting Expensive? Prices Reach ₹65/kg; How Will It Impact Your Pocket?
चीनी की कीमतों में उछाल - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

देश में चीनी की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। कुछ बाजारों में इसके दाम 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की खबरें हैं। इस बीच केंद्र सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी बिना आयात शुल्क के मंगाने की अनुमति दी है। दस साल बाद ऐसा होगा जब भारत को चीनी का आयात करना पड़ रहा है। 

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ऐसे में सवाल उठता है कि चीनी के दाम अचानक क्यों बढ़ रहे हैं? क्या देश में चीनी की कमी है या आपूर्ति को लेकर समस्या है? क्या मौसम भी इसकी वजह है? एथेनॉल उत्पादन से चीनी का क्या संबंध है? सरकार का क्या कहना है? भारत ने चीनी का निर्यात क्यों घटाया? भारत में चीनी सबसे ज्यादा कहां होती है? सरकार ने चीनी को नियंत्रित करने के लिए क्या-क्या नीतियां बनाई? सरकार को 10 लाख टन चीनी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ी? और त्योहारों से पहले आम आदमी की जेब पर कितना असर पड़ सकता है? आइये जानते हैं...

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चीनी के दाम क्यों बढ़ रहे हैं?

चीनी की कीमतों में तेजी की सबसे बड़ी वजह घरेलू बाजार में इसकी उपलब्धता को लेकर बढ़ता दबाव है। देश में चीनी उत्पादन पिछले कुछ वर्षों में लगातार एक जैसा नहीं रहा है। कभी उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा तो कभी इसमें गिरावट देखने को मिली। 15 अप्रैल 2026 तक देश में 273.90 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन हो चुका था। इस दौरान देशभर में 541 चीनी मिलें चल रही थीं और उन्होंने 2,865.21 लाख मीट्रिक टन गन्ने की पेराई की। गन्ने से चीनी निकलने की औसत दर 9.56 प्रतिशत रही।

क्या मौसम भी है वजह?

चीनी की कीमतों पर मौसम का असर भी पड़ रहा है। इस साल भारत में मानसून के 11 साल के सबसे निचले स्तर पर रहने का अनुमान जताया गया है। कमजोर बारिश ने गन्ने की बुवाई और फसल को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसके साथ ही अल नीनो का खतरा भी बना हुआ है।
विशेषज्ञ राहिल शेख, प्रबंध निदेशक, एमईआईआर कमोडिटीज इंडिया के मुताबिक भारत में चीनी की आपूर्ति पहले से दबाव में है और अब अल नीनो एक बड़ा जोखिम बनकर उभर रहा है। अगर अनुमान के मुताबिक बारिश कमजोर रहती है तो गन्ने की बुवाई प्रभावित होगी और भारत कम से कम अगले तीन साल तक चीनी के निर्यात बाजार से बाहर रह सकता है।

त्योहारों का मौसम क्यों बढ़ा रहा है चिंता?

चीनी की मांग पूरे साल रहती है, लेकिन त्योहारों के दौरान इसमें खास बढ़ोतरी होती है। रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के समय मिठाई की बिक्री काफी बढ़ जाती है। इसके अलावा बिस्किट, टॉफी, शीतल पेय और कई खाद्य उत्पादों में भी चीनी का इस्तेमाल होता है। ऐसे समय में अगर बाजार में पहले से ही आपूर्ति का दबाव हो और मांग अचानक बढ़ जाए तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। 

Why Is Sugar Suddenly Getting Expensive? Prices Reach ₹65/kg; How Will It Impact Your Pocket?
उत्पादन और खपत के आंकड़े - फोटो : Amar Ujala

देश में चीनी सबसे ज्यादा कहां बनती है?

  • भारत के चीनी उत्पादन में तीन राज्यों की सबसे बड़ी भूमिका है महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक। ये तीनों राज्य मिलकर देश के कुल चीनी उत्पादन में करीब 87.48 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। 2025-26 के दौरान महाराष्ट्र में 89.80 लाख मीट्रिक टन, उत्तर प्रदेश में 65.60 लाख मीट्रिक टन और कर्नाटक में 41.70 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन हुआ।
  • इसलिए इन राज्यों में गन्ने की पैदावार, बारिश और चीनी मिलों का उत्पादन पूरे देश के बाजार को प्रभावित कर सकता है। अगर इन प्रमुख राज्यों में फसल प्रभावित होती है तो इसका असर देशभर में चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है।
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क्या एथेनॉल से भी चीनी के उत्पादन का संबंध है?

चीनी की मौजूदा कहानी में एथेनॉल एक महत्वपूर्ण कड़ी है। केंद्र सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को लगातार बढ़ावा दे रही है। इसके पीछे पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना, वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना और किसानों की आय बढ़ाना जैसे उद्देश्य हैं। एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2025-26 में देश में एथेनॉल की संचयी आपूर्ति 800 करोड़ लीटर का आंकड़ा पार कर गई है। अखिल भारतीय आसवक संघ के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में कुल मासिक एथेनॉल आपूर्ति में करीब 76 प्रतिशत हिस्सा अनाज आधारित कच्चे माल का था। वहीं, गन्ने पर आधारित कच्चे माल से जुलाई में 22 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति हुई, जबकि जून में यह 28 करोड़ लीटर थी। जुलाई में कुल एथेनॉल आपूर्ति में गन्ने पर आधारित कच्चे माल की हिस्सेदारी करीब 24 प्रतिशत रही, जबकि जून में यह करीब 27 प्रतिशत थी। 

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इन उत्पादों के भी बढ़े दाम - फोटो : Amar Ujala Graphics

विशेषज्ञों की चेतावनी क्या है?

विशेषज्ञों की चिंता मुख्य रूप से दो चीजों को लेकर है, मौसम और घरेलू आपूर्ति। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में चीनी की आपूर्ति पहले से दबाव में है। अगर बारिश कमजोर रहती है तो गन्ने की अगली फसल प्रभावित हो सकती है। इसका असर आने वाले चीनी मौसम में उत्पादन पर पड़ सकता है। इसके अलावा एथेनॉल नीति को लेकर भी संतुलन जरूरी है। सरकार के लिए एथेनॉल उत्पादन बढ़ाना ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, लेकिन खाद्य जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सरकार का क्या कहना है?

दावा किया जा रहा था कि पेट्रोल में मिश्रण के लिए चीनी को इथेनॉल उत्पादन की ओर डाइवर्ट किए जाने से घरेलू बाजार में इसकी कीमतें बढ़ रही हैं। हालांकि, खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने शुक्रवार को एक आधिकारिक बयान जारी कर इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। सरकार ने स्पष्ट किया है कि कीमतों में बढ़ोतरी का संबंध इथेनॉल से नहीं, बल्कि कम घरेलू उत्पादन, आगामी त्योहारी सीजन की मांग और जमाखोरी से है। साथ ही गन्ने की फसल को रेड रॉट और टॉप बोरर बीमारी से नुकसान हुआ। इस सीजन में चीनी का उत्पादन करीब 306 लाख मीट्रिक टन (LMT) रहने का अनुमान है, जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों का शुरुआती अनुमान करीब 343 एलएमटी था।

सरकार ने आंकड़ों के साथ स्पष्ट किया है कि इथेनॉल कार्यक्रम पर महंगाई का दोष मढ़ना पूरी तरह गलत है। आंकड़ों के मुताबिक, इथेनॉल उत्पादन के लिए डाइवर्ट की जाने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 सीजन के 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 सीजन में महज 9 प्रतिशत रह गई है। इसके अलावा, वर्तमान में भारत के कुल इथेनॉल उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई (75%) हिस्सा गन्ने के बजाय अनाजों, विशेष रूप से मक्के से प्राप्त हो रहा है। 

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निर्यात के आंकड़े - फोटो : Amar Ujala

भारत ने चीनी का निर्यात क्यों घटाया?

  • भारत पहले दुनिया के बड़े चीनी निर्यातकों में शामिल था। 2020-21 में देश ने करीब 70 लाख मीट्रिक टन चीनी का निर्यात किया था। 2021-22 में यह बढ़कर रिकॉर्ड 110 लाख मीट्रिक टन हो गया। लेकिन इसके बाद सरकार की प्राथमिकता बदली। घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहे और कीमतों पर दबाव न बढ़े, इसके लिए निर्यात पर नियंत्रण बढ़ाया गया।
  • 2022-23 में चीनी निर्यात घटकर 63.08 लाख मीट्रिक टन रह गया और 2023-24 में यह करीब एक लाख मीट्रिक टन तक सीमित हो गया। इसलिए भारत के चीनी निर्यात में आई भारी गिरावट को केवल उत्पादन या मौसम से जोड़ना सही नहीं होगा। सरकार की बदली हुई प्राथमिकताएं भी इसकी बड़ी वजह हैं।
  • एक तरफ सरकार घरेलू उपभोक्ताओं के लिए चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में विदेश भेजने के बजाय घरेलू बाजार के लिए चीनी बचाए रखना सरकार की प्राथमिकता बन गया है।

चीनी पर सरकार का इतना नियंत्रण क्यों है?

भारत में चीनी और गन्ने को आवश्यक वस्तुओं में रखा गया है, इसलिए सरकार इनके उत्पादन, कीमत, बिक्री, भंडारण और आयात-निर्यात को नियंत्रित कर सकती है।

  • 1955: आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत चीनी और गन्ने को आवश्यक वस्तुओं में शामिल किया गया।
  • 1966: गन्ना नियंत्रण आदेश के तहत केंद्र सरकार को किसानों के लिए उचित और लाभकारी मूल्य तय करने का अधिकार मिला।
  • 2009: गन्ने के पुराने न्यूनतम वैधानिक मूल्य की जगह उचित और लाभकारी मूल्य की व्यवस्था लागू हुई।
  • 2018: चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत तय की गई। शुरुआत में यह 29 रुपये प्रति किलो थी, जिसे 2019 में बढ़ाकर 31 रुपये कर दिया गया।
  • 2025: नया चीनी नियंत्रण आदेश लागू हुआ, जिसके तहत सरकार को चीनी के उत्पादन, बिक्री, भंडारण, आयात-निर्यात और आवाजाही को नियंत्रित करने के व्यापक अधिकार मिले।

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ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर चीनी की कीमत - फोटो : Amar Ujala

सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए क्या किया?

कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने चीनी कारोबारियों के लिए भंडारण सीमा भी लागू की है। इसका मकसद जमाखोरी और सट्टेबाजी वाले कारोबार को रोकना है, जिससे बाजार में कृत्रिम कमी का माहौल बन सकता है।

बड़े खरीदारों और औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए भी भंडारण सीमा तय की गई है। जो इकाइयां हर महीने 10 मीट्रिक टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करती हैं, उन्हें तय अवधि में 15 दिन से ज्यादा का भंडार रखने की अनुमति नहीं होगी। 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक देशभर में चीनी डीलरों पर 400 टन की स्टॉक सीमा लागू की गई है।

फिर 10 लाख टन चीनी आयात क्यों करनी पड़ी?

निर्यात पर नियंत्रण और भंडारण सीमा जैसे कदम उठाने के बावजूद कीमतों में तेजी बनी रही। इसके बाद सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी को बिना आयात शुल्क के भारत लाने की अनुमति दी। भारत में सामान्य तौर पर चीनी के आयात पर 100 प्रतिशत शुल्क लगता है। लेकिन इस बार तय मात्रा में कच्ची चीनी बिना शुल्क के मंगाई जा सकेगी। यह आयात 31 अक्तूबर 2026 तक किया जा सकेगा। इस कदम का मकसद घरेलू बाजार में चीनी की अतिरिक्त उपलब्धता बढ़ाना है, ताकि मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर कम हो और कीमतों पर दबाव घटे।

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चीनी की कीमत - फोटो : Amar Ujala

चीनी कहां से आएगी?

विश्व बैंक के डब्ल्यूआईटीएस के मुताबिक, भारत ने 2024 में कच्ची गन्ने की चीनी की करीब 31.89 लाख टन खेप आयात की। इसमें अकेले ब्राजील की हिस्सेदारी करीब 99.85 फीसदी थी। भारत ने ब्राजील से करीब 31.85 लाख टन कच्ची चीनी आयात की, जबकि फ्रांस से करीब 31.48 लाख किलो, जर्मनी से 11.28 लाख किलो, पोलैंड से 4.73 लाख किलो और अमेरिका से सिर्फ 90,720 किलो चीनी आयात हुई।

इस बार के आयात में ब्राजील प्रमुख स्रोत हो सकता है। हालांकि ब्राजील से भारत तक चीनी पहुंचने में करीब दो महीने लग सकते हैं। इसलिए आयात का असर तुरंत बाजार में दिखाई देना जरूरी नहीं है। इसका बड़ा असर अक्टूबर के आसपास दिखाई दे सकता है, जब आयातित चीनी घरेलू बाजार में पहुंचनी शुरू होगी।

आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?

चीनी की कीमतों में इतनी तेज बढ़ोतरी का सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा। उत्तर प्रदेश में डेढ़ महीने में ही चीनी के दाम 17 रुपये प्रति किलो तक बढ़ चुके हैं और पिछले एक पखवाड़े से रोजाना एक से दो रुपये की बढ़ोतरी हो रही है। अलीगढ़ में चीनी 61 रुपये किलो तक पहुंच चुकी है। वहीं पंजाब में खुदरा कीमत करीब 65 रुपये किलो और मुंबई, भोपाल समेत कुछ अन्य बाजारों में 58 से 63 रुपये किलो तक पहुंच गई है।

उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 20 अगस्त को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत 55.70 रुपये प्रति किलो पहुंच गई। एक सप्ताह पहले यानी 13 अगस्त को यह 50.98 रुपये, एक महीने पहले 48.18 रुपये और एक साल पहले 46.30 रुपये प्रति किलो थी। यानी एक साल में औसत खुदरा कीमत 9.40 रुपये प्रति किलो, एक महीने में 7.52 रुपये और एक सप्ताह में 4.72 रुपये प्रति किलो बढ़ चुकी है।

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