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Hindi News ›   India News ›   Why Was Tarun Tejpal Sentenced to 10 Years? The Complete Story Behind the 13-Year-Old Sexual Assault Case

Explainer: तरुण तेजपाल को क्यों हुई 10 साल की सजा, 13 साल पुराने यौन उत्पीड़न मामले की क्या है पूरी कहानी?

Thu, 06 Aug 2026 04:24 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Thu, 06 Aug 2026 04:24 PM IST
सार

यह मामला सिर्फ एक चर्चित यौन उत्पीड़न आरोप का नहीं, बल्कि 13 साल तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया का भी है। इस दौरान जांच, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, ट्रायल कोर्ट का फैसला और फिर हाईकोर्ट में अपील जैसे कई अहम मोड़ आए। आखिर किन वजहों से हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलटते हुए तरुण तेजपाल को दोषी ठहराया, आइए विस्तार से समझते हैं।

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Why Was Tarun Tejpal Sentenced to 10 Years? The Complete Story Behind the 13-Year-Old Sexual Assault Case
तरुण तेजपाल को 10 साल की सजा - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

करीब 13 साल पुराने चर्चित तरुण तेजपाल यौन उत्पीड़न मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने गोवा की ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें मई 2021 में तरुण तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने गोवा सरकार की अपील स्वीकार करते हुए तरुण तेजपाल को दुष्कर्म और महिला की मर्यादा भंग करने का दोषी ठहराया और उन्हें 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।

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ऐसे में आइए जानते हैं कि तरुण तेजपाल कौन हैं? यह मामला कैसे शुरू हुआ? पिछले 13 वर्षों में इस केस में क्या-क्या हुआ? आखिर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला क्यों पलट दिया? हाईकोर्ट ने क्या फैसला सुनाया है?

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कौन हैं तरुण तेजपाल?

तरुण तेजपाल तहलका मैगजीन के संस्थापक और तत्कालीन प्रधान संपादक रहे हैं। वर्ष 2013 में अपनी ही एक जूनियर महिला सहकर्मी द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद वह विवादों में आ गए थे। शिकायत सामने आने के बाद उन्होंने छह महीने के लिए संपादक पद से हटने की घोषणा की थी ताकि मामले की निष्पक्ष जांच हो सके।

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Why Was Tarun Tejpal Sentenced to 10 Years? The Complete Story Behind the 13-Year-Old Sexual Assault Case
तरुण तेजपाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

आखिर पूरा मामला क्या है?

यह मामला नवंबर 2013 का है। आरोप है कि 7 और 8 नवंबर 2013 को गोवा के एक होटल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान तरुण तेजपाल ने अपनी ही जूनियर महिला सहकर्मी का यौन उत्पीड़न किया।

घटना के करीब दस दिन बाद, 18 नवंबर 2013 को पीड़िता ने तहलका की तत्कालीन मैनेजिंग एडिटर शोमा चौधरी को इसकी शिकायत की। शिकायत में उन्होंने पूरी घटना का उल्लेख करते हुए कार्रवाई की मांग की।

शिकायत के अगले दिन तरुण तेजपाल ने पीड़िता को एक लंबा ईमेल भेजा। इस ईमेल में उन्होंने बिना शर्त माफी मांगते हुए लिखा कि 7 और 8 नवंबर को उन्होंने दो मौकों पर उसके साथ यौन संबंध बनाने की कोशिश की, जबकि पीड़िता ने स्पष्ट रूप से अपनी अनिच्छा जताई थी। उन्होंने इसे अपनी गलत निर्णय क्षमता और स्थिति को गलत समझने का परिणाम बताया।

हालांकि पीड़िता ने केवल माफी को पर्याप्त नहीं माना। उन्होंने विशाखा दिशानिर्देशों के तहत आंतरिक यौन उत्पीड़न समिति गठित कर जांच कराने की मांग की। इसी बीच मामला राष्ट्रीय मीडिया में सामने आया और 22 नवंबर 2013 को गोवा पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एफआईआर दर्ज कर ली। इसके बाद 30 नवंबर 2013 को स्थानीय अदालत ने तरुण तेजपाल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

विशाखा दिशानिर्देश क्या हैं?

पीड़िता ने जिस विशाखा समिति की मांग की थी, उसकी शुरुआत 1997 में हुई थी। उस वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने विशाखा बनाम राजस्थान राज्य मामले में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए विशाखा दिशानिर्देश जारी किए थे। उस समय इस विषय पर कोई अलग कानून नहीं था, इसलिए यही दिशानिर्देश कानूनी मानक बने रहे। बाद में 2013 में सरकार ने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध एवं निवारण) अधिनियम (POSH Act) लागू कर इन्हें कानूनी रूप दे दिया।

Why Was Tarun Tejpal Sentenced to 10 Years? The Complete Story Behind the 13-Year-Old Sexual Assault Case
तरुण तेजपाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

जांच और अदालत तक मामला कैसे पहुंचा?

एफआईआर दर्ज होने के बाद मामले की जांच गोवा पुलिस ने शुरू की। फरवरी 2014 में गोवा क्राइम ब्रांच ने तरुण तेजपाल के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। इसी दौरान उन्हें पहले अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए अंतरिम जमानत मिली और बाद में 1 जुलाई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने नियमित जमानत दे दी। इसके बाद जांच एजेंसी ने पूरक चार्जशीट भी दाखिल की।

साल 2017 में ट्रायल कोर्ट ने दोनों पक्षों की निजता और गरिमा बनाए रखने के लिए मुकदमे की सुनवाई इन-कैमरा करने की अनुमति दी। उसी वर्ष 28 सितंबर को अदालत ने तरुण तेजपाल के खिलाफ आरोप तय किए। मार्च 2018 से पीड़िता का बयान दर्ज होना शुरू हुआ। अभियोजन पक्ष ने कुल 71 गवाह पेश किए। उसके मामले का आधार पीड़िता का बयान, उसके सहकर्मियों के बयान, सीसीटीवी फुटेज, ईमेल और व्हाट्सएप संदेश जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य थे।

अगस्त 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने तरुण तेजपाल की आरोप रद्द करने की याचिका खारिज कर दी और ट्रायल जल्द पूरा करने का निर्देश दिया। इसके बाद जनवरी 2021 में पूरक चार्जशीट दाखिल हुई और मार्च 2021 में बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया।

ट्रायल कोर्ट ने तरुण तेजपाल को क्यों बरी किया था?

करीब आठ साल तक चली सुनवाई के बाद 21 मई 2021 को गोवा की ट्रायल कोर्ट ने तरुण तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर सका। फैसले में कहा गया कि पीड़िता के बयान में कई जगह सुधार, विरोधाभास और अलग-अलग संस्करण दिखाई देते हैं, जिससे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। अदालत ने यह भी माना कि आरोपों के समर्थन में पर्याप्त पुष्टिकरण उपलब्ध नहीं है, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए।

ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के बाद गोवा सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील दायर की। सरकार का तर्क था कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की सही तरीके से जांच करने के बजाय पीड़िता के घटना के बाद के व्यवहार और निजी जीवन को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया। सरकार ने यह भी कहा कि माफी वाले ईमेल जैसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

Why Was Tarun Tejpal Sentenced to 10 Years? The Complete Story Behind the 13-Year-Old Sexual Assault Case
तरुण तेजपाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

हाईकोर्ट में किन मुद्दों पर सुनवाई हुई?

गोवा सरकार की अपील पर सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या 2021 में ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया था या नहीं। राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और गोवा के एडवोकेट जनरल देविदास पंगम ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की जांच करने के बजाय घटना के बाद पीड़िता के व्यवहार, उसकी प्रतिक्रियाओं और उसके व्यक्तिगत जीवन को अधिक महत्व दिया। उनका तर्क था कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी के बजाय पीड़िता को ही कठघरे में खड़ा कर दिया।

वहीं, तरुण तेजपाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आबाद पोंडा ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट का फैसला तथ्यों और रिकॉर्ड पर मौजूद इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर दिया गया था, न कि किसी पूर्वाग्रह या रूढ़िवादी सोच के आधार पर। बचाव पक्ष का कहना था कि ट्रायल कोर्ट का फैसला पूरी तरह तर्कसंगत और साक्ष्यों पर आधारित था।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने गोवा सरकार की अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया और तरुण तेजपाल को भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत दोषी ठहराया। इसके बाद अदालत ने उन्हें दुष्कर्म और महिला की मर्यादा भंग करने के मामले में 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

किन धाराओं में दोषी ठहराया गया?

हाईकोर्ट ने तेजपाल को भारतीय दंड संहिता (IPC) की चार धाराओं के तहत दोषी ठहराया है।

धारा 376(2)(f): यह धारा ऐसे मामलों पर लागू होती है, जब कोई ऐसा व्यक्ति, जो महिला के प्रति विश्वास, संरक्षण या अधिकार की स्थिति में हो, उसी स्थिति का फायदा उठाकर उसके साथ दुष्कर्म करे।

धारा 376(2)(k): यह धारा उस स्थिति से जुड़ी है, जब कोई व्यक्ति किसी महिला पर नियंत्रण, प्रभुत्व या प्रभाव की स्थिति में रहते हुए उसके साथ दुष्कर्म करता है।

धारा 354A: यह यौन उत्पीड़न से संबंधित धारा है। इसके तहत महिला की इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संपर्क करना, यौन संबंध बनाने का दबाव डालना, अश्लील सामग्री दिखाना या यौन टिप्पणी करना अपराध माना जाता है।

धारा 354B: यह धारा किसी महिला के कपड़े उतारने या उसे निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला करने या बल प्रयोग करने से संबंधित है। इस अपराध के लिए न्यूनतम तीन वर्ष और अधिकतम सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।

अब आगे क्या होगा?

हाईकोर्ट द्वारा 10 साल की सजा सुनाए जाने के बाद तरुण तेजपाल ने कहा कि वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। फैसले के बाद उन्होंने कहा कि हम निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। वे राजनीतिक बदले की भावना और तहलका के काम की वजह से मेरे पीछे पड़े हैं। हमने ट्रायल कोर्ट में 7.5 साल तक केस लड़ा और बरी हो गए। अब इस मामले का अगला कानूनी चरण सुप्रीम कोर्ट होगा, जहां हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी जा सकती है।

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