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महिलाओं के अधिकार बनाम ट्रांसजेंडर कानून: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, पूछा- इससे क्या असर पड़ेगा?
Wed, 28 Oct 2026 02:43 PM IST
प्रशांत तिवारी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Wed, 28 Oct 2026 02:43 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 को लेकर दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार के तीन मंत्रालयों से जवाब मांगा है। महिला संगठन विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया ने महिलाओं के आरक्षण, खेल प्रतियोगिताओं, जेलों और पुलिस कार्रवाई में मिलने वाली विशेष सुरक्षा पर कानून के संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। यह याचिका महिला संगठन विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया की ओर से दाखिल की गई है। संगठन का कहना है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है, लेकिन इसके साथ महिलाओं के लिए संविधान और कानून के तहत तय आरक्षण, सुविधाओं और विशेष सुरक्षा उपायों को भी सुरक्षित रखा जाना चाहिए। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार के तीन मंत्रालयों को नोटिस जारी किया है।
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महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा पर क्या है चिंता?
मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने बुधवार को याचिका पर सुनवाई की। पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं। अदालत ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से जवाब मांगा है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को कानूनी मान्यता और अधिकार देने के दौरान महिलाओं के लिए बनाई गई विशेष व्यवस्थाओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी। इनमें पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें, महिला जेलों में रहने की व्यवस्था, महिलाओं की खेल प्रतियोगिताओं में भागीदारी और पुलिस कार्रवाई के दौरान मिलने वाली विशेष सुरक्षा शामिल हैं।
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महिला संगठन ने अदालत में क्या कहा?
याचिकाकर्ता संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि उनकी याचिका ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के खिलाफ नहीं है। संगठन का उद्देश्य महिलाओं के लिए पहले से निर्धारित अधिकारों और कानूनी सुरक्षा पर संभावित प्रभाव को सामने लाना है। सिब्बल के मुताबिक, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को समान अधिकार और आवश्यक सुविधाएं मिलनी चाहिए, लेकिन इन अधिकारों को लागू करते समय यह भी सुनिश्चित करना होगा कि महिलाओं के लिए निर्धारित लाभ और सुरक्षा प्रभावित न हों। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
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पहले से लंबित हैं कानून को चुनौती देने वाले मामले
यह याचिका संशोधन अधिनियम, 2026 को चुनौती देने वाली अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ दी गई है। इन मामलों में कानून के कुछ प्रावधानों और ट्रांसजेंडर पहचान को कानूनी मान्यता देने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि इसी विषय पर लगातार नई याचिकाएं दाखिल होने से सुनवाई में देरी हो सकती है। उन्होंने बताया कि कानून को चुनौती देने वाले कुछ मामले पहले से अदालत में लंबित हैं और उनकी सुनवाई की तैयारी लगभग पूरी है। इस पर सिब्बल ने दलील दी कि उनकी याचिका में महिलाओं के अधिकारों और उनके लिए बनाई गई विशेष व्यवस्थाओं पर कानून के संभावित प्रभाव का अलग पहलू उठाया गया है। मुख्य न्यायाधीश ने माना कि इस मुद्दे पर विचार किया जा सकता है, हालांकि कानून की वैधता का प्रश्न पहले से अदालत के सामने है।
खेल, जेल और पुलिस कार्रवाई से जुड़े सवाल
सुनवाई के दौरान महिला खेल प्रतियोगिताओं में भागीदारी, महिला जेलों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को रखने की व्यवस्था और महिलाओं के शौचालयों तक पहुंच जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। इसके अलावा, महिलाओं की तलाशी लेने और उनके बयान दर्ज करने जैसी पुलिस प्रक्रियाओं में महिला अधिकारियों की भूमिका से जुड़े सुरक्षा उपायों पर भी सवाल उठे। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक काल्पनिक स्थिति का उदाहरण देते हुए पूछा कि यदि किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति की पहचान महिला के रूप में है, तो क्या उस पर सूर्यास्त के बाद महिलाओं की गिरफ्तारी से संबंधित प्रतिबंध लागू होंगे? इस उदाहरण के जरिए लैंगिक पहचान और मौजूदा कानूनी प्रावधानों के बीच पैदा होने वाले व्यावहारिक सवालों को सामने रखा गया।
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महिलाओं के आरक्षण पर भी बहस
याचिका में यह सवाल भी उठाया गया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग आरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए या नहीं। साथ ही, पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर उनके दावे को लेकर भी स्पष्टता की जरूरत बताई गई। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार लंबित मामलों में अपना जवाब तैयार कर रही है। उन्होंने आश्वासन दिया कि नई याचिका में उठाई गई चिंताओं को भी जवाब में शामिल किया जाएगा।