पापा का घर—
यह नाम सुनते ही
मन में एक हलचल-सी होने लगती है।
आज भी जब कोई
उस गाँव का नाम लेता है,
मेरी आँखों के सामने
वही पुरानी हवेली खड़ी हो जाती है।
वह हवेली,
जो अब खंडहर होने...और पढ़ें
तेरा शीतल मन क्यों रूठ गया है?
चलो, तुम्हें बंजारों की खूब पकाई गई चाय पिलवाता हूँ।
स्कूल के आगे जो पहाड़ी है,
उसी की तलहटी में एक बंजारों की बस्ती है।
अगले मोड़ पर वहीं उनका छोटा-सा चाय का ढाबा है।
एक बार श्रीकांत...और पढ़ें
कमरे के इस एकांत कोने में,
मैं हूँ।
कुछ बिखरा हुआ सामान है।
और सामने से आती हुई धूप की
एक पतली-सी लकीर...
जो फर्श पर पड़े सामान को
धीरे-धीरे छू रही है,
जैसे कोई पुराना दोस्त
दबे पाँव कमरे में चलऔर पढ़ें
मैं पतझर का रुक्ष तना हूँ तुम वसंत की कोमल बेला
मैं भटका सा एक बटोही तुम हो एक सुहाना मेला
बँध भी गए प्रेम धागों में तो भी यह समझाओ मुझको
अपनी दो विपरीत दिशाएँ बोलो साथ निभेगा कैसे
मेरे आँगन में पसरी है बरसों से इक...और पढ़ें
नहीं है कोई और सहारा,
बस यही मेरा संसार है,
किताबों के पन्नों में ही,
मेरा सारा प्यार है।
ना कोई भाई,
ना कोई मित्र,
ना कोई दूजा सखा,
इनके मौन शब्दों में ही,
जीवन का सुख लिखा।
जब कोई नहीं...और पढ़ें
बहुत कुछ कहना था लेकिन किसे जज़्बात कहते
नहीं तुम पास किससे अपने हम हालात कहते
तेरी नाराजगी से जश्न भी मातम बना है
मेरा निकला जनाज़ा कैसे हम बारात कहते
ग़म-ए-दिल के ये अंधेरे सताते हैं बहुत अब
ख़ुशी...और पढ़ें
तुम्हारी याद के बादल ज़हन में छा गए फिर से
लो अब मौसम उदासी के मेरे घर आ गए फिर से
बहुत मुश्किल से निकला था मैं अपने इस ग़म-ए-दिल से
और एक तुम हो तराने इश्क के क्यों गा गए फिर से
यहां मैं तो तुम्हारी खैरियत...और पढ़ें
ये उदासी आपके चेहरे पर अच्छी नही लगती
पापा आप पत्रकार हैं कोई भगवान तो नही जो
उनके मुताबिक कार्य करे आपका काम हैं खबर इकठ्ठा करना दुनियाँ को सच सें अवगत कराना...
आप शांत चुप होकर सून रहे थे बच्चे लूजर - लूजर
कह करऔर पढ़ें
मोहब्बत के सफ़र में कोई भी रस्ता नहीं देता
ज़मीं वाक़िफ़ नहीं बनती फ़लक साया नहीं देता
ख़ुशी और दुख के मौसम सब के अपने अपने होते हैं
किसी को अपने हिस्से का कोई लम्हा नहीं देता
न जाने कौन होते हैं जो बाज़ू थ...और पढ़ें
क्यूँ छिपाए हुए हो नमी आज तुम दीद में
वक़्त बर्बाद करते क्यूँ हो ज़िक्रे-तम्हीद में
है उदासी का साया यहाँ शहर के हर तरफ़
माह-ए-नौ का तबस्सुम भी गुम है कहीं ईद में
मज़हबी नफ़रतें घुल चुकी हैं फ़िज़ाओं में यू...और पढ़ें