स्टडी: दिमाग को हेल्दी रखने के लिए व्यायाम जरूरी, लेकिन ज्यादा मेहनत वाली नौकरी बढ़ा सकती है डिमेंशिया का खतरा
Dementia Risk Factors: अध्ययन में पाया गया कि रनिंग, तैराकी या साइकिलिंग जैसी नियमित शारीरिक गतिविधियां डिमेंशिया के खतरे को कम कर सकती हैं। वहीं, भारी शारीरिक मेहनत वाले कामों में डिमेंशिया का खतरा अधिक देखा गया। अध्ययन का संदेश है कि दिमाग की सेहत के लिए सिर्फ सक्रिय रहना नहीं, बल्कि गतिविधि का माहौल और तरीका भी महत्वपूर्ण है।
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विस्तार
जब भी बात शरीर को स्वस्थ रखने की होती है तो इसके लिए लाइफस्टाइल और खानपान में सुधार की सलाह दी जाती है। आप शारीरिक रूप से कितने एक्टिव हैं, रोजाना व्यायाम करते हैं या नहीं? इन बातों पर आपकी सेहत सबसे ज्यादा निर्भर करती है। यही कारण है कि दुनियाभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को नियमित रूप से कम से कम 30 मिनट और सप्ताह में कम से कम 150 मिनट व्यायाम जरूर करने की सलाह देते हैं। अगर आप जिम नहीं जा सकते तो रोजाना रनिंग-वॉक, साइकिलिंग जैसे हल्के स्तर के व्यायाम करके भी शरीर को सक्रिय रखकर स्वास्थ्य लाभ पा सकते हैं। मसलन व्यायाम को अच्छी सेहत के लिए मूलभूत उपाय माना जाता है।
हालांकि अब एक नए अध्ययन ने इसको लेकर तस्वीर थोड़ी जटिल कर दी है। शोधकर्ताओं का कहना है कि वैसे तो शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम जरूरी है पर अगर आप दिनभर बहुत ज्यादा मेहनत वाले काम करते हैं तो ये आपको फायदा देने की जगह कई तरह से नुकसान पहुंचाने वाली हो सकती है।
अध्ययन में पाया गया है कि मजदूरी, निर्माण या भारी सामान उठाने वाला काम सीधे दिमाग को नुकसान पहुंचाता है, ऐसे लोगों में आगे चलकर दिमाग से संबंधित बड़ी समस्या जैसे अल्जाइमर और डिमेंशिया होने का खतरा काफी बढ़ जाता है।
अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब व्यायाम को शरीर-ब्रेन दोनों को हेल्दी रखने वाला बताया जाता रहा है तो फिर ज्यादा मेहनत वाले काम से ज्यादा लाभ होने की जगह नुकसान क्यों हो रहा है?
'फिजिकल एक्टिविटी पैराडॉक्स' को लेकर खुलासा
द लैंसेट पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने अलर्ट किया है कि लगातार भारी सामान उठाना या बहुत ज्यादा श्रम वाले शारीरिक मेहनत वाले काम आगे चलकर डिमेंशिया का खतरा बढ़ा सकते हैं। डिमेंशिया ऐसी स्थिति है जिसमें याददाश्त, सोचने-समझने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होने लगती है।
वहीं रनिंग-वॉकिंग तैराकी और साइकिल चलाने जैसे अभ्यास को दिमाग को स्वस्थ रखने और डिमेंशिया के खतरे को कम करने वाला बताया गया है।
- यह अपनी तरह का पहला बड़ा अध्ययन है जिसमें देखा गया है कि शारीरिक गतिविधि से जुड़े तथाकथित ‘फिजिकल एक्टिविटी पैराडॉक्स’ का डिमेंशिया पर भी असर पड़ता है या नहीं?
- ‘फिजिकल एक्टिविटी पैराडॉक्स’ का मतलब ऐसी स्थिति से है जिसमें नौकरी के दौरान की जाने वाली शारीरिक मेहनत लंबे समय में सेहत के लिए नुकसानदायक दिखाई देती है, जबकि खाली समय में की जाने वाली शारीरिक गतिविधि सेहत के लिए फायदेमंद होती है। यानी हर तरह की शारीरिक मेहनत का शरीर और दिमाग पर असर एक जैसा नहीं होता।
अध्ययन में क्या पता चला?
अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों ने ये अध्ययन किया है। उन्होंने इसके लिए 74 अलग-अलग अध्ययनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इन अध्ययनों में 45 से 93 साल की उम्र के 42 लाख से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया और इनपर करीब 10 साल तक नजर रखी गई।
- शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि इनमें से कितने लोगों में अल्जाइमर रोग या डिमेंशिया हुआ?
- इसके अलावा प्रतिभागियों में वैस्कुलर डिमेंशिया के खतरे को भी देखा गया। इस तरह का डिमेंशिया दिमाग तक खून का प्रवाह कम होने या दिमाग की रक्त वाहिकाओं से जुड़ी समस्याओं के कारण होता है।
अध्ययन में पाया गया कि जो लोग अपने खाली समय में शारीरिक गतिविधियां करते थे, उनमें डिमेंशिया का खतरा 24 प्रतिशत कम था। लेकिन तस्वीर तब अलग नजर आई जब शारीरिक मेहनत को नौकरी का हिस्सा बनाया गया।
जिन लोगों के काम ऐसे थे जिनमें ज्यादा शारीरिक गतिविधि जैसे भवन निर्माण, भारी सामान उठाने वाले काम शामिल थे उनमें डिमेंशिया का खतरा 20 प्रतिशत ज्यादा पाया गया।
हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह साफ किया है कि इसका मतलब यह नहीं है कि काम के दौरान शरीर की ज्यादा मेहनत सीधे तौर पर डिमेंशिया का कारण बनती है। इसके पीछे नौकरी और काम के माहौल से जुड़ी दूसरी परिस्थितियां ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया कि शारीरिक मेहनत वाले काम करने वाले लोगों को अक्सर मानसिक और सामाजिक तनाव ज्यादा झेलना पड़ सकता है। उन्हें हवा में मौजूद प्रदूषण और लगातार तेज आवाज जैसे वायु और ध्वनि प्रदूषण का भी ज्यादा सामना करना पड़ सकता है। इन सभी चीजों का डिमेंशिया के खतरे से संबंध पाया गया है।
ऐसे काम करने वाले को अनियमित समय पर ड्यूटी, लंबे समय तक खड़े रहने और आराम के लिए कम समय मिलने की भी दिक्कत हो सकती है। ये सभी स्थितियां ब्रेन हेल्थ के लिए नुकसानदायक पाई गई हैं।
क्या है विशेषज्ञों की सलाह?
अध्ययन के सह-लेखक और जैविक विज्ञान के विशेषज्ञ प्रोफेसर डेविड राइचलन कहते हैं, दिमाग को स्वस्थ रखने के मामले में सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि हम कितना चलते-फिरते हैं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि हम किस परिस्थिति में शारीरिक गतिविधि कर रहे हैं?
लोगों को व्यायाम के लिए पर्याप्त खाली समय मिलना चाहिए और काम की जगह पर प्रदूषण तथा दूसरी हानिकारक परिस्थितियों को कम किया जाना चाहिए। डिमेंशिया से बचाव के लिए ये कदम सिर्फ लोगों को ज्यादा चलने-फिरने की सलाह देने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
ये भी जानना जरूरी
यह अध्ययन ऐसे समय में आया है जब लगातार विशेषज्ञ अलर्ट करते रहे हैं कि लंबे समय तक बैठे रहने से ब्रेन हेल्थ को गंभीर खतरा हो सकता है। एक अध्ययन में पाया गया था कि रोजाना आठ घंटे से ज्यादा समय तक बैठे रहने से डिमेंशिया का खतरा करीब एक-तिहाई तक बढ़ सकता है।
पिछले महीने प्रोफेसर डेविड राइचलन के नेतृत्व में हुआ एक और अध्ययन अल्जाइमर एंड डिमेंशिया जर्नल में प्रकाशित हुआ था।
- अध्ययन में पाया गया कि लंबे समय तक बैठे रहने के बावजूद अगर व्यक्ति मानसिक रूप से सक्रिय काम करता है जैसे डेस्क पर बैठकर काम करता है और लगातार सोच-विचार करता रहता है तो दिमाग के बाहरी हिस्से की कुछ महत्वपूर्ण जगहों का आकार अपेक्षाकृत ज्यादा पाया गया।
- इनमें वे हिस्से भी शामिल थे जो निर्णय लेने, योजना बनाने और दूसरे जटिल मानसिक कामों में मदद करते हैं।
- वहीं, टीवी देखने जैसी निष्क्रिय गतिविधियों में लंबे समय तक बैठे रहना नुकसानदायक पाया गया।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इन निष्कर्षों से यह बात सामने आती है कि सिर्फ शारीरिक गतिविधि की अवधि पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। गतिविधि किस तरह की है, किस माहौल में की जा रही है और उसका उद्देश्य क्या है, यह भी महत्वपूर्ण है।
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स्रोत:
Domain-specific physical activity levels and risk of dementia: a systematic review and meta-analysis
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