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राजस्थान पंचायत चुनाव: सरपंच से सीएम तक; जानिए पंचायतों से निकले राजस्थान के कितने सियासी दिग्गज

Thu, 15 Oct 2026 06:27 AM IST
Sourabh Bhatt न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: Sourabh Bhatt Updated Thu, 15 Oct 2026 06:27 AM IST
सार

राजस्थान की राजनीति में कई दिग्गज नेताओं ने सरपंच और पंचायत समिति प्रधान के रूप में सियासी सफर शुरू किया और विधायक, मंत्री, सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक पहुंचे। पंचायतों ने उन्हें जमीनी अनुभव और जनता से जुड़ने का मौका दिया।

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English Headline: From Sarpanch to Chief Minister: Rajasthan Leaders Who Rose Through Panchayat Politics
राजस्थान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजस्थान में पंचायती राज चुनाव की हलचल के बीच उन नेताओं के राजनीतिक सफर पर नजर डालना दिलचस्प है, जिन्होंने अपनी सियासत की शुरुआत गांव और पंचायत से की और आगे चलकर सत्ता के बड़े पदों तक पहुंचे। किसी ने सरपंच के रूप में गांव की जिम्मेदारी संभाली तो किसी ने पंचायत समिति या जिला परिषद में काम किया। बाद में यही नेता विधायक, मंत्री, सांसद, प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री तक बने।

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प्रदेश की राजनीति में भाजपा, कांग्रेस और वामपंथी दलों के ऐसे कई उदाहरण हैं। इन नेताओं के लिए पंचायतें राजनीति की पहली पाठशाला बनीं, जहां उन्हें ग्रामीणों की समस्याओं, स्थानीय विकास और जनसंपर्क को करीब से समझने का मौका मिला।

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भजनलाल शर्मा: अटारी के सरपंच से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भी पंचायत स्तर से राजनीतिक सफर शुरू किया। वे भरतपुर जिले की अटारी ग्राम पंचायत के सरपंच रहे और पंचायत समिति सदस्य की जिम्मेदारी भी निभाई। इसके बाद भाजपा संगठन में प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रदेश महामंत्री जैसे पदों पर काम किया। वर्ष 2023 में सांगानेर से पहली बार विधायक बने और 15 दिसंबर 2023 को राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

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जोराराम कुमावत: गांव की पंचायत से कैबिनेट तक

जोराराम कुमावत वर्ष 2000 से 2005 तक सिंदरली ग्राम पंचायत के सरपंच रहे। इसके बाद उन्होंने सुमेरपुर नगरपालिका के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया। वर्ष 2018 और 2023 में सुमेरपुर से विधायक चुने गए। 2023 में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया।

झाबर सिंह खर्रा: पंचायत समिति के प्रधान से सरकार में मंत्री

झाबर सिंह खर्रा श्रीमाधोपुर पंचायत समिति के प्रधान रहे। वर्ष 2013 और 2023 में विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने। भजनलाल सरकार में उन्हें राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की जिम्मेदारी मिली। उनका सफर भी स्थानीय राजनीति से प्रदेश की सत्ता तक पहुंचने की मिसाल है।

हरलाल सिंह खर्रा: सरपंची से विधानसभा तक पांच बार पहुंचे

हरलाल सिंह खर्रा ने महरौली में सरपंच के रूप में काम किया और बाद में पंचायत समिति प्रधान बने। वर्ष 1967 में पहली बार श्रीमाधोपुर से विधायक चुने गए। वे कुल पांच बार विधानसभा पहुंचे और 1990 में पंचायती राज मंत्री बने।

गोविंद सिंह डोटासरा: पंचायत समिति सदस्य से कांग्रेस की कमान तक

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने वर्ष 2005 में पंचायत समिति सदस्य के रूप में राजनीतिक सफर शुरू किया। इसके बाद पंचायत समिति प्रधान बने। वर्ष 2008 से लगातार चार बार विधायक चुने गए। कांग्रेस सरकार में शिक्षा राज्य मंत्री रहे और 2020 में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए।

टीकाराम जूली: अलवर के जिला प्रमुख से नेता प्रतिपक्ष तक

टीकाराम जूली वर्ष 2005 में अलवर के जिला प्रमुख बने। इसके बाद 2008 में अलवर ग्रामीण सीट से पहली बार विधायक चुने गए। वर्ष 2018 और 2023 में भी विधानसभा पहुंचे। अशोक गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे और 2024 में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाली।

शांति धारीवाल: जिला प्रमुख से सांसद और मंत्री

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शांति कुमार धारीवाल ने छात्र राजनीति से शुरुआत की। वर्ष 1982 में कोटा के जिला प्रमुख बने और 1984 में कोटा से लोकसभा सांसद चुने गए। बाद में राजस्थान सरकार में कई अहम विभागों की जिम्मेदारी संभाली और राज्य की राजनीति में प्रमुख चेहरा बने।

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भरत सिंह: मंत्री बनने के बाद भी पंचायत से नाता कायम

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भरत सिंह का राजनीतिक सफर भी गांव से जुड़ा रहा। वे कुंदनपुर के तीन बार सरपंच और करीब दस साल तक सांगोद पंचायत समिति के प्रधान रहे। वर्ष 1993 में पहली बार खानपुर से विधायक बने। बाद में दीगोद और सांगोद से भी विधानसभा पहुंचे और मंत्री बने। वर्ष 2014 में कुंदनपुर से वार्ड पंच का चुनाव जीतकर उन्होंने पंचायत स्तर की राजनीति से अपना जुड़ाव बनाए रखा।

अमराराम: सरपंच से लोकसभा तक का सफर

माकपा नेता अमराराम ने मूंडवाड़ा के सरपंच के रूप में राजनीति शुरू की। वे धोद और दांतारामगढ़ से चार बार विधायक बने। वर्ष 2024 में सीकर लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।

प्रेमचंद बैरवा और किरोड़ीलाल मीणा भी पंचायतों से निकले

उपमुख्यमंत्री डॉ. प्रेमचंद बैरवा वर्ष 2000 से 2005 तक जिला परिषद सदस्य रहे। कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा ने भी जिला परिषद सदस्य के रूप में चुनाव लड़ा था। वे 1995 से 1998 तक दौसा के जिला प्रमुख रहे। इसके बाद दोनों नेताओं ने प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।

विजय सिंह चौधरी: पंचायत समिति प्रधान से विधायक और मंत्री

भाजपा नेता विजय सिंह चौधरी वर्ष 2011 से 2013 तक कुचामन सिटी पंचायत समिति के प्रधान रहे। वर्ष 2013 में नावां से विधायक बने। 2018 में चुनाव हारने के बाद 2023 में फिर विधानसभा पहुंचे और राज्य मंत्री बने।

भंवर सिंह भाटी: सरपंची से विधानसभा तक

बीकानेर जिले के हदां गांव के भंवर सिंह भाटी वर्ष 2010 से 2013 तक सरपंच रहे। वर्ष 2013 में कोलायत से विधायक चुने गए और 2018 में फिर जीत दर्ज की। कांग्रेस सरकार में उच्च शिक्षा सहित अन्य विभागों में राज्य मंत्री रहे।

हरजी राम बुरड़क: गांव से छह बार विधानसभा पहुंचे

नागौर के वरिष्ठ नेता हरजी राम बुरड़क ने वर्ष 1954 में भरनावा के सरपंच के रूप में शुरुआत की। वर्ष 1959 में लाडनूं पंचायत समिति के पहले प्रधान बने। आगे चलकर छह बार विधायक चुने गए और अशोक गहलोत सरकार में कृषि मंत्री रहे।

रामेश्वर लाल डूडी: पंचायत समिति प्रधान से नेता प्रतिपक्ष तक

कांग्रेस के दिवंगत नेता रामेश्वर लाल डूडी वर्ष 1995 से 1999 तक नोखा पंचायत समिति के प्रधान रहे। वर्ष 1999 में बीकानेर से लोकसभा सांसद बने। बाद में बीकानेर जिला परिषद के प्रमुख रहे और 2013 में नोखा से विधायक चुने गए। वर्ष 2014 से 2018 तक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे। अक्टूबर 2025 में उनका निधन हो गया।

दीपचंद खैरिया: सरपंच से जिला प्रमुख और विधायक

अलवर के दीपचंद खैरिया ने महोंद ग्राम पंचायत के सरपंच के रूप में राजनीति शुरू की। वे किशनगढ़ बास पंचायत समिति के प्रधान रहे और 1982 में अलवर जिला परिषद के जिला प्रमुख बने। वर्ष 2018 में बसपा के टिकट पर किशनगढ़ बास से विधायक चुने गए। 2023 में कांग्रेस के टिकट पर फिर विधानसभा पहुंचे।

लुंबराम चौधरी: पंचायत समिति से लोकसभा तक

सिरोही जिले के लुंबराम चौधरी वर्ष 2005 से 2010 तक सिरोही पंचायत समिति के प्रधान रहे। बाद में जिला परिषद सदस्य बने। वर्ष 2024 में भाजपा के टिकट पर जालोर लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर सांसद पहुंचे।

इन नेताओं के सफर से साफ होता है कि राजस्थान में पंचायत स्तर की राजनीति ने कई बड़े नेताओं को आगे बढ़ने का अवसर दिया। गांव की समस्याओं से सीधे जुड़ाव और स्थानीय स्तर पर काम करने का अनुभव उनके राजनीतिक जीवन का अहम हिस्सा रहा। पंचायतों से शुरू हुए इन सफरों ने प्रदेश की राजनीति और सरकार के शीर्ष पदों तक अपनी जगह बनाई।

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