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Kamada Ekadashi 2026: कामदा एकादशी कल ,जानिए पूजाविधि, कथा और धार्मिक महत्व
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: Vinod Shukla
Updated Sat, 28 Mar 2026 12:40 PM IST
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सार
Kamada Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में कामदा एकादशी का विशेष महत्व होता है। यह व्रत हर वर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। कामदा एकादशी पर कई तरह की मनोकामनाएं पूरी होती है।
Kamada Ekadashi 2026
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Kamada Ekadashi 2026: सनातन धर्म में एकादशी तिथि का विशेष स्थान माना गया है, जिसे भगवान विष्णु की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी कहा जाता है, जो वर्ष की प्रमुख एकादशियों में से एक है। धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति ही नहीं करता, बल्कि जीवन के सूक्ष्म दोषों और पापों से भी मुक्ति दिलाने में सहायक होता है। इसे फलदा एकादशी भी कहा जाता है, जो अपने नाम के अनुरूप भक्तों को शुभ फल प्रदान करने वाली मानी गई है।
कामदा एकादशी का धार्मिक महत्व
धार्मिक ग्रंथों, विशेषकर पद्म पुराण में कामदा एकादशी का अत्यधिक महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और भगवान विष्णु की उपासना करने से ब्रह्महत्या जैसे महापापों से भी मुक्ति मिल सकती है। यह एकादशी उन दोषों को भी समाप्त करने वाली मानी जाती है, जो अनजाने में किए गए कर्मों से उत्पन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त पिशाचत्व, नकारात्मक ऊर्जाओं और जीवन में आने वाली अदृश्य बाधाओं से छुटकारा पाने के लिए भी यह व्रत अत्यंत प्रभावकारी माना गया है।
मनोकामना पूर्ति का विशेष व्रत
कामदा एकादशी को मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला व्रत कहा गया है। मान्यता है कि जो साधक श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं, उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। यह व्रत व्यक्ति के मन को संयमित करता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। धार्मिक दृष्टि से इसे करने पर वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है, जो इसे और अधिक विशेष बनाता है।
इस दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ एवं पीले वस्त्र धारण करना शुभ माना गया है। इसके पश्चात व्रत का संकल्प लेकर पूजा स्थल को शुद्ध किया जाता है। लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। भगवान को पंचामृत से स्नान कराकर वस्त्र, चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप, नैवेद्य, फल आदि अर्पित किए जाते हैं। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करते हुए श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। अंत में कपूर से आरती उतारकर कामदा एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करना आवश्यक माना गया है।
प्राचीन समय में पुंडरीक नाम का एक राजा था, जो भोग-विलास में लिप्त रहता था। उसके राज्य में ललित और उसकी पत्नी ललिता निवास करते थे, जो परस्पर अत्यंत प्रेम करते थे। एक दिन राजसभा में गाते समय ललित का ध्यान अपनी पत्नी की ओर चला गया, जिससे उसका स्वर बिगड़ गया। इससे क्रोधित होकर राजा ने उसे राक्षस बनने का शाप दे दिया। अपने पति की इस स्थिति से व्यथित ललिता समाधान की खोज में विंध्याचल पर्वत स्थित श्रृंगी ऋषि के आश्रम पहुंची। ऋषि ने उसे कामदा एकादशी का व्रत करने का निर्देश दिया। ललिता ने पूर्ण श्रद्धा के साथ व्रत का पालन किया, जिसके प्रभाव से उसका पति पुनः मनुष्य रूप में लौट आया और राक्षस योनि से मुक्त हो गया।
व्रत का आध्यात्मिक प्रभाव
कामदा एकादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का एक सशक्त माध्यम भी मानी जाती है। यह व्रत व्यक्ति के भीतर के नकारात्मक विचारों को समाप्त कर मानसिक संतुलन और आत्मबल को बढ़ाता है। इसके प्रभाव से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं और व्यक्ति धर्म, सत्य और संयम के मार्ग पर अग्रसर होता है।
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मनोकामना पूर्ति का विशेष व्रत
कामदा एकादशी को मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला व्रत कहा गया है। मान्यता है कि जो साधक श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं, उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। यह व्रत व्यक्ति के मन को संयमित करता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। धार्मिक दृष्टि से इसे करने पर वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है, जो इसे और अधिक विशेष बनाता है।
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पूजन विधि और नियमइस दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ एवं पीले वस्त्र धारण करना शुभ माना गया है। इसके पश्चात व्रत का संकल्प लेकर पूजा स्थल को शुद्ध किया जाता है। लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। भगवान को पंचामृत से स्नान कराकर वस्त्र, चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप, नैवेद्य, फल आदि अर्पित किए जाते हैं। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करते हुए श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। अंत में कपूर से आरती उतारकर कामदा एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करना आवश्यक माना गया है।
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कामदा एकादशी की पौराणिक कथाप्राचीन समय में पुंडरीक नाम का एक राजा था, जो भोग-विलास में लिप्त रहता था। उसके राज्य में ललित और उसकी पत्नी ललिता निवास करते थे, जो परस्पर अत्यंत प्रेम करते थे। एक दिन राजसभा में गाते समय ललित का ध्यान अपनी पत्नी की ओर चला गया, जिससे उसका स्वर बिगड़ गया। इससे क्रोधित होकर राजा ने उसे राक्षस बनने का शाप दे दिया। अपने पति की इस स्थिति से व्यथित ललिता समाधान की खोज में विंध्याचल पर्वत स्थित श्रृंगी ऋषि के आश्रम पहुंची। ऋषि ने उसे कामदा एकादशी का व्रत करने का निर्देश दिया। ललिता ने पूर्ण श्रद्धा के साथ व्रत का पालन किया, जिसके प्रभाव से उसका पति पुनः मनुष्य रूप में लौट आया और राक्षस योनि से मुक्त हो गया।
व्रत का आध्यात्मिक प्रभाव
कामदा एकादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का एक सशक्त माध्यम भी मानी जाती है। यह व्रत व्यक्ति के भीतर के नकारात्मक विचारों को समाप्त कर मानसिक संतुलन और आत्मबल को बढ़ाता है। इसके प्रभाव से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं और व्यक्ति धर्म, सत्य और संयम के मार्ग पर अग्रसर होता है।

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