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इस 'भिनभिनाहट' और 'भौं-भौं' से भड़भड़ाए लालू, चिल्लाए भक्क बुड़बक
टीम फिरकी, नई दिल्ली Updated Thu, 06 Sep 2018 03:53 PM IST
नेता... नेता ही होता है, फिर वो चाहे सरकार में रहे या कारावास में। उसके लिए सुविधाएं जरूरी नहीं मजबूरी हो जाती हैं। जब तक दिन में चार लोगों से दुआ सलाम न हो जाए, एक-आध प्रेस कांफ्रेंस का माहौल न बनें, विरोधियों को दो-चार बार तबीयत से झिड़कियां न लें। तब तक रात को नींद नहीं आती है। अगर नींद आ भी जाए तो उन्हें सुबह वो ताजगी नहीं मिलती है जो क्षेत्र में दौरा करने के बाद मिला करती थी। शायद इसीलिए राजनीति में रिटायरमेंट वाली एज नहीं रखी गई (इसका किसी भी पार्टी के मार्गदर्शक मंडल से कोई लेना देना नहीं है)। क्योंकि कुछ आदतें बुढ़ापे में मजबूरी बन जाती हैं।
आरजेडी के अजीम-ओ शान शहंशाह लालू प्रसाद यादव इसी तरह की श्रेणी में पहुंच गए हैं। पुरानी अदावतों ने उनके शरीर को जेल में पहुंचा दिया है लेकिन सलाखों के पीछे उनका दिल नहीं लगता है। हालांकि उन्हें वो फिल्मों वाली जेल नहीं मिली है। जिसमें घुप्प अंधेरे को चीरती हुई एक सूरज की किरण पूरे जेल के एक कोने में पड़ रही होती है, और पूरे जेल में सिर्फ एक झिंगुर ही होता है जो बोल रहा होता है। लालू को ठीक-ठाक सुविधाओं अस्पताल में खादी धारियों की नजरबंद आंखों के बीच रखा गया है। लेकिन अब लालू प्रसाद यादव को कुत्तों की प्रेस कांफ्रेंस से दिक्कत हो रही है।
जी हां, लालू ने अर्जी लगवाई है कि उनके वार्ड को बदला जाए। काहे से... रात को जब सोने का वक्त होता है तो कुत्ते प्रेस कांफ्रेंस करके जोर-जोर से बतियाते हैं। इसके अलावा उनके कमरे में ढीठ टाइप के मच्छर भी आ गए हैं। जो तमाम कछुओं और ऑल आउटों को छकाते हुए लालू जी की कोमल त्वचा में अपना कठोर डंक चुभा देते हैं। लालू जी को डर है कि कहीं उनको डेंगू न हो जाए।
खैर... सेहत के लिए चिंतित लालू के परिवार ने उनकी इस अर्जी को आगे बढ़ा दिया है। अभी जवाब का इंतजार है, देखते हैं कि उनको अस्पताल के किन सुविधाओं वाले वार्ड में शिफ्ट किया जाएगा। क्योंकि अगर शिफ्ट नहीं किया तो ये मामला भी राजनीतिक बन जाएगा।
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