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9/11 की 25वीं बरसी: इराक-अफगानिस्तान की जंग में 7000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों की गई जान, क्या हासिल हुआ?
Wed, 02 Sep 2026 05:00 AM IST
निर्मल कांत
सबरीना टॅवरनीस/सोफी पार्क, द न्यूयॉर्क टाइम्स, मैसाचुसेट्स।
सबरीना टॅवरनीस/सोफी पार्क, द न्यूयॉर्क टाइम्स, मैसाचुसेट्स।
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 02 Sep 2026 05:00 AM IST
सार
पच्चीस साल पहले हुए 9/11 आतंकी हमलों के बाद अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान में युद्ध शुरू किए। इन युद्धों में सात हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों की जान गई। 9/11 की 25वीं बरसी पर इन युद्धों में हुई मौतों और उनके असर को लेकर सवाल फिर सामने हैं।
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अमेरिका में 9/11 हमले (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
जनवरी 2005 की एक बर्फीली रात। मैसाचुसेट्स के कस्बे ग्रैनविले के एक मकान पर दो अमेरिकी मरीन कमांडो ने दस्तक दी। डेविड और जोआन फुलर के सामने खड़े होकर अफसरों ने भारी आवाज में कहा-आपका बेटा, फर्स्ट लेफ्टिनेंट ट्रैविस फुलर, इराक में एक हेलिकॉप्टर क्रैश में मारा गया। पिता डेविड टेबल पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगे और मां जोआन का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।
कुछ दिन बाद कनेक्टिकट के एयरपोर्ट पर जब अमेरिकी ध्वज में लिपटा ताबूत उतरा, तो इतना क्षत-विक्षत था कि माता-पिता को चेहरा तक देखने की इजाजत नहीं मिली। अब जब अमेरिका 9/11 आतंकी हमलों की 25वीं बरसी मनाने जा रहा है तब उस हमले के बाद शुरू हुए अंतहीन युद्धों का भयानक सच एक बार फिर लोगों को झकझोर देता है। 21 साल बाद भी 78 साल की जोआन फुलर को यह सवाल बेचैन कर देता है- मेरे बेटे ने अपनी जान क्यों कुर्बान की? उस जंग से हमारे देश को क्या मिला?
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(मां जोआन फुलर)
वियतनाम जैसी खूनी जंग में दिखाई बहादुरी
9/11 हमलों के तुरंत बाद देशभक्ति के जज्बे में ट्रैविस फुलर ने मरीन कोर जॉइन की थी। पायलट बनने का मौका छोड़कर वे इन्फैंट्री (पैदल सेना) में गए ताकि साथियों का नेतृत्व कर सकें। अक्तूबर 2004 में फुलर की प्लाटून को इराक के सबसे खतरनाक और विद्रोही शहर फलूजा में उतारा गया। यह वियतनाम युद्ध के बाद अमेरिकी सेना की सबसे भीषण और खूनी शहरी लड़ाई थी। शहर की बिजली कटी हुई थी। गाड़ियां रुकते ही चारों तरफ बम धमाके होने लगे। कई साथियों के हाथ-पैर उड़ गए, पर युवा फुलर ने गोलीबारी के बीच खड़े होकर अपनी यूनिट का हौसला बांधा।
ग्रेनेड हमले में बचे
दिसंबर 2004 में एक हमले में फुलर बुरी तरह झुलस गए। रक्षा मंत्री डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने उनसे मिलकर मेडल दिया। ठीक होते ही वे दोबारा मोर्चे पर लौट आए। फलूजा की दो महीने लंबी खूनी जंग फुलर और उनकी यूनिट ने जीत ली थी। मौत के मुंह से बाहर निकलने के बाद कैंप में सैनिकों ने बीयर पीकर जश्न मनाया और घर पर फोन करके कहा-मां, हम बच गए!
ये भी पढ़ें: यूएस वीजा नियम: भारतीय पेशेवरों-निवेशकों को सितंबर में भी राहत नहीं; नौकरी छोड़ भारत लौटीं दिशा ने क्या बताया?
(घर के कमरे में सजी बेटे की तस्वीर)
लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था
26 जनवरी 2005 को इराक के पहले लोकतांत्रिक चुनाव की सुरक्षा के लिए दो हेलिकॉप्टरों में मरीन जवानों को भेजा गया। रास्ते में एक सी-स्टैलियन हेलिकॉप्टर क्रैश हो गया। ट्रैविस फुलर समेत उसमें सवार सभी 31 अमेरिकी सैनिक मारे गए। यह अमेरिकी सेना के लिए बड़ा नुकसान था।
बेटे की मौत का दुख लेकिन बहादुरी पर गर्व
ट्रैविस फुलर की मौत ने परिवार को तोड़कर रख दिया। पिता डेविड गहरे डिप्रेशन में चले गए और उस घर को छोड़ना पड़ा जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से बनाया था। जोआन फुलर कहती हैं कि उन्हें अपने बेटे की बहादुरी पर गर्व है, लेकिन उसकी मौत एक निरर्थक बर्बादी थी। बहन जेनी फ्रांसिस आज भी अपने भाई की जिंदादिली को याद करके भावुक हो जाती है।
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कुछ दिन बाद कनेक्टिकट के एयरपोर्ट पर जब अमेरिकी ध्वज में लिपटा ताबूत उतरा, तो इतना क्षत-विक्षत था कि माता-पिता को चेहरा तक देखने की इजाजत नहीं मिली। अब जब अमेरिका 9/11 आतंकी हमलों की 25वीं बरसी मनाने जा रहा है तब उस हमले के बाद शुरू हुए अंतहीन युद्धों का भयानक सच एक बार फिर लोगों को झकझोर देता है। 21 साल बाद भी 78 साल की जोआन फुलर को यह सवाल बेचैन कर देता है- मेरे बेटे ने अपनी जान क्यों कुर्बान की? उस जंग से हमारे देश को क्या मिला?
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(मां जोआन फुलर)
वियतनाम जैसी खूनी जंग में दिखाई बहादुरी
9/11 हमलों के तुरंत बाद देशभक्ति के जज्बे में ट्रैविस फुलर ने मरीन कोर जॉइन की थी। पायलट बनने का मौका छोड़कर वे इन्फैंट्री (पैदल सेना) में गए ताकि साथियों का नेतृत्व कर सकें। अक्तूबर 2004 में फुलर की प्लाटून को इराक के सबसे खतरनाक और विद्रोही शहर फलूजा में उतारा गया। यह वियतनाम युद्ध के बाद अमेरिकी सेना की सबसे भीषण और खूनी शहरी लड़ाई थी। शहर की बिजली कटी हुई थी। गाड़ियां रुकते ही चारों तरफ बम धमाके होने लगे। कई साथियों के हाथ-पैर उड़ गए, पर युवा फुलर ने गोलीबारी के बीच खड़े होकर अपनी यूनिट का हौसला बांधा।
ग्रेनेड हमले में बचे
दिसंबर 2004 में एक हमले में फुलर बुरी तरह झुलस गए। रक्षा मंत्री डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने उनसे मिलकर मेडल दिया। ठीक होते ही वे दोबारा मोर्चे पर लौट आए। फलूजा की दो महीने लंबी खूनी जंग फुलर और उनकी यूनिट ने जीत ली थी। मौत के मुंह से बाहर निकलने के बाद कैंप में सैनिकों ने बीयर पीकर जश्न मनाया और घर पर फोन करके कहा-मां, हम बच गए!
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(घर के कमरे में सजी बेटे की तस्वीर)
लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था
26 जनवरी 2005 को इराक के पहले लोकतांत्रिक चुनाव की सुरक्षा के लिए दो हेलिकॉप्टरों में मरीन जवानों को भेजा गया। रास्ते में एक सी-स्टैलियन हेलिकॉप्टर क्रैश हो गया। ट्रैविस फुलर समेत उसमें सवार सभी 31 अमेरिकी सैनिक मारे गए। यह अमेरिकी सेना के लिए बड़ा नुकसान था।
बेटे की मौत का दुख लेकिन बहादुरी पर गर्व
ट्रैविस फुलर की मौत ने परिवार को तोड़कर रख दिया। पिता डेविड गहरे डिप्रेशन में चले गए और उस घर को छोड़ना पड़ा जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से बनाया था। जोआन फुलर कहती हैं कि उन्हें अपने बेटे की बहादुरी पर गर्व है, लेकिन उसकी मौत एक निरर्थक बर्बादी थी। बहन जेनी फ्रांसिस आज भी अपने भाई की जिंदादिली को याद करके भावुक हो जाती है।