फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   India Seeking New Economic Routes in Central Asia PM Modi Eurasian Diplomacy Shanghai Cooperation Organization

मध्य एशिया में नए आर्थिक रास्तों की तलाश: पीएम मोदी की यूरेशियाई कूटनीति, बड़ा मंच बनेगा शंघाई सहयोग संगठन

Mon, 31 Aug 2026 05:40 AM IST
Ashutosh Bhatia आशुतोष भाटिया
Updated Mon, 31 Aug 2026 05:40 AM IST
सार

पीएम मोदी एससीओ बैठक में शामिल होने के लिए बिश्केक में मौजूद हैं। इस दौरे की मदद से भारत एससीओ बैठक के जरिए यूरेशिया में अपनी पैठ मजबूत करने और नए व्यापारिक रास्ते तलाशने की कोशिश कर रहा है। 

विज्ञापन
India Seeking New Economic Routes in Central Asia PM Modi Eurasian Diplomacy Shanghai Cooperation Organization
किर्गिस्तान के बिश्केक में एससीओ समिट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

ताशकंद से बिश्केक तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा केवल दो देशों का दौरा नहीं, बल्कि शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के मंच से यूरेशियाई भू-राजनीति में भारत की गहराती पैठ का नया अध्याय है। एससीओ सम्मेलन में भारत के समक्ष चुनौती चीन की आर्थिक मौजूदगी के बीच अपने लिए नए ट्रेड रूट्स (व्यापारिक मार्ग) तलाशने की है, वहीं दूसरी ओर मॉस्को और बीजिंग के साथ रिश्तों में तालमेल बैठाना भी दिल्ली की कूटनीति की परीक्षा होगी। 

विज्ञापन


भारत की प्राथमिकताएं
प्रधानमंत्री मोदी ने एससीओ के लिए भारत की प्राथमिकताएं तीन शब्दों में रखी हैं- सुरक्षा, कनेक्टिविटी और अवसर। आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद से आजादी भारत की पुरानी सुरक्षा चिंता है। इसके साथ दिल्ली अब कनेक्टिविटी, व्यापार, निवेश, ऊर्जा और डिजिटल सहयोग पर भी जोर दे रही है। बिश्केक में होने वाले एससीओ सम्मेलन में मोदी इन्हीं प्राथमिकताओं को अन्य देशों के समक्ष रखेंगे।
विज्ञापन

 
चीन की चुनौती
मध्य एशिया में चीन की पहले से मजबूत आर्थिक मौजूदगी भारत के लिए एक चुनौती है। सड़क, रेल, ऊर्जा, खनन और निवेश के जरिए चीन इस क्षेत्र में गहरे रिश्ते बना चुका है। भारत के सामने चुनौती चीन की मौजूदगी के बीच अपनी ऐसी आर्थिक पहुंच तैयार करने की है, जो मध्य एशिया को भारतीय बाजार और हिंद महासागर से जोड़ सके। चाबहार बंदरगाह और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर इसी रणनीति के अहम हिस्से हैं। यही वजह है कि मोदी की ताशकंद यात्रा भी बिश्केक के एससीओ सम्मेलन के साथ-साथ महत्वपूर्ण रही है। उज्बेकिस्तान मध्य एशिया की सबसे महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में है और भारत ने उसके साथ व्यापार, निवेश, डिजिटल कनेक्टिविटी, रक्षा और ऊर्जा सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है।
विज्ञापन
विज्ञापन


मोदी-जिनपिंग मुलाकात
बिश्केक में दुनिया की नजर पीएम मोदी की जिनपिंग से होने वाली मुलाकात पर रहेगी। एससीओ के इतर यह बातचीत ऐसे समय हो रही है जब भारत-चीन संबंधों में संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने बीजिंग में सीमा विवाद, सीमा पर शांति और द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने पर चर्चा की। दोनों पक्षों ने सीमा प्रश्न के समाधान की दिशा में बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई। अब मोदी और जिनपिंग की मुलाकात इसलिए भी अहम है क्योंकि यह सितंबर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रस्तावित बड़ी मुलाकात से ठीक पहले होगी।

बिश्केक की बातचीत उस बड़ी मुलाकात की जमीन तैयार कर सकती है। यह मुलाकातें दोनों देशों के बीच संबंधों को सीमा विवाद से आगे व्यापक राजनीतिक और आर्थिक संदर्भ में ढाल सकती हैं। यह देखना होगा कि दोनों देश तनाव नियंत्रित करने और संवाद को संस्थागत बनाने की दिशा में कितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं। चीन के साथ संवाद भारत को मध्य एशिया, रूस और व्यापक यूरेशिया में अपने हित साधने की गुंजाइश भी देता है। 
 
पुतिन से मुलाकात
बिश्केक में पीएम मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत भी महत्वपूर्ण होगी। बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत रूस के साथ ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक संबंध बनाए रखते हुए पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्तों को भी आगे बढ़ा रहा है। एससीओ में भारत का यह कूटनीतिक संतुलन भी प्रदर्शित होगा। यह भी भारत के लिए एससीओ की असली उपयोगिता है। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद, रूस के साथ साझेदारी और मध्य एशिया के साथ बढ़ती आर्थिक भागीदारी- पीएम यह तीनों उद्देश्य एक ही कूटनीतिक यात्रा में साधने की कोशिश करेंगे। 


वैकल्पिक गलियारे
भारत की कूटनीति का सबसे बड़ा परीक्षण कनेक्टिविटी और कारोबार में होगा। भारत ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा बनने से इनकार किया है, लेकिन मध्य एशिया तक पहुंच के लिए उसके पास चीन जैसी व्यापक भौगोलिक पहुंच नहीं है। पाकिस्तान रास्ते की बाधा है और अफगानिस्तान में भी अस्थिरता रही है। इन वजहों ने भारत की मध्य एशिया तक सीधे पहुंच को मुश्किल बनाया है। ऐसे में ईरान के चाबहार बंदरगाह और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जैसे वैकल्पिक मार्गों को भारत की यूरेशिया रणनीति का हिस्सा मानना होगा। मध्य एशिया में भारत की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कनेक्टिविटी को व्यापार में और रणनीतिक रिश्तों को वास्तविक आर्थिक मौजूदगी में कितना बदल पाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed